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कौन फतह करेगा अमेठी? कांग्रेस की इस ताकत के सामने मुश्किल में भाजपा

Wed, 06 Mar 2019 06:32 PM IST
Prabhunath Shukla प्रभुनाथ शुक्ल
Updated Wed, 06 Mar 2019 06:32 PM IST
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lok sabha elections 2019 rahul gandhi and smriti irani amethi seat bjp congress
गांधी परिवार की राजनीतिक जमीन अमेठी है। - फोटो : फाइल फोटो

गांधी परिवार की राजनीतिक जमीन अमेठी है। स्मृति ईरानी और भाजपा पूरी तरह अमेठी पर कब्जा करना चाहती है। भाजपा कांग्रेस मुक्त भारत के साथ अमेठी मुक्त कांग्रेस की तरफ बढ़ती दिखती है। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेठी की जनता को पांच हजार करोड़ की योजनाओं का तोहफा दिया है, जिसमें और भारत के सहयोग से एक आर्डिनेंस फैक्ट्री का उद्घाटन भी किया है। जहां से एके-203 राइफल का उत्पादन होगा। यूपीए सरकार में 2007 में इसकी नींव रखी गई थी। हालांकि इस पर राजनीति भी शुरू हो गई है। राहुल गांधी ने एक ट्वीट के जरिए पीएम मोदी पर झूठ बोलने का भी आरोप लगाया है। राहुल गांधी की तरफ से कहा गया है कि गन फैक्ट्री में उत्पादन पहले से हो रहा है, जिस पर ईरानी ने पलटवार किया है।

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बहरहाल, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के सामने 2014 में अमेठी से चुनाव लड़ने वाली स्मृति ईरानी भले ही हार गई हो, लेकिन वे अमेठी की जनता को वह यकीन दिलाने में कामयाब रही हैं कि राहुल गांधी से कहीं अधिक उन्हें आपकी चिंता है। मोदी सरकार में खासी अहमियत रखने वाली ईरानी अमेठी में व्यापक पैमाने पर लोगों को सरकारी योजनाओं का लाभ भी दिलाया है।
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यही नहीं राहुल गांधी के हर सियासी हमले का जवाब उनकी तरफ से दिया जाता रहा है। सूत्र बताते हैं कि वह अमेठी से चुनाव भी लड़ना चाहती हैं लेकिन खास बात यह है अमेठी में पिछला चुनाव हारने के बाद पार्टी उन्हें दोबारा अमेठी से टिकट देती है या नहीं ये देखने वाली बात होगी। दरअसल, देखा जाए तो भाजपा इस सीट को अपने कब्जे में लेकर यह संदेश देना चाहती है कि उसने गांधी परिवार का अंतिम किला भी सियासी एयर स्ट्राइक से ध्वस्त कर दिया।
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अमेठी फतह करने की बीजेपी की राह इतनी भी आसान नहीं है। - फोटो : अमर उजाला

पहले से मजबूत हुए हैं राहुल गांधी, आसान नहीं है स्मृति ईरानी की राह  
अमेठी फतह करने की बीजेपी की राह इतनी भी आसान नहीं है। खासतौर पर जब से राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बने हैं तब से उनका प्रभाव और लोकप्रियता दोनों बढ़ी है। गुजरात में बीजेपी को दी गई कड़ी टक्कर और राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मप्र में पार्टी का लौटना इस बात की ओर इशारा है कि उनके नेतृत्व में कांग्रेस मजबूत है। जाहिर ऐसे में अमेठी में भी उनका प्रभाव बीते एक साल में काफी बढ़ा है और वे अपने संसदीय क्षेत्र में काफी मजबूत हुए हैं। इधर  राफेल मसले उठाकर भी राहुल गांधी ने पीएम मोदी और भाजपा के लिए बड़ी मुश्किल खड़ी की है।

