बिहार से ग्राउंड रिपोर्टः भोजपुर, चंपारण, मिथिलांचल, सीमांचल, कोसी और मगध-पाटलिपुत्र का हाल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
बिहार में अब लोकसभा चुनाव का केवल एक चरण बाकी है। राज्य में कई दिग्गजों का बहुत ही अहम सीटों पर मुकाबला है। मधेपुरा में आरजेडी की टिकट पर चुनाव जेडीयू नेता शरद यादव लड़ रहे हैं तो वहीं बीजेपी से नाता तोड़ कांग्रेस में शामिल हुए शत्रुघ्न सिन्हा का बीजेपी के केंद्रीय मंत्री रवि शंकर प्रसाद के खिलाफ मुकाबला है।
बेगूसराय से बेमन से चुनाव मैदान में उतरे केंद्रीय मंत्री गिरिराज सिंह के खिलाफ राष्ट्रद्रोह के केस से सुर्खियों में आए जेएनयू के पूर्व छात्र नेता कन्हैया कुमार आमने-सामने हैं। जबकि सिवान सीट पर जदयू-बीजेपी गठबंधन से बाहुबली अजय सिंह की पत्नी कविता सिंह और आरजेडी के टिकट पर शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब के बीच टक्कर से पूरा बिहार चुनावी संग्राम का सबसे अहम क्षेत्र बन गया है।
क्यों अहम बन गया है बिहार का चुनावी संग्राम?
2019 में केंद्र सरकार बनाने में बिहार भी काफी महत्वपूर्ण भूमिका होगी। बिहार में कुल 40 विधानसभा सीटें हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी को 22 और उसके सहयोगी एलजेपी 6 और आरएलएसपी को 3 सीटें मिली थी। हालांकि, अब आरएलएसपी एनडीए से अलग हो गई। वहीं, जेडीयू एक बार फिर एनडीए का हिस्सा बन चुकी है।
बीजेपी पिछले चुनाव की तुलना में 17 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। ऐसे में चुनाव से पहले ही उसकी सीटें घट गई हैं। वहीं, कांग्रेस और आरजेडी एक साथ है। तेजस्वी यादव के नेतृत्व में आरजेडी का ग्राफ बेहतर हुआ है। 2015 विधानसभा चुनाव के नतीजों ने आरजेडी और कांग्रेस के प्रदर्शन से लगता है कि बिहार में महागठबंधन बीजेपी-जेडीयू को ठीक-ठाक चुनौती देगा।
क्यों अलग है ये चुनाव?
2019 का चुनाव 2009 और 2014 के चुनावों से बेहद अलग है। 2009 में बीजेपी और जेडीयू ने मिलकर चुनाव लड़ा था और आरजेडी और कांग्रेस अगल-अलग चुनावी मैदान में थे। जबकि 2014 में तीन प्रमुख पार्टियों यानी बीजेपी, जेडीयू और आरजेडी अपने बूते पर चुनाव मैदान में थीं। 2019 में बीजेपी, जेडीयू और राम विलास पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी (एलजेपी) के साथ गठबंधन में चुनाव लड़ रही हैं।
एनडीए को सबसे ज्यादा फायदा जेडीयू के साथ आने से हो रहा है, लेकिन यहां ये बताना जरूरी है कि 2014 लोकसभा चुनावों से पहले ही नीतीश कुमार ने प्रधानमंत्री पद के लिए नरेंद्र मोदी के नाम का विरोध कर एनडीए से किनारा कर लिया था और बीजेपी ने नीतीश विरोध के नाम पर चुनाव लड़ा था। विपक्षी दलों ने भी महागठबंधन बनाकर लोकसभा चुनाव में एनडीए को बिहार में चुनौती दी है। जिसमें आरजेडी, कांग्रेस, उपेंद्र प्रसाद की राष्ट्रीय लोक समता पार्टी (आरएलएसपी), जितन राम माझी की हिन्दोस्तान अवाम मोर्चा (हम) और विकासशील इंसान पार्टी शामिल हैं।
