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मोदी ने नई तरह से दिए चुनाव प्रणाली में बदलाव के संकेत? ये बड़े फैसले ले सकती है नई सरकार

Jay singh Rawatजयसिंह रावत Updated Tue, 28 May 2019 03:47 PM IST
17वीं लोकसभा के चुनाव परपंरा से हटकर रहा।
17वीं लोकसभा के चुनाव परपंरा से हटकर रहा। - फोटो : PTI
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संसदीय लोकतंत्र में पहले सांसद (एमपी) चुने जाते हैं और फिर वही सांसद बहुमत के आधार पर प्रधानमंत्री (पीएम) को चुनते हैं। लेकिन 17वीं लोकसभा के चुनाव में मामला उल्टा-उल्टा सा नजर आया, क्योंकि प्रधानमंत्री ने चुनाव अभियान के दौरान स्वयं ही स्वयं को पीएम घोषित कर लिया और उसके बाद देश की जनता से एमपी चुनने की अपील कर दी। चुनाव अभियान के इस नये ढर्रे को संवैधानिक परम्पराओं की उलटबासी या मोदी विरोधियों की खामो-खयाली कहकर टाल देने के बजाय आने वाले समय में देश की शासन व्यवस्था में बड़े बदलावों का संकेत माना जा सकता है।
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आखिर किस बदलाव की ओर है व्यवस्था? 
दरअसल, देश के संसदीय लोकतंत्र की खामियों और प्रजातांत्रिक गणराज्य की अवधारणा के सही अर्थों में फलीभूत न होने के कारण संसदीय लोकतंत्र के विकल्प के रूप अमेरिका और फ्रांस जैसे देशों की तरह ऐसी राष्ट्रपति प्रणाली की वकालत की जा रही है, जिसमें राष्ट्र प्रमुख ही शासन प्रमुख होता है जो कि भारत की तरह न तो विधायिका के प्रति जवाबदेह होता है और ना ही विधायिका बहुमत के आधार पर उसे हटा सकती है, उसमें सामूहिक जिम्मेदारी की भी सोच नहीं है, क्योंकि वहां मंत्री चुने हुए लेजिस्लेटर्स की नहीं बल्कि राष्ट्रपति द्वारा अपनी पसन्द से नियुक्त होते हैं।

लोकसभा या विधानसभाओं के चुनाव सदैव मौजूदा सरकार और उसके मुखिया की उपलब्धियों और भावी कार्यक्रमों पर लड़े जाते हैं और मुखिया के पिछले कामकाज पर जनता अपना फैसला भी देती है, इसलिए अब डेमोक्रेसी और एण्टी इन्कम्बेंसी एक ही सिक्के के दो पहलू जैसे ही हो गए हैं। अगर फैसला पक्ष में गया तो सरकार के उस मुखिया का दुबारा मुखिया चुने जाने की केवल औपचारिकता ही रह जाती है, इसीलिये अक्सर राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए भावी मुखिया के तौर पर एक चेहरा आगे कर लेते हैं और चुनाव जीतने पर वही नेता सरकार का मुखिया बनने के लिए औपचारिक तौर पर निर्वाचित सदस्यों के बहुमत से चुन लिया जाता है। लेकिन राजनीतिक दल भले ही उस नेता को चुनाव अभियान में मुखिया घोषित कर लें मगर उस भावी मुखिया ने इस चुनाव से पहले तक कभी भी स्वयं को प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री घोषित करने में संयम जरूर बरता है। लेकिन इस बार लोकसभा के लिए जिस तरह चुनाव अभियान चला वह अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव की तरह का ही था।
 
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