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चुनावी रणनीति: पसमांदा मुसलमान और बीजेपी का गुणा-भाग

Tue, 20 Sep 2022 01:23 PM IST
Sudhir Jha सुधीर कुमार झा
Updated Tue, 20 Sep 2022 01:23 PM IST
सार

भाजपा की चुनावी रणनीति में पसमांदा मुस्लिम हमेशा से रहे हैं। देखा जाए तो आंकड़ों के हिसाब से यह वोट बैंक लोकसभा की सौ से अधिक सीटों पर अपना प्रभाव रखता है।

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Lok Sabha Election 2024 BJP Master Plan to Attract Pasmanda Muslim Vote Bank
बीजेपी ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। - फोटो : Istock

विस्तार

बीजेपी ने आगामी लोकसभा चुनाव के लिए अपनी तैयारियां शुरू कर दी है। हाल ही में इसकी एक झलक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ओर से हैदराबाद में बीजेपी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में पसमांदा मुस्लिमों का नाम लेते हुए दिखाई दी।

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बैठक में मोदी ने कहा था-

पार्टी को 'स्नेह यात्राओं' के जरिए 'पसमांदा मुसलमानों' का समर्थन हासिल करना चाहिए। इस बयान के बाद राजनीति के गलियारों में नए-नए समीकरणों पर चर्चा शुरू हो गई है।

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राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि पीएम मोदी भारतीय राजनीति के सबसे बड़े ट्रेंड सेटर रहे हैं और उन्होंने एक सोची-समझी रणनीति के तहत पसमांदा मुस्लिमों का जिक्र किया है। पीएम मोदी की हर बात का राजनीतिक मतलब निकाला जाना लाजमी है और इस बात की संभावना प्रबल है कि यह संकेत आगामी लोकसभा चुनाव के लिए रोडमैप हो सकता है। यह पहली बार नहीं है कि पीएम मोदी ने पसमांदा का जिक्र किया हो। इससे पहले भी उन्होंने कहा था कि पसमांदा वर्ग बीजेपी के साथ है।

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उनके बयान के बाद से ही पार्टी नेताओं के बयान आने शुरू हो चुके हैं कि बीजेपी, मुस्लिम समुदाय के आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े वर्ग पसमांदा को लोक कल्याणकारी योजनाओं से जोड़ने की कोशिश करेगी। बीजेपी की अल्पसंख्यक शाखा ने पसमांदा मुसलमानों तक पहुंचने का खाका भी तैयार कर लिया है। पार्टी नेताओं के हिसाब से इसके लिए दो सूत्री योजना बनाई गई हैं। पहली योजना के तहत, केंद्र सरकार की सभी कल्याणकारी योजनाओं का लाभ समुदाय के निचले पायदान तक पहुंचाया जाएगा और दूसरी योजना के तहत, जिन जगहों पर पार्टी बहुमत में है उन्हें पार्टी इकाइयों में जगह दी जाएगी।

इसके अलावा, पार्टी ने पसमांदा समुदाय से आने वाले परमवीर चक्र विजेता वीर अब्दुल हमीद को सम्मानित करने और उनकी जयंती पर समारोह आयोजित करने की भी योजना बनाई है।
 

ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम समाज के यूपी अध्यक्ष वसीम राईन ने कहा है कि आजादी के बाद पीएम मोदी पहले ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने पसमांदा समाज के लिए कुछ बोला है। इससे इस बात को और बल मिलता है। कुल मिलाकर कोशिश यही है कि जितनी जल्दी हो सके इस समुदाय तक पहुंच बना ली जाए।


कौन हैं पसमांदा मुस्लिम?

पसमांदा शब्द उर्दू-फारसी का है, जिसका अर्थ होता है पीछे छूटे या नीचे धकेल दिए गए लोग। भारत में रहने वाले मुस्लिमों में करीब 15 फीसदी उच्च वर्ग से माने जाते हैं जिन्हें अशरफ कहा जाता है जबकि बचे करीब 85 फीसदी को दलित और वंचित माना जाता है और इन्हें पसमांदा कहा जाता है।