अगर इन सब पार्टियों के वोट बैंक पर नज़र डालें तो ये साफ दिखाई देगा कि एनडीए ने अगड़ी जातियों (बीजेपी), गैर-यादव ओबीसी खासतौर से अति पिछड़े वर्ग और पासवान वोट का एक समीकरण बनाने की कोशिश की है, वहीं राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) ने मुस्लिम और यादव वोट के आधार को छोटी पार्टियों के साथ मिलकर बढ़ाने की रणनीति तैयार की है। जिसमें जितन राम माझी के महादलित वोट, उपेंद्र प्रसाद की आरएलएसपी के कुशवाहा वोट और विकासशील इंसान पार्टी के निशाद वोट शामिल हैं।
इस चुनाव में आरजेडी केवल 19 सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जो राज्य की 40 लोकसभा सीटों की आधी भी नहीं है। ये पहली बार है कि आरजेडी बिहार में किसी गठबंधन के बावजूद 25 से कम सीटों पर चुनाव लड़ने जा रही है और लालू प्रसाद यादव के जेल में होने के कारण और चुनाव में शामिल न हो पाने से भी आरजेडी के लिए ये चुनाव उतना आसान नहीं होगा। आरजेडी को अति पिछडे़ वर्ग के वोटों के लिए दूसरे सहयोगी दलों पर निर्भर होना होगा।
किन मुद्दों पर चुनाव है बिहार में?
बिहार में राष्ट्रीय सुरक्षा, बालाकोट में पाकिस्तान पर भारतीय वायूसेना की कार्रवाई, पुलवामा जैसे मुद्दों पर बात हो रही है। साथ ही विपक्ष इस मुद्दे के सामने रोज़गार, लोकसभा और विधानसभा चुनावों में बीजेपी के अधूरे वादों को चर्चा में लाने की कोशिश कर रहा है। जबकि आरजेडी ने केंद्र की अगड़ी जातियों के लिए 10 फिसदी आरक्षण का विरोध किया था, तब भी वो चुनाव में इसे मुद्दा नहीं बना पाए हैं।
दूसरी ओर कांग्रेस की न्यूनतम आय योजना यानी न्याय को भी महागठबंधन भुनाने में कामयाब नहीं दिखता। नीतीश कुमार के सड़क, बिजली और पानी के मामले में काम के कारण राज्य में स्थानीय मुद्दे हावी नहीं दिखते।
राज्य को अगर हम अलग-अलग भागों में बांट कर बात करें तो बिहार में भोजपुर, चंपारण, मिथिलांचल, सीमांचल, कोसी और मगध-पाटलिपुत्र क्षेत्र हैं। आइए जानते हैं क्षेत्र के आधार पर क्या है सीटों का हाल।
भोजपुर
भोजपुर इलाका उत्तर प्रदेश से लगता है और वाराणसी के नज़दीक है। यहां 8 लोकसभा सीटों पर 2014 में एनडीए ने जीत हासिल की थी। बक्सर, आरा, सासाराम, काराकाट, गोपालगंज, सिवान, महाराजगंज, और सारन की आठ लोकसभा सीटों में से काराकट पर आरएलएसपी चुनाव लड़ रही है। पिछली बार यहां से आरएलएसपी के प्रमुख उपेंद्र कुशवाहा ने चुनाव जीता था।
इस बार उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी महागठबंधन का हिस्सा है। सिवान पर इसबार एनडीए में शामिल जेडीयू चुनाव लड़ रही है। बक्सर, आरा सासाराम और काराकट में अगड़ी जातियों का प्रभाव काफी है और एनडीए के लिए यहां बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद है, वहीं गोपालगंज, सिवान, महाराजगंज, और सारन में आरजेडी का प्रभाव दिखाई देता है।
बक्सर
बक्सर की सीट पर केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे को आरजेडी से कड़ी चुनौती है और ये सीट एनडीए के लिए मुश्किल पैदा कर सकती है। लोग जाने इसे मिनी काशी क्यों कहने लगे हैं। काशी और बक्सर में समानता ढूंढ़ने पर सिर्फ़ यही मिलती है कि गंगा यहां भी है और वहां भी। भाजपा यहां भी है और वहां भी। ब्राह्मण भी दोनों जगह बहुत संख्या में हैं। जेडीयू के ददन पहलवान पिछली बार लोकसभा के प्रत्याशी थे। मगर गठबंधन में सीट बीजेपी के पाले में चली गई।
