मोदी से अबकी बार हिमालय से भी बड़ी आशाएं हैं, भाजपा के सामने होंगी ये चुनौतियां
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17वीं लोकसभा के लिए हुए चुनाव के परिणाम आ चुके हैं। पहली बार किसी ग़ैर कांग्रेसी दल को दोबारा स्पष्ट बहुमत मिला है। कह सकते हैं कि देश का लोकतांत्रिक अतीत एक नई करवट ले रहा है। इस अभूतपूर्व जनादेश के संदेश और सबक़ क्या हैं?
पहले बीजेपी की बात।
दरअसल, इस शानदार जीत के पीछे 3 बड़े कारण हैं। एक तो यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अपनी सभाओं में यह बात कही कि मतदाता का वोट सीधे उनके खाते में जाएगा तो इसका तेज़ असर हुआ। स्थानीय प्रत्याशी से ग़ुस्सा या नापसंदगी कहीं हाशिए पर चली गई। दूसरी बात यह कि बहुमत इस पक्ष में था कि मोदी को एक कार्यकाल और मिलना चाहिए। जब मोदी ने 3 राज्यों में हार के बाद राष्ट्रवाद और बीजेपी ने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का सहारा लिया तो विकास के मसले और मुल्क़ के गंभीर सरोकार नेपथ्य में थे।
इन मुद्दों पर ध्यान देना होगा पीएम मोदी को
अब नरेंद्र मोदी को लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था, बढ़ती बेरोज़गारी तथा बुनियादी ढांचे पर ध्यान देना ही होगा । अगले चुनाव में लोग अब इन्ही मुद्दों पर सिर्फ काम मांगेंगे। तीसरी बात सबसे महत्वपूर्ण है। अपनी सभाओं और अनेक अवसरों पर प्रधानमंत्री ने इस पर ज़ोर दिया है गठबंधन को मिलावटी या महामिलावटी दल कमज़ोर करते हैं (हालांकि यह शब्द उन्होंने प्रतिपक्ष के लिए इस्तेमाल किए हैं ) इसलिए आदर्श स्थिति तो यही है कि बीजेपी को अपने बूते पर सरकार बनाने का अवसर मिले। तब नीतीश कुमार जैसे सहयोगियों की राममंदिर पर झिझक का आदर करने का दबाव नहीं रहेगा। बीजेपी को अब राममंदिर, धारा 370 और 35 ए जैसे मुद्दों पर ही ध्यान देना होगा।
कांग्रेस के लिए है चेतावनी
ये परिणाम कांग्रेस के लिए भी चेतावनी भरा संदेश लाए हैं। यह पुरानी पार्टी अपने संक्रमण काल से गुज़र रही है। साल डेढ़ साल पहले नये जवान नेतृत्व ने कमान संभाली है। कांग्रेस को अपनी पराजय के कारण खोजने होंगे और अपनी प्राथमिकताओं को देश की प्राथमिकताओं से जोड़ना पड़ेगा। नई और पुरानी पीढ़ी के बीच अंदरुनी खिंचाव इस चुनाव में पूरे भारत ने देखा है। अब नये ख़ून को पूरी तरह मौका देना होगा। 5 वर्ष संगठन की कमजोरियों से मुक्त होने के लिए काफी हैं। यही नहीं, पूरे साल चुनाव के लिए तैयार रहने वाली एक रचनात्मक कांग्रेस समय की आवश्यकता है।
कांग्रेस को ध्यान देना होगा कि प्रचार में भाषा और आक्रोश की अभिव्यक्ति मर्यादित होना चाहिए। भले ही बीजेपी ने इसकाअधिक अतिक्रमण किया हो मगर कांग्रेस को उससे अलहदा ही रहना होगा। इंदिरागांधी, राजीव गांधी और सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ बीजेपी ने निंदनीय अभियान चलाया। राजीव गांधी को चोर तो बीजेपी ने ही कहा था। जब-जब पार्टी ने यह अभद्र अभियान चलाया,उसे नुकसान हुआ।
चौकीदार चोर है का उपयोग करने से कांग्रेस को बचना था। मोदी के भ्रष्टाचार को अगर उजागर करना ही था तो उसके अनेक अन्य तऱीके हो सकते थे। यह कांग्रेस के चरित्र से उलट है। क्षेत्रीय दलों के लिए भी सत्रहवीं लोकसभा का चुनाव एक सबक हैं। जाति और उपजाति के समीकरणों पर सियासत का वक़्त अब चला गया। अब उन्हें राष्ट्रीय मुद्दों पर गंभीरता से विमर्श करना होगा और अपने दलों के भीतर आंतरिक लोकतंत्र की खिड़की भी खोलनी होगी।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।