क्या ‘लेफ्ट’ सचमुच खत्म हो रहा है? क्यों वामपंथी पार्टियों पर जनता नहीं जताती भरोसा
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यह सवाल लंबे समय से उठाया जा रहा है कि क्या देश से वामपंथ खत्म हो गया? जिस तरह पिछले डेढ़ दशक से लेफ्ट फ्रंट अपनी ताकत और जनाधार खोकर सिमटता जा रहा है, उससे यह सवाल और गंभीर हो गया है। इस बार के चुनावी नतीजों ने लेफ्ट के फिर से उभरने की उम्मीद को और धूमिल कर दिया है। लेकिन वामपंथी नेता अब भी ये मानने को तैयार नहीं हैं कि उनकी रणनीति या ज़मीनी कामकाज के तौर तरीकों में कोई कमी रही।
आखिर क्यों रणनीति नहीं बदल रहा लेफ्ट?
सीपीएम महासचिव सीताराम येचुरी यही मानते हैं कि देश को सांप्रदायिक आधार पर बांट देने और समाज को तोड़ देने वाली विचारधारा को इस हद तक फैला देने की वजह से ही ऐसे नतीजे आए हैं। येचुरी, हन्नान मोल्ला और सीपीआई नेता डी राजा भी यही कहते हैं कि हार की समीक्षा होगी और हम अपनी कमियों को तलाशने की कोशिश करेंगे।
दरअसल, यह कोई नई बात नहीं है और वामपंथी नेता हर चुनाव के बाद ऐसा कहते हैं। सिर्फ वामपंथी ही नहीं, कांग्रेस से लेकर तमाम विपक्षी पार्टियां अपनी हार के कारणों की तलाश करने की बात करने के सिवा फिलहाल और कुछ कहने की स्थिति में भी नहीं हैं।
क्यों सिमट रहा है लेफ्ट
1952 के बाद से ये पहली बार हुआ है कि लेफ्ट 2 अंकों तक भी नहीं पहुंच सका। अबतक की सबसे कम सीटें उसे हासिल हुई हैं। इस बार महज 5 सीटें हासिल करने वाली वामपंथी पार्टियों के लिए यह सबसे शर्मनाक है कि किसी ज़माने में लेफ्ट का गढ़ माने जाने वाले पश्चिम बंगाल में उसका पूरी तरह सफाया हो गया।
दरअसल, लगातार 34 सालों तक बंगाल पर राज करने वाले लेफ्ट को पिछले चुनाव यानी 2014 में ही केवल 2 सीटों से संतोष करना पड़ा था, लेकिन इस बार तो वह भी उसके हाथों से चली गई। और तो और ज्यादातर सीटों पर उसकी ज़मानत जब्त हो गई। हालत ये हुई कि 2014 में उसका वोट प्रतिशत जहां 23 था, इस बार सिमट कर केवल सात फीसदी रह गया।
केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी एलडीएफ जहां लंबे समय तक सत्ता में रही है और आज भी लेफ्ट के नेता केरल का नाम लेते नहीं थकते, वहां इस बार उसे महज एक सीट से संतोष करना पड़ रहा है। इसकी वजह वहां के नेता बीजेपी की जबरदस्त एंट्री को मानते हैं। अभी तक वहां मुख्य मुकाबला एलडीएफ और युनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी यूडीएफ के बीच रहता आया है, लेकिन इस बार तीसरी ताकत के तौर पर केरल में बीजेपी मज़बूती से उभरी और एलडीएफ के ज्यादातर वोट उस तरफ चले गए।
फायदे में कांग्रेस जरूर रही, लेकिन लेफ्ट की ज़मीन यहां भी खिसक गई। लेफ्ट की थोड़ी बहुत इज्जत बचाई तो तमिलनाडु ने। यहां सीपीआई और सीपीएम को दो-दो सीटें मिली। कम से कम इसबार की इन पांच सीटों की बदौलत लेफ्ट अपनी थोड़ी बहुत मौजूदगी का एहसास तो करा पाने में सफल रहा ही है।
देश में रहा है तीन विचारधाराओं का टकराव
अगर वैचारिक स्तर पर देखें तो अपने देश में करीब नौ दशकों से तीन विचारधाराओं का टकराव रहा है,राजनीति इन्हीं के इर्द-गिर्द घूमती रही है वामपंथ, दक्षिणपंथ और मध्यमार्गी। समाजवादी विचारधारा को आमतौर पर इन तीनों के एक समावेशी मेल के तौर पर देखा जाता रहा है। कांग्रेस भी बार-बार खुद को विचारधारा की लड़ाई लड़ने वाली पार्टी बताती आई है और हार के बावजूद कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर तमाम कांग्रेसी नेता कार्यसमिति की बैठक में चिंतन मनन करने के बाद यही कहते हैं कि उनका वैचारिक संघर्ष जारी रहेगा।
इसी तरह वामपंथी भी इस बात को कहने में कोई गुरेज़ नहीं करते कि भले ही सीटें कम होती जा रही हों या वोट प्रतिशत गिरता जा रहा हो, लेकिन उनके वैचारिक जनाधार की ताकत बरकरार है।
लेफ्ट के नेता इस बार यही कह रहे हैं कि हम कभी भी सत्ता पाने के लिए चुनाव नहीं लड़ते। इस बार भी हमारी कोशिश बीजेपी को रोकना था और इसके लिए हमने कांग्रेस और तमाम विपक्षी ताकतों का समर्थन किया। लेफ्ट ने अपने महज सौ उम्मीदवार उतारे। ठीक है हम 5 ही जीते, लेकिन जब देश में सांप्रदायिक सोच और मानसिकता का इतने बड़े पैमाने पर विस्तार और प्रचार हुआ हो, सुनियोजित तरीके से मोदी की इस कथित आंधी की तैयारी की गई हो, तो ऐसे में हम 5 सीटें ही पा गए, तो कम नहीं है। कम से कम संसद में अपनी बात रखने के लिए हमारा नुमाइंदा तो है। वरना बीजेपी का बस चले तो देश में एकदलीय व्यवस्था लागू हो जाए और निरंकुशता अपने चरम पर पहुंच जाए। इसकी कोशिश दक्षिणपंथी ताकतें लगातार कर ही रही हैं और इसमें कामयाब भी हो रही हैं।
अतुल कुमार अंजान से लेकर सीताराम येचुरी तक यही मानते हैं कि वामपंथ कभी खत्म नहीं हो सकता और जितनी मजबूत इस तरह की ताकतें होंगी, वामपंथ की ज़मीन उतनी मज़बूत होगी। हां, यह ज़रूर है कि अभी फौरी तौर पर हमें अपनी कमियों को तलाशना होगा, जनाधार मज़बूत करने और वैचारिक लड़ाई के विस्तार की नई रणनीति बनानी होगी। और सबसे बड़ी चुनौती तो ये है कि जिस तरह देश को तोड़ने वाली ताकतें मज़बूत हुई हैं और नई पीढ़ी को अपने वैचारिक जाल में फंसा रही हैं, उसका मुकाबला कैसे किया जाए। जाहिर है, इसके लिए लोकतांत्रिक और प्रगतिशील ताकतें हताश न होकर नए मनोबल के साथ फिर से खड़ी होंगी और यह मुहिम वामपंथी ताकतें ही चला सकती हैं।
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