अब पहलवान भाजपा के अश्विनी चौबे के साथ हैं। वैसे ही रवि राज जो स्थानीय बीजेपी का एक मज़बूत स्तंभ माने जाते थे गिर चुके हैं। टिकट नहीं मिलने के कारण विरोध में आ गए हैं। प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लो.) के उम्मीदवार के तौर पर चुनाव लड़ रहे हैं।
असल लड़ाई बीजेपी के अश्विनी चौबे और आरजेडी के जगदानंद सिंह के बीच में है। पिछले लोकसभा चुनाव में भी लड़ाई इन्हीं दोनों के बीच थी। जगदानंद सिंह उस चुनाव में क़रीब एक लाख 32 हज़ार वोटों से हार गए थे। 1857 में भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख योद्धा बाबू कुंवर सिंह की कार्यस्थली इसकी पहचान है।
आरा
आरा वर्तमान में लोकसभा क्षेत्र का प्रतिनिधित्व भाजपा के राजकुमार सिंह कर रहे हैं, जो केन्द्र सरकार में ऊर्जा राज्यमंत्री के स्वतंत्र प्रभार में हैं। आरा लोकसभा क्षेत्र में 7 विधानसभा क्षेत्र हैं। वर्तमान में यहां आरजेडी का वर्चस्व है। पिछले पांच साल में मेडिकल कॉलेज, इंजीनियङ्क्षरग कॉलेज, सोन नहर का पक्कीकरण, रेलवे का विस्तार, कोईलवर सिक्स लेन पुल का निर्माण, आरा-बक्सर फोरलेन का निर्माण किया गया है।
आरा-पटना फोरलेन का निर्माण कार्य प्रगति पर है। यहां बेरोजगारी, अपराध पर लगाम, शाहाबाद को प्रमंडल की मांग, और शहर में ट्रैफिक व्यवस्था को सही कराना प्रमुख मुद्दे हैं। बीजेपी ने राजकुमार सिंह को एक बार फिर उम्मीदवार के तौर पर मैदान में उतारा है और मुकाबला सीपीआईएमएल के राजू यादव से है वैसे बीएसपी ने भी मनोज यादव को टिकट दिया है।
सारण
सारण लोकसभा सीट पर 6 मई को पांचवें चरण में वोट डाले गए। लोकनायक जय प्रकाश नारायण की जन्मभूमि सारण लोकसभा सीट बिहार की सबसे हाई प्रोफाइल संसदीय सीट मानी जाती है। यहां मुख्य मुकाबला बीजेपी राजीव प्रताप रूडी और आरजेडी के चंद्रिका राय के बीच रहा है।
2014 में सारण सीट से बीजेपी के उम्मीदवार राजीव प्रताप रूडी जीते थे। रूडी ने लालू यादव की पत्नी और बिहार की पूर्व सीएम राबड़ी देवी को हराया। सारण संसदीय सीट के तहत विधानसभा की 6 सीटें आती हैं। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में 4 सीटों पर आरजेडी और 2 सीटों पर बीजेपी ने कब्जा जमाया था। पूरे भोजपुर में अगड़ी जातियों को 10 फीसदी का आरक्षण और सिंचाई का पानी ऐसे मुद्दे हैं जो चुनाव पर प्रभाव डाल रहे हैं।
काराकाट
काराकाट क्षेत्र चावल उत्पादन के लिए जाना जाता है। इस क्षेत्र में लगभग 400 राइस मिल हैं। इसके पूर्व यह बिक्रमगंज लोकसभा क्षेत्र के नाम से जाना जाता था। 2014 के लोकसभा चुनाव में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा ने जीत दर्ज की थी।