अमेठी में आंकड़े कहते हैं कांग्रेस की मजबूती की कहानी  
अमेठी की चुनावी जमीन पर भाजपा कितनी सफल है इसका आकलन भी करना आवश्यक है। अमेठी से भाजपा की वरिष्ठ  नेता स्मृति ईरानी 2014 में चुनाव लड़ीं थी। उन्हें 3,00,748 वोट मिले थे जबकि राहुल गांधी को 4,08,651 मत हासिल हुए थे। राहुल गांधी ने एक लाख से अधिक वोटों से ईरानी को हराया था। बसपा के धर्मेद्र प्रताप सिंह को 57,716 वोट हासिल हुए थे। जबकि आप के कुमार विश्वास को 25,527 मत मिले थे। समाजवादी पार्टी ने यहां से अपना उम्मीदवार नहीं उतारा था। अमेठी में कुल 16,69,843 मतदाता पंजीकृत थे जिसमें 8,74,625 लोगों ने अपने मत का प्रयोग किया था। 52 फीसदी से अधिक मतदान हुआ था।

राहुल गांधी 2009 में यहां से 2014 के मुकाबले सबसे अधिक 4,64,195 लाख वोट हासिल किए थे। दूसरे पायदान पर बसपा के आशीष शुक्ला थे, जिन्हें 93,997 वोट मिले थे जबकि भाजपा के प्रदीप सिंह तीसरे नंबर पर थे उन्हें 37,570 वोट मिले। उस दौरान 45 फीसदी से अधिक पोलिंग हुई थी। कुल वोटर यहां 14,31,787 थे जबकि 6,64,650 ने अपने मत का प्रयोग किया था। इस लिहाज से देखा जाए तो यहां गांधी परिवार को पराजित करना बेहद मुश्किल काम लगता है, क्योंकि 2014 में मोदी लहर थी। मोदी का जादू वोटरों के सिर चढ़ कर बोल रहा था। देश में कांग्रेस के प्रति एक नकारात्मक सोच बनी थी। लेकिन यूपी में इस बार सपा-बसपा के सियासी तालमेल से रणनीति बदल गई है।
 

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यूपी की राजनीति में 2014 के मुकाबले 2019 की जमीन काफी बदल चुकी है। - फोटो : फाइल फोटो

आसान नहीं होगी भाजपा की राह
यूपी की राजनीति में 2014 के मुकाबले 2019 की जमीन काफी बदल चुकी है। 2014 में भाजपा 73 सीटों पर जीत दर्ज की थी, जिसमें सहयोगी अपना दल भी शामिल है। चुनावी सर्वेक्षण बता रहे हैं कि इस बार भाजपा के लिए यूपी की राह आसान नहीं होगी, क्योंकि जातीय गठजोड़ की वजह से उसे भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है, जिसकी वजह से अमेठी में भी काफी बदलाव देखने को मिलेगा जो भाजपा के लिए बड़ी चुनौती होगी। 2014 और 2009 में सपा ने यहां से अपने उम्मीदवार नहीं खड़े किए थे जबकि बसपा ने दोनों बार अपने उम्मीदवारे उतारे थे।

अगर 2014 और 2009 में केवल बीएसपी मतों का स्थानांतरण कांग्रेस की झोली में जाता है तो उस लिहाज से भाजपा उस खाई को पाटती नहीं दिखती, क्योंकि स्मृति ईरानी 2014 में राहुल गांधी से 1,00793 हजार वोटों से पराजित हुई थी। माना जाए तो सपा ने अपने उम्मीदवार नहीं खड़े किए थे जिसकी वजह से वह मत कांग्रेस को मिले होंगे। लेकिन इस बार सपा-बसपा की दोस्ती की वजह से राहुल गांधी के खिलाफ कोई उम्मीदवार नहीं होगा। फिर मतों के उस भारी अंतराल को भाजपा कैसे पाटेगी।

कांग्रेस अभी तक यहां से केवल दो चुनाव पराजित हुई है। 1977 में लोकदल ने संजय गांधी को हराया था। फिर 1998 में संजय सिंह ने कांग्रेस के सतीश शर्मा को पराजित किया था। कांग्रेस यहां से 13 बार से अधिक चुनाव जीत चुकी है। हालांकि पुलवामा हमले, एयर स्टाइक और अभिनंदन की वापसी के बाद भाजपा के पक्ष में सियासी हवा बदली है।

हाल के सर्वेक्षणों में बताया गया है कि वह 41 सीटें हासिल कर सकती है पिछले सर्वे से उसे 10 से अधिक सीटों का लाभ होता दिखता है। भाजपा इस बदलाव को वोट में कितना परिवर्तित कर पाएगी यह समय बताएगा। लेकिन गांधी परिवार के सियासी किले अमेठी को भेदना आसान नहीं लगता है। फिलहाल राजनीति में कुछ कहा नहीं जा सकता है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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