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चुनाव हारने के बाद भी एक रणनीतिक गलती कर बैठे राहुल, पीएम मोदी से सीख सकते थे राजनीति

Ajay Khemariyaअजय खेमरिया Updated Wed, 12 Jun 2019 06:07 PM IST
राहुल गांधी औऱ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनो एक ही दिन केरल में थे।
राहुल गांधी औऱ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनो एक ही दिन केरल में थे। - फोटो : पीटीआई
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राहुल गांधी औऱ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनो एक ही दिन केरल में थे। दोनों 23 मई के बाद पहली बार सार्वजनिक समारोहों में सम्मिलित हुए।राहुल गांधी अपने संसदीय क्षेत्र वायनाड के दौरे पर थे और मतदाताओं का आभार व्यक्त करने गए थे जिन्होंने उन्हें मोदी की प्रचंड आंधी में भी जिताने का काम किया। प्रधानमंत्री भी चुनाव बाद केरल में अपनी पहली जनसभा में मतदाताओं को धन्यवाद दे रहे थे बावजूद इसके की देशव्यापी मोदी लहर में केरल के लोगों ने उन्हें एक भी सीट नहीं दी।
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दरअसल, पहली नजर में दोनो के दौरे में कोई तुलना नहीं है, लेकिन राहुल गांधी के बनिस्बत मोदी का यह दौरा एक बार फिर उन्हें भारत की समकालीन राजनीति का अचूक योद्धा साबित करने वाला ही रहा।वैसे राहुल गांधी को धन्यवाद देने के लिए जाना तो अमेठी चाहिए था वायनाड से पहले। जहां से वे तीन बार से सांसद थे जबकि उनके पिता स्व राजीव गांधी,चाचा स्व संजय गांधी और दादी इंदिरा गांधी सांसद रहे।

एक तरह से जिस अमेठी ने गांधी परिवार से राजनीति की जगह भावनात्मक रिश्ता तीन पीढ़ियों तक कायम रखा उसके प्रति राहुल की जवाबदेही पहले है, भले ही वे इस चुनाव में अमेठी से हार गए हों पर यह मार्के वाली बात ही है कि विकासऔऱ कल्याण के पैरामीटर से परे जाकर जिस अमेठी की जनता ने तीन पीढ़ियों के साथ एक रिश्ते को कायम करके रखा उसे राहुल गांधी ने वायनाड की परिस्थिति जन्य जीत के ऊपर प्राथमिकता नहीं दी।

इस रिश्ते की डोर को कमजोर करने का जिम्मा अगर किसी के पास है तो वे सिर्फ राहुल गांधी ही हैं क्योंकि स्मृति ईरानी तो एक तो विपक्षी के तौर पर अपना कर्तव्य निभा रही थी वह भी पूरी ईमानदारी से। ईमानदारी में न्यूनता तो सांसद के रूप में राहुल की ही है इसमें दोष अमेठी के रिश्ते का नहीं है।

स्मृति ईरानी की रणनीति से सीखना होगा राहुल को 
स्मृति ईरानी अगर जीतने के बाद अपने एक कार्यकर्ता की हत्या के चार घण्टे के दरमियान अमेठी जाकर अंतिम यात्रा में कंधा देने पहुंच जाती है तो राहुल तो वहां उनसे पहले के विजेता थे उनका कोई उदाहरण आज तक सामने क्यों नही आया? यही बुनियादी अंतर भारत की मौजूदा राजनीति में राहुल गांधी शायद समझ नही पा रहे हैं।

उधर प्रतीकों की राजनीति के महत्व को जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने मथा है उसका कोई विकल्प आज समूचे विपक्षी जमात को समझ नहीं आ रहा है। राहुल जिस समय वायनाड में मुस्लिम औऱ ईसाई बिरादरी के साथ बैठकर उन्हें धन्यवाद दे रहे थे ठीक उसी समय प्रधानमंत्री  केरल के कृष्ण मंदिर में खांटी हिन्दू की वेशभूषा में अनुष्ठान में ध्यान लगा रहे थे। यही नहीं वे बकायदा अपने क्रेडिट कार्ड से अनुष्ठान का शुल्क भी ऑनलाइन ट्रांसफर करते हैं। दोनों नेताओं की तस्वीरें, वीडियो देश भर ने खबरिया चैनलों पर देखी। यह प्रतीकात्मक महत्व सिर्फ चुनावी नहीं है बल्कि इसे मोदी और भाजपा ने कांग्रेस को स्थाई रूप से आइसोलेटेड करने का उपकरण बना लिया है।
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