उपेंद्र कुशवाहा की आरएलएसपी पूर्व में एनडीए की सहयोगी थी, लेकिन सीट शेयरिंग को लेकर दोनों पार्टियों में बात बिगड़ गई और कुशवाहा एनडीए छोड़कर विपक्षी धड़े के महागठबंधन में शामिल हो गए। इस बार मुख्य मुकाबला उपेन्द्र कुशवाहा और जेडीयू के महाबली सिंह के बीच है।
2015 के विधानसभा चुनावों में काराकाट लोकसभा सीट में आने वाली 6 विधानसभा क्षेत्रों में 4 पर आरजेडी, एक पर बीजेपी और एक पर जेडीयू का कब्जा है। आरएलएसपी के उपेन्द्र कुशवाहा को कोइरी, यादव और मुसलमान के वोटों का गठजोड़ मजबूत बनाता है। वहीं महाबली सिंह सवर्ण और जेडीयू के अति पिछड़े वोटर्स के सहारे हैं। बीएसपी ने इस सीट से स्थानीय उम्मीदवार अनिल सिंह यादव को टिकट देकर मुकाबले को रोचक बना दिया है।
मगध-पाटलिपुत्र
इस इलाके की 10 लोकसभा सीटों में से लगभग सभी नक्सल प्रभावित हैं। इनमें पाटलिपुत्र, पटना साहिब, जहानाबाद, औरंगाबाद, गया, नवादा, जमुई, बांका, मुंगेर और नालंदा शामिल हैं। इस इलाके में काफी महत्वपूर्ण उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं। इलाके में विकास का काम दिखता है, यही कारण है कि लोगों में नितिश कुमार से कई मामलों में नाराज़गी के बावजूद लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम पर वोट देने की बात कर रहें हैं।
इस इलाके में गया और औरंगाबाद की सीटें महागठबंधन के सहयोगी जितन राम मांझी के पाले में हैं और वो खुद गया से और उपेंद्र प्रसाद को औरंगबाद से चुनाव मैदान में उतार रहें हैं ताकि कुशवाहा वोट जो एनडीए की तरफ झुके हुए हैं उसमें सेंध लगाई जा सके। गया सीट पर एनडीए और महागठबंधन के बीच कांटे की टक्कर रही।
गया
सीट से एनडीए के समर्थन के साथ इस बार जेडीयू की ओर से विजय कुमार चुनाव लड़े। जीतनराम मांझी इस क्षेत्र के कद्दावर नेता हैं, उनकी पार्टी हिंदुस्तान अवाम मोर्चा को महागठबंधन का समर्थन हासिल है। वहीं बीजेपी के हरी मांझी इस सीट के मौजूदा सांसद हैं। 2014 में जीतनराम मांझी तीसरे नंबर पर रहे जो जेडीयू के टिकट पर चुनावी मैदान में थे। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में 6 सीटों में से 3 सीटों पर आरजेडी जबकि 1-1 सीट पर बीजेपी-जेडीयू और कांग्रेस को जीत मिली थी।
पटना
साहिब में केंद्रीय मंत्री रवी शंकर प्रसाद चुनाव मैदान में हैं जिनके खिलाफ बीजेपी से अलग हुए कांग्रेस में शामिल शत्रुघन सिन्हा मैदान में हैं। ये क्षेत्र कायस्थ वोट बाहुल्य माना जाता है। 2009 और 2014 में यहां से सांसद फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा ने बीजेपी के टिकट पर चुनाव जीता था। लेकिन अब बीजेपी के शीर्ष नेतृत्व से उनका मतभेद जगजाहिर है।
शत्रुघ्न सिन्हा ने 2014 के चुनाव में भोजपुरी फिल्म स्टार व कांग्रेस उम्मीदवार कुणाल सिंह को 2 लाख 65 हजार वोटों से हराया था। इस सीट को भारतीय जनता पार्टी का गढ़ माना जाता है। इस इलाके में अगड़ी जातियों के प्रभाव के कारण एनडीए बेहतर स्थिति में दिखाई देता है।
पाटलिपुत्र