हालांकि, कुछ जानकारों का मानना है कि पसमांदा सिर्फ एक राजनीतिक नाम है और आधिकारिक तौर पर इसका कोई लेना-देना नहीं है। मुस्लिम समाज में इनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है और वे आर्थिक, सामाजिक, और शैक्षणिक रूप से पिछड़े हैं. ज्यादातर पसमांदा ओबीसी के अंतर्गत ही आते हैं और वे अपने समुदाय के भीतर ही एक सामाजिक लड़ाई लड़ रहे हैं। इसे लेकर आंदोलन भी हो चुके हैं।


कांशीराम ने कहा था-

"मुसलमानों के 50 नेताओं से मैं मिला। इनमें भी ब्राह्मणवाद देखकर मैं दंग रह गया। इस्लाम तो बराबरी और अन्याय के खिलाफ लड़ना सिखाता है, लेकिन मुसलमानों का नेतृत्व शेख, सय्यद, मुग़ल, पठान यानी अपने को ऊंची जाति को मानने वाले लोगों के हाथ में है। वह यह नहीं चाहते कि अंसारी, धुनिया, कुरैशी उनकी बराबरी में आएं"!

 


वहीं, डॉ राममनोहर लोहिया के अनुसार- 

‘भारत के राजनीतिकों ने अब तक देश के सही मायनों मे पीड़ित अल्पसंख्यक, यानी कि हिंदू तथा मुस्लिमों की अनगिनत पिछड़ी जातियों के हितों की रक्षा करने की चिंता नहीं की। उन्होंने शक्तिशालियों का अल्पसंख्यक के नाम पर हितसाधन किया है।


अशरफ को राजनीति के साथ-साथ सामाजिक और प्रशासन में उच्चतर स्थान मिला लेकिन पसमांदा मुस्लिमों को प्रशासन राजनीति में प्रतिनिधितव न के बराबर रहा। समुदाय के लोगों का मानना है कि सिर्फ नौकरियों में भागीदारी की बात नहीं है, बल्कि मुस्लिम समुदाय के संगठनों - जैसे ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीअत-उलेमा-ए-हिंद में भी  उच्च वर्ग के मुसलमान ऊंचे पदों पर बैठे हुए हैं और पसमांदा समुदाय के लोगों का इस्तेमाल सिर्फ शक्ति प्रदर्शनों के लिए होता है। उन्हें कोई जिम्मेदारी नहीं दी जाती।

गौरतलब है कि अब तक सभी राजनीतिक दलों द्वारा पसमांदा को नजरअंदाज ही किया गया है ऐसे में बीजेपी का हाथ बढ़ाना पार्टी को फायदा पहुंचा सकती है।

Lok Sabha Election 2024 BJP Master Plan to Attract Pasmanda Muslim Vote Bank
माना जाता है कि पसमांदा समाज के लोग देश के लगभग 18 राज्यों में हैं। - फोटो : Istock

क्या है इतिहास?

पसमांदाओं के लिए सामाजिक न्याय हासिल करने के लिए आंदोलन, आजादी से पहले की अवधि में ही शुरू हो चुका था। उस समय जुलाहा (बुनकर) समुदाय से आने वाले अब्दुल कय्यूम अंसारी और मौलाना अली हुसैन असीम बिहारी इस आंदोलन के अग्रणी नेता थे और इन्होंने मुस्लिम लीग की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध किया था। इसकी शुरुआत स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान जिन्ना के ‘द्विराष्ट्र सिद्धांत’ का विरोध करने के लिए मोमिन कांफ्रेंस बनाकर की गई थी। 

इसके बाद, 1980 के दशक में, महाराष्ट्र के अखिल भारतीय मुस्लिम ओबीसी संगठन ने इस समुदाय के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी थी। इसी के बाद महाराष्ट्र में अधिकांश पसमांदा मुस्लिमों को ओबीसी सूची में शामिल किया गया था। 90 के दशक में डॉक्टर एजाज अली (आल इंडिया बैकवर्ड मुस्लिम मोर्चा), अली अनवर (आल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज), और शब्बीर अंसारी ने अपने-अपने संगठनों के माध्यम से इस आंदोलन को बल दिया था।


क्या हैं राजनीतिक मायने?

