मध्य प्रदेश में कहां हो गई कांग्रेस से भूल? बेहद अलग रहा भाजपा का प्रचार तंत्र और संगठन का गणित
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17वीं लोकसभा चुनाव के जो परिणाम सामने आ रहे हैं वह तकरीबन-तकरीबन एग्जिट पोल के हिसाब से हैं। खास बात यह है कि हिंदी पट्टी के बड़े राज्य मप्र में जहां भाजपा ने 29 में से 28 सीटों पर आगे चल रही है।
मध्य प्रदेश में लोकसभा की कुल 29 सीटें हैं। इन सीटों में से फिलहाल भारतीय जनता पार्टी के पास 26 सीटें हैं। दरअसल, 2014 के चुनाव में भारतीय जनता पार्टी, मध्य प्रदेश की 27 सीटों पर चुनाव जीती थी। लेकिन जब झाबुआ सीट पर उपचुनाव हुआ, तो वहां से भाजपा हार गई और कांग्रेस के कांतिलाल भूरिया चुनाव जीत गए।
मप्र में कांग्रेस क्यों पिछड़ी?
इस बार मध्य प्रदेश की स्थिति थोड़ी बदली हुई है। यहां अभी हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने विगत 15 सालों से सत्ता पर काबिज भाजपा से सत्ता छीन ली। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि मध्य प्रदेश में कांग्रेस की तुलना में भाजपा का वोट प्रतिशत ज्यादा था। लेकिन सत्ता के चमत्कारी आंकड़ों तक भाजपा नहीं पहुंच पायी। मसलन इस बार मध्य प्रदेश संसदीय चुनाव भाजपा के लिए थोड़ा कठिन तो जरूर दिखा।
कांग्रेस के खिलाफ भाजपा को किन बातों से परेशानी, किससे फायदा
दूसरी बात यह है कि अधिक समय से सत्ता का सुख प्राप्त करने वाले भाजपा के नेता और कार्यकर्ता कांग्रेस की तुलना में ज्यादा आरामपरस्त दिखने लगे हैं। यही नहीं, भाजपा के अंदर कई प्रकार के अंतरविरोध हैं। एक ओर साध्वी उमा भारती हर समय बखेड़ा खड़ा करती रहती हैं तो दूसरी ओर पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की अपनी समस्या है। इन दिनों मध्य प्रदेश भाजपा कई खेमों में भी विभाजित है, लेकिन शिवराज सिंह का खेमा अभी भी मजबूत बताया जा रहा है।
इन तमाम मुद्दों और मामलों के बीच इस बार जो मध्य प्रदेश में भाजपा के लिए सकारात्मक है, वह कांग्रेस सरकार की असफलताएं हैं। सच पूछिए तो जिस किसान के मुद्दों पर चढ़कर मध्य प्रदेश कांग्रेस सत्ता में आई, उसी किसान वाले मुद्दों ने कांग्रेस को संसदीय चुनाव में आईना दिखाया है। इस मुद्दे को भाजपा खूब उछाला और इससे भाजपा को फायदा भी होता दिख रहा है।
कौन किसकी नाकामियों को भुनाने में सफल हुआ
इस मामले में भोपाल से समय जगत हिन्दी दैनिक अखबार के संपादक अशोक त्रिपाठी कहते हैं- भाजपा चाहे जो कह ले, मध्य प्रदेश में इस बार भाजपा 20 संसदीय क्षेत्र में मजबूत स्थिति में पहले से ही थी।
एक सवाल के जवाब में त्रिपाठी कहते हैं- कांग्रेस पार्टी केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार की नाकामियों को भुनाने में असफल रही है, जबकि भाजपा ने प्रदेश सरकार की नाकामियों को बड़ी तसल्ली से भुना लिया। यही नहीं, भाजपा ने योजनाबद्ध तरीके से कांग्रेस की निगेटिविटी का प्रचार किया।
राष्ट्रवाद के मुद्दे पर वोट मांगा, नरेन्द्र मोदी को प्रभावशाली व्यक्तित्व के रूप में प्रस्तुत करने में सफल रही। लोगों के बीच राष्ट्रीय सुरक्षा का भाव जगाने में सफलता हासिल की। भाजपा ने अपने चुनावी प्रचार के तिलस्म में बड़ी चतुराई से जीएसटी और नोटबंदी के मुद्दे को गायब कर दिया। ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो कांग्रेस के लिए भारी पड़े और इससे मध्य प्रदेश में कांग्रेस को जो फायदा मिलना था, वह नहीं मिल पाया।
मध्यप्रदेश में कैसा रहा कांग्रेस का प्रदर्शन
कुल मिलाकर देखें तो मध्य प्रदेश में कांग्रेस केन्द्र सरकार की नकारात्मकता का प्रचार करने में असफल रही, जबकि प्रदेश भाजपा ने राज्य सरकार की असफलताओं का भरपूर प्रचार किया, जिसका लाभ भाजपा को होता दिखाई दे रहा है और भाजपा प्रदेश की 24 से ज्यादा सीटों पर अपनी जीत दर्ज करा सकती है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।