Madhya pradesh assembly elections 2018: वे 3 लोग, 3 मुद्दे और अकेले शिवराज
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मध्य प्रदेश में चुनावी परिणाम के रुझान बहुत कुछ ऐसा कहते हैं जो मौजूदा शिवराज सिंह सरकार के लिए अप्रत्याशित है और बीजेपी के लिए सेफ जोन कहे जाने वाले एमपी के लिए भी चौंकाने वाले हैं। 15 साल से मध्य भारत की सत्ता पर काबिज भाजपा के लिए ये चुनाव परिणाम इतने पेंचिदा और भरोसे से हटकर होने वाले होंगे ऐसा किसी ने सोचा नहीं था। हालांकि 7 दिसंबर को आए एग्जिट पोल पर भरोसा करें तो मप्र के ये चुनावी परिणाम कुछ ऐसे ही रहने वाले थे और ऐसा सीन तकरीबन हर चुनावी विश्लेषक की नजरों से दिखाई दे रहा था।
बहरहाल, राज्य के चुनावी परिणाम की तस्वीर अब भी साफ नहीं है और कांटे का मुकाबला जारी है, लेकिन चुनावी रण में बीजेपी के पिछड़ जाने और कांग्रेस के बढ़त के कारणों पर नजर दौड़ाएं तो ऐसे तीन मुद्दे सामने आते हैं जिन्होंने बीजेपी की सरकार को सत्ता से विदाई के संकेत पहले दे दिए थे। ये मुद्दे रहे मंदसौर किसान आंदोलन जिसमें 5 किसानों की मौत की दुखदार्इ घटना हुई, दूसरा नोटबंदी और तीसरा जीएसटी।
3 मुद्दे किसान आंदोलन, नोटबंदी और जीएसटी
कहने का अर्थ है कि मप्र की सियासत में शिवराज सिंह चौहान त्रयी बनाम त्रयी के एक ऐसे भंवर में पड़ते दिखार्इ दिए, जहां से निकलना उनके लिए आसान नहीं रहा। यही वे 3 मुद्दे थे और इन्हें उठाने वाले 3 कांग्रेस के लोग थे, जिन्होंने एक तरह से शिवराज सिंह को अकेला कर दिया।
दरअसल, प्रदेश में त्रयी बनाम त्रयी का ये नजारा मप्र के चुनावी और सियासी पटल पर साफ दिखा। बात यदि किसान आंदोलन की ही करें तो राज्य की शिवराज सिंह सरकार के लिए मंदसौर किसान आंदोलन सबसे बड़ा सिरदर्द साबित हुआ। बीते साल यानी की जून 2017 तकरीबन 20 सूत्रीय मांगों के साथ मंदसौर में सड़क पर आंदोलन कर रहे 5 किसानों की पुलिस फायरिंग में मौत की घटना ने शिवराज सिंह सरकार की सत्ता में विदाई की पहली लकीर खींचीं।
हालांकि मामले की गंभीरता को देखते हुए शिवराज सिंह चौहान ने डैमेज कंट्रोल की कोशिश की, लेकिन उन्हें देर हो चुकी थी क्योंकि यह यह घटना पूरे देश की ब्रेकिंग खबर बन गई और सबसे बड़ा सियासी घटनाक्रम भी।
पहले से ही व्यापमं घोटाले के आरोपों में घिरी शिवराज सरकार के लिए मंदसौर किसान गोलीकांड किसी बड़े झटके से कम नहीं था। शिवराज की बेदाग छवि पर दाग की छाया देने वाले डंपर घोटाले के बाद व्यापमं और अचानक मंदसौर का घटनाक्रम बेहद चौंकाने वाला साबित हुआ। इस मामले की रही-सही कमी विपक्षी दलों और मीडिया ने पूरी कर दी। सोशल मीडिया से लेकर नैशनल टीवी का प्राइम मुद्दा बन चुका किसान गोलीकांड उन्हें एक तरह से किसान विरोधी ही बना गया।
नोटबंदी-जीएसटी और फिर अकेले शिवराज