 

माना जाता है कि पसमांदा समाज के लोग देश के लगभग 18 राज्यों में हैं। यूपी, बिहार, राजस्थान, तेलगांना, कर्नाटक, मध्य प्रदेश में इनकी संख्या अधिक है। सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश में है। हर विधानसभा सीट पर इनकी उपस्थिति अच्छी खासी संख्या में है, जिनमें करीब 44 जातियां जैसे राइनी, इदरीसी, नाई, मिरासी, मुकेरी, बारी, घोसी शामिल हैं।


आंकड़ों के हिसाब से यह वोट बैंक लोकसभा की सौ से अधिक सीटों पर अपना प्रभाव रखता है। जनसंख्या के आधार पर देखें, तो असम और बंगाल में मुस्लिम जनसंख्या 25-30 प्रतिशत, बिहार में करीब 17 प्रतिशत, उत्तर प्रदेश में करीब 20 प्रतिशत, दिल्ली में भी 10-12 प्रतिशत, महाराष्ट्र में करीब 12 प्रतिशत है, केरल में 30 प्रतिशत संख्या मुस्लिम समुदाय की है। बीजेपी मुस्लिम समुदाय के उस वर्ग पर फोकस करने की कोशिश कर रही है जो आमतौर पर विपक्षी दलों का वोट बैंक है।

बीजेपी ने उत्तर प्रदेश में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद पसमांदा मुसलमान दानिश अंसारी को जगह देकर इसके संकेत भी दिए। यही नहीं, इसके बाद, मोदी कैबिनेट के बड़े मुस्लिम चेहरे मंत्रिमंडल से गायब हो गए और उन्हें दोबारा राज्यसभा नहीं भेजा गया।

गौरतलब है कि यूपी-बिहार के विधानसभा चुनाव में सोशल एक्सपेरिमेंट के जरिए जिस तरह से बीजेपी ने गैर-यादव ओबीसी और गैर जाटव दलितों के बीच घुसपैठ की थी उसी के तहत एक कोशिश यहां भी बीजेपी करती दिख रही है।

इसे इस तरह से भी देखा जा सकता है कि जैसे योगी सरकार से मिले लाभों की वजह से देवबंद जैसी सीटों पर कुछ मुस्लिम वोट भी बीजेपी को मिले हैं। बीजेपी की पूरी कोशिश है कि समुदाय के एक बड़े हिस्से का वोटबैंक हासिल किया जाए।


क्या है पसमांदा समुदाय की मांग?

देशभर के पसमांदा मुसलमानों के संगठन ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज ने प्रधानमंत्री मोदी को एक चिट्ठी लिखकर क़रीब दर्जन भर ओबीसी जातियों को अनुसूचित जाति का दर्ज़ा देने की अपनी पुरानी मांग को दोहराया है। उनकी यह मांग पुरानी है लेकिन बीजेपी के पसमांदा मुसलमानों के बीच पैठ बनाने की कोशिशों को देखते हुए उन्होंने एक बार फिर इस मांग को उठाया है.उनका दावा है कि अगर सरकार की दिलचस्पी वाकई पसमांदा मुसलमानों का भला करने में है तो उनकी पुरानी मांग को माना जाए।

उन्होंने कहा है कि उन्हें एससी का दर्जा मिले क्योंकि उनका पेशा वही है जो हिंदू दलितों का है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे के ताजा आंकड़ों के मुताबिक लगभग 45 फ़ीसदी मुसलमानों को ओबीसी का लाभ मिलता है.जानकारों की मानें तो बिना इस मांग को स्वीकार किए।

पसमांदा मुसलमानों का बीजेपी के साथ जाना थोड़ा मुश्किल है। वहीं, बीजेपी के कुछ नेता यहां तक कह रहे हैं कि पसमांदा को एससी का दर्जा दे देने पर एससी-एसटी एक्ट के मामले बढ़ सकते हैं। वे दबी जुबान में यह बात भी कह रहे हैं कि कुछ जातियों को एससी का स्टेटस देने पर धर्म-परिवर्तन के मामले भी बढ़ सकते हैं।

बीजेपी के बड़े नेताओं की मानें तो इस समुदाय को साथ लाना बीजेपी के लिए राजनीतिक मजबूरी नहीं बल्कि सशक्त भारत के उसके संकल्प के लिए जरूरी है। एक मजबूत राष्ट्र का निर्माण तभी संभव है जब देश का कोई भी तबका वंचित न रहे और पसमांदा के विकास पर जोर देना, ‘सबका साथ-सबका विकास’ वाली रणनीति का ही हिस्सा है।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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