बिहार की राजधानी पटना की दूसरी सीट पाटलिपुत्र में लड़ाई आमने-सामने की है। एक तरफ लालू की बेटी मीसा भारती मैदान में हैं, तो दूसरी ओर एक वक्त लालू के हनुमान कहे जाने वाले रामकृपाल यादव बीजेपी का झंडा बुलंद किए हुए हैं। यादव बहुल सीट पर दो यादवों के बीच लड़ाई है और इस जंग में जीतेगा वही जो खुद को बड़ा यादव साबित कर पाएगा। दोनों के बीच कांटे की टक्कर मानी जा रही है, इस आर-पार की लड़ाई में जीत की एक महीन लकीर है। 2014 में हुए चुनाव में बीजेपी के रामकृपाल यादव ने जीत दर्ज की थी।
जहानाबाद
जहानाबाद में 1998 के बाद से हर बार सांसद बदलते रहने की परंपरा दिखी। 2014 के चुनाव में इस सीट से एनडीए की सहयोगी आरएलएसपी के उम्मीदवार डॉ. अरुण कुमार जीते थे। लेकिन बाद में पार्टी से मतभेद के बाद अलग हो गए. 2019 चुनाव से पहले आरएलएसपी भी एनडीए से अलग होकर महागठबंधन के खेमे में आ गई. इस कारण से जहानाबाद की सियासी लड़ाई काफी रोचक हो गई है।
जहानाबाद नक्सल प्रभावित जिला है और सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। यह इलाका कई नक्सली हमलों का गवाह रहा है और नक्सलियों के रेड कॉरिडोर का हिस्सा माना जाता है। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में यहां की 6 सीटों में से 4 आरजेडी ने, जबकि 2 सीटें जेडीयू ने जीतीं थी। जहानाबाद से सांसद डॉक्टर अरुण कुमार का मुकाबला जेडीयू के चन्द्रेश्वर प्रसाद चंद्रवंशी और आरजेडी से सुरेंद्र यादव से हुआ।
औरंगाबाद
इस सीट पर इस बार लड़ाई भारतीय जनता पार्टी, बीजेपी बनाम महागठबंधन की है। यानी सीधी लड़ाई बीजेपी के सुशील कुमार सिंह और महागठबंधन हिंदुस्तान आवाम मोर्चा (सेक्युलर) के उपेंद्र प्रसाद के बीच में हैं। औरंगाबाद में राजपूत वोटर्स हावी रहे हैं। राजस्थान के रजवाड़ो की तौर पर इस संसदीय सीट को बिहार का चित्तौड़गढ़ भी कहा जाता है।
यहां का इतिहास रहा है कि सिर्फ राजपूत प्रत्याशियों की ही जीत मिली है। यह सीट कांग्रेस की परंपरागत सीट भी कही जाती रही है। लेकिन 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में इस सीट से बीजेपी के सुशील कुमार सिंह जीते। वे जेडीयू से बीजेपी में आए थे। सुशील कुमार सिंह ने कांग्रेस के निखिल कुमार को हराया था।
नवादा
यहां से लोकजनशक्ति पार्टी ने चंदन सिंह को चुनाव मैदान में उतारा है। वहीं महागठबंधन की ओर से आरजेडी ने विभा देवी पर दांव लगाया है। शिवसेना की ओर से रंगनाथ ने भी यहां से चुनाव लड़ा। इस सीट से फिलहाल बीजेपी के नेता गिरिराज सिंह सांसद हैं, लेकिन एनडीए के टिकट बंटवारे में यह सीट लोक जनशक्ति पार्टी के हिस्से आई जिसकी वजह से 2019 चुनाव के लिए गिरिराज सिंह को बेगूसराय से मैदान में उतारा गया।
नवादा संसदीय क्षेत्र में विधानसभा की 6 सीटें आती हैं, जिनमें हिसुआ, वारसलीगंज विधानसभा सीटों पर बीजेपी का कब्जा है, जबकि रजौली और नवादा पर आरजेडी और गोविंदपुर और बरबीघा विधानसभा सीटों पर कांग्रेस का कब्जा है। इस बार लोक जनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल के बीच कांटे का मुकाबला रहा।
जमुई
इस सीट से इस बार महागठबंधन के समर्थन वाली राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भूदेव सिंह और लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष राम विलास पासवान के बेटे चिराग पासवान के बीच कांटे की टक्कर है। लोकसभा चुनाव के पहले चरण में जमुई में मतदान हो चुका है।
2014 के लोकसभा चुनाव में जमुई (सुरक्षित) सीट से एलजेपी उम्मीदवार और रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने अपने प्रतिद्वंद्वी और आरजेडी उम्मीदवार सुधांशु शेखर भास्कर को हराया था। चिराग पासवान युवाओं में खासे लोकप्रिय माने जाते हैं। 'मोदी फैक्टर' के अलावा महादलितों की आबादी के वोटों का भरोसा चिराग को हो सकता है। लेकिन क्षेत्र के राजपूत वोटर उनके समर्थक नहीं लग रहे हैं।
बांका
लोकसभा सीट पर 18 अप्रैल को वोट डाले जा चुके हैं। जनता दल युनाइटेड के टिकट से गिरिधारी यादव, राष्ट्रीय जनता दल के टिकट से जय प्रकाश नारायण यादव, बहुजन समाज पार्टी से मोहम्मद राफिक आलम ने चुनाव लड़ा है। 2014 के चुनाव में आरजेडी प्रत्याशी जय प्रकाश नारायण यादव को जीत मिली थी। यहां आरजेडी का अच्छा वोट बैंक है। लेकिन नीतीश कुमार सरकार के खिलाफ कोई सत्ता विरोधी लहर नहीं दिखी। हालांकि नीतीश के एनडीए में शामिल होने से चुनावी समीकरण जरूर बदले हैं।
मुंगेर
लोकसभा सीट पर 29 अप्रैल को वोटिंग हुई। इस बार जेडीयू और कांग्रेस में यहां टक्कर रही है। 2014 के लोकसभा चुनाव में एलजेपी की प्रत्याशी वीणा देवी ने जीत हासिल की थी। उन्होंने जेडीयू के राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह को हराया था। मुंगेर संसदीय सीट पर कई वर्षों तक कांग्रेस का दबदबा रहा, लेकिन बीते कुछ साल से अलग-अलग पार्टियां जीत रही हैं। विजयी पार्टियों में कभी आरजेडी, कभी जेडीयू तो कभी एलजेपी का नाम है। हालांकि आंकड़े देखें तो इस सीट पर असली टक्कर जेडीयू और आरजेडी के बीच चली आ रही है।
नालंदा
नालंदा को मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के प्रभाव वाली सीट माना जाता है। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में पूरे देश में मोदी लहर के बावजूद बीजेपी नीतीश के गढ़ में सेंध नहीं लगा सकी थी। पिछली बार हुई सीट शेयरिंग में नालंदा सीट लोजपा के पास आई थी और पार्टी ने यहां से सत्यानंद शर्मा को टिकट दिया था।
जेडीयू प्रत्याशी कौशलेंद्र कुमार ने उन्हें करीब 10 हजार वोटों से हराया था। नालंदा सीट की एक और खासियत है कि प्रमुख पार्टियां यहां खुद चुनाव लड़ने से बचती रही हैं। पिछले चुनाव में भी जिले में सांगठनिक रूप से कमजोर एलजेपी के कंधे पर बंदूक रखकर बीजेपी ने निशाना साधने की कोशिश की थी।
इस बार महागठबंधन की ओर से राजद-कांग्रेस ने जिले में सांगठनिक रूप से कमजोर हिंदुस्तान आवाम मोर्चा के प्रत्याशी के कंधे पर बंदूक रख दिया है। इस बार के चुनाव में जेडीयू के कौशलेंद्र कुमार व महागठबंधन के चंद्रवंशी अशोक कुमार आजाद के बीच आमने-सामने की टक्कर है। लेकिन, पिछड़े वर्ग के वोटर तुरुप के पत्ते साबित हो सकते हैं।
वैसे तो जेडीयू प्रत्याशी कौशलेन्द्र कुमार तीसरी बार रणक्षेत्र में हैं। लेकिन, उनके वोटर सीधे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ही केन्द्रबिन्दु मान वोटिंग करते रहे हैं। नालंदा लोकसभा सीट के तहत सात विधानसभा क्षेत्र हैं। इनमें 6 पर जेडीयू-बीजेपी तो सातवें पर राजेडी का कब्जा है।
चूंकि, विधानसभा चुनाव के वक्त जेडीयू व राजेडी एक साथ था, तो चुनाव काफी आसान था। जिले की राजनीति में नीतीश कुमार की गहरी पैठ बनने के बाद जॉर्ज फर्नांडिस यहां से जीतकर 3 बार लोकसभा पहुंचे। वहीं वर्ष 2004 में नीतीश कुमार को लोगों ने मौका दिया। लेकिन, वे 2 साल ही सांसद के रूप में प्रतिनिधित्व कर सके।
नालंदा में मुद्दे की जगह जातीय गोलबंदी ही हावी है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने नालंदा में काफी विकास किया है। लेकिन, एयर स्ट्राइक के बाद यहां एकाएक सारे मुद्दे हवा-हवाई हो गए हैं। स्थानीय मुद्दे गौण हैं और चेहरे हावी हैं। एनडीए प्रधानमंत्री मोदी, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे और राष्ट्रवाद के मुद्दे पर अपना झंडा गाड़े हैं वहीं महागठबंधन जातियों को गोलबंद करने में जुटा है।
चंपारण
इस इलाके में 3 लोकसभा सीटें हैं वाल्मीकि नगर, पूर्वी चंपारण और पश्चिमी चंपारण। 2014 के चुनावों में सभा सीटें एनडीए के हाथ आई थी। भोजपुरी भाषी चंपारण का इलाका राजनीतिक रूप से काफी सक्रिय माना जाता है। चंपारण की धरती से ही महात्मा गांधी ने अंग्रेजों के खिलाफ 1917 में चंपारण सत्याग्रह की शुरुआत की थी। इलाके में अति पिछड़े वर्ग और अगड़ी जातियों को प्रभाव है।
आजादी के बाद से ही चंपारण के इलाके में कांग्रेस हर चुनाव में अपना दमखम दिखाती आ रही थी, लेकिन इमरजेंसी के बाद हालात बदले और बीजेपी ने यहां के सियासी हालात पर अपनी पकड़ मजबूत कर ली। पिछले दो चुनाव बीजेपी और जेडीयू के उम्मीदवारों ने जीते। 2019 में जेडीयू एनडीए का हिस्सा है। जाहिर है महागठबंधन के लिए चुनौती बड़ी है।
पूर्वी चंपारण
लोकसभा सीट चंपारण की धरती का सबसे अहम संसदीय सीट और बिहार की सियासत में काफी अहम माना जाता है। केंद्रीय कृषि मंत्री राधामोहन सिंह का चुनाव क्षेत्र होने के नाते बिहार सहित इस सीट पर पूरे देश की नजर है।
2002 के परिसीमन के बाद 2008 में अलग से ये सीट भी अस्तित्व में आई थी। 2009 और 2014 में राधामोहन सिंह ने इस सीट से चुनाव जीता था। इससे पहले भी वे इस सीट से 2 बार सांसद रह चुके हैं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी के राधामोहन सिंह ने आरजेडी के विनोद कुमार श्रीवास्तव को हराया।
2015 के विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 3 बीजेपी ने, 2 आरजेडी ने और 1 सीट एलजेपी ने जीती थी। पश्चिम चंपारण नेपाल सीमा पर स्थित है। 12 मई को हुए मतदान में मुख्य मुकाबला राधामोहन सिंह और कांग्रेस के दिग्गज नेता अखिलेश प्रसाद सिंह के बेटे आकाश कुमार सिंह के बीच है। आकाश की उम्र महज 27 साल है और खास बात ये है कि वे उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के टिकट पर मैदान में हैं।
मोतिहारी या कहें पूर्वी चंपारण में करीब ढाई लाख वोट भूमिहारों के हैं। अखिलेश सिंह को अपने स्वजातीय वोट बैंक का साथ मिलने का पूरा भरोसा है। वहीं, इलाके में 1 लाख 65 हजार के करीब राजपूत हैं जिन्हें राधा मोहन सिंह के कैंप का माना जा रहा है।