शिवराज सरकार को झटका देने वाले दूसरे दो सबसे अहम मुद्दे रहे नोटबंदी और जीएसटी के। केंद्र सरकार की ओर से अचानक लागू की गई नोटबंदी ने खुद बीजेपी शासित राज्यों को भी संभलने और समझने का मौका नहीं दिया गया। नोटबंदी का घूंट सभी बीजेपी शासित राज्य के सीएम पीकर रह गए और उन्होंने दबी जुबान में ही सही इसकी तारीफ की, भले ही वे एटीएम और बैंकों की कतारों में खड़े आम आदमियों की मुश्किलों को संभालने और समझने में असहाय साबित हो रहे थे।
नोटबंदी का मामला तो ऐसा था कि मध्य प्रदेश के ग्रामीण इलाकों में नोटबंदी ने गरीब और आम आदमी की कमर तोड़ दी जबकि रही-सही कसर जीएसटी ने पूरी की। जमीनी रिपोर्ट कहती है कि जीएसटी की मार तो ऐसी पड़ी भाजपा के पारंपरिक वोर्टर विशेष रूप से बनिया और व्यापारी शिवराज और भाजपा दोनों से ही नाराज नजर आए।
नोटबंदी पर इधर, विपक्ष सड़कों पर था और सरकार को घेर रहा था, जबकि मीडिया नोटबंदी का असली चेहरा धीरे-धीरे सामने ला रहा था। जीएसटी का मुद्दा भी बीजेपी के अपने ही वोट वर्ग के लिए सबसे बड़ा संकट लेकर आया। मप्र में चूंकि व्यापारी वर्ग बीजेपी का पारंपरिक वोट बैंक रहा है, ऐसे में जीएसटी का लागू होना भी शिवराज सिंह सरकार के खिलाफ नाराजगी की वजह बना। राज्य के बड़े शहरों और विशेष रूप से शहरी वोट बैंक नोटबंदी और जीएसटी के कारण बीजेपी से छिटकता नजर आया।
दिग्विजय, कमलनाथ, सिंधिया और अकेले शिवराज
इधर एक ओर 3 मुद्दे थे तो वहीं दूसरी ओर 3 ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने मप्र में किसानों के रोष, नोटबंदी और जीएसटी की इसी नाराजगी को भुना लिया। दिग्विजय दिखे हाशिये पर लेकिन अपना काम नर्मदा यात्रा में ही कर गए, कमलनाथ सामने थे और नये आकर्षण सिंधिया बने। ये तीनों ही लोग तीन मुद्दों के साथ शिवराज सिंह चौहान को बिल्कुल अकेला कर गए। यह कांग्रेस त्रयी ग्रामीण इलाकों में अपने पारंपरिक वोटर्स को लुभाने और शिवराज सिंह की छवि को किसान विरोधी बताने में सफल रही।
दूसरी ओर राहुल गांधी ने खुद ही मोर्चा संभाला और कांग्रेस सरकार के आने पर 10 दिनों के अंदर किसानों का कर्ज माफ करने की गारंटी देकर वोटर्स पर कांग्रेस का भरोसा लौटाने का प्रयास किया और वे सफल भी रहे।
ऐसे ही प्रदेश में नोटबंदी और जीएसटी के लागू करने की विफलता से उपजी छोटे व्यापारी वर्ग और जनता की पीड़ा को भी कमलनाथ से लेकर सिंधिया ने अपने पक्ष में करने का प्रयास किया। एक तरह से देखा जाए तो मप्र में किसान,नोटबंदी और जीएसटी के इन मुद्दों की त्रयी को कांग्रेस की त्रयी ने अपने पक्ष में कैश कर लिया।
बहरहाल, मप्र में चुनाव परिणाम तो सामने आ रहे हैं, लेकिन यहां फिलहाल कुछ भी कहना जल्दबाजी होगी। कांग्रेस और बीजेपी के बीच कांटे की टक्कर है। परिणाम जो भी हो इस बात में कोई दो राय नहीं है कि वे 3 लोग दिग्विजय, कमलनाथ और सिंधिया अकेले शिवराज पर भारी पड़े और भारी पड़े जीएसटी, किसान और नोटबंदी के वे 3 मुद्दे।
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