यादव और मुस्लिम वोट कुल मिलाकर 4 लाख से ज्यादा हैं जिन्हें महागठबंधन के खेमे का बताया जा रहा है। इसके विरोध में 4 लाख के करीब वैश्य मतदाता भी हैं जो बीजेपी के पक्ष में वोट देते आए हैं। यहां विकास की गति काफी धीमी है, पूर्वी चंपारण भी इससे अछूता नहीं है। यहां के किसान आज भी बुनियादी जरूरतों के लिए संघर्ष कर रहे हैं तो वहीं युवागण रोजगार के लिए तरस रहा है। ऐसे में विकास के नाम पर वोट मांगने वाली बीजेपी की यहां पर जीत इस बात पर निर्भर करेगी कि यहां की जनता अपने सांसद राधामोहन सिंह से किस हद तक संतुष्ट है।
पश्चिमी
पश्चिमी चंपारण जिले की मिट्टी उपजाऊ है। कृषि और छोटे-छोटे गृह उद्योग ही यहां के लोगों के रोजगार का प्रमुख जरिया है। अच्छी क्वालिटी के बासमती चावल तथा गन्ने के उत्पादन के लिए ये जिला मशहूर है। 2009 और 2014 के चुनावों में बीजेपी के संजय जायसवाल ने इस सीट से जीत हासिल की।
2015 के विधानसभा चुनाव के नतीजों पर गौर करें तो इस संसदीय क्षेत्र की 6 विधानसभा सीटों में से 4 बीजेपी ने जीती थी जबकि 1-1 सीट आरजेडी और कांग्रेस के हाथ आई थी। 2014 के चुनाव में पश्चिम चंपारण लोकसभा सीट से बीजेपी के डॉ. संजय जायसवाल ने जेडीयू उम्मीदवार और फिल्म निर्देशक प्रकाश झा को हराया था।
प्रकाश झा इस सीट से चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमाने उतरे थे, लेकिन मोदी लहर में जीत बीजेपी के हाथ लगी। इस बार बीजेपी की तरफ से डॉ संजय जायसवाल फिर से चुनावी मैदान में हैं। महागठबंधन के खाते से ये सीट आरएलएसपी को मिली है। यहां से डॉ ब्रजेश कुमार कुशवाहा आरएलएसपी के टिकट पर चुनाव लड़ा है। 2019 चुनाव से पहले बीजेपी और जेडीयू एकजुट होने के कारण बदले समीकरणों में महागठबंधन की चुनौती भी बड़ी रही है।
मिथिलांचल
यहां की 10 लोकसभा सीटों सीतामढ़ी, उजियारपुर, शिवहर, मुजफ्फरपुर, वैशाली, मधुबनी, हाजीपुर, झंझारपुर, समस्तीपुर और दरभंगा में आरजेडी का एम-वाई फेक्टर काम करता है। यही कारण है कि लालू प्रसाद यादव के दोनो बेटे तेजस्वी यादव और तेज प्रताप यादव इसी इलाके से विधायक हैं।
बीजेपी के राज्य के अध्यक्ष नित्यानंद राय आरएलएसपी अध्यक्ष उपेंद्र कुशवाहा के खिलाफ उजैरपुर से चुनाव मैदान में हैं। एजेपी नेता रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान भी इसी इलाके की समस्तीपुर सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। दरभंगा, मधुबनी, उजैरपुर और मुजफ्फरपुर में अगर अति पिछडे़ वर्ग का समर्थन आरजेडी को मिला तो यहां आरजेडी के प्रदर्शन बेहतर हो सकता है।
दरभंगा
लोकसभा सीट पर 29 अप्रैल को वोटिंग हुई। इस बार यहां से 3 बार के सांसद रहे पूर्व क्रिकेटर कीर्ति आजाद मैदान में नहीं हैं। वो कांग्रेस के टिकट पर धनबाद से चुनाव लड़ रहे हैं। आपको बता दें कि कीर्ति आजाद ने दिल्ली डिस्ट्रिक्ट क्रिकेट बोर्ड में घोटाले के आरोप लगाते हुए बीजेपी के सीनियर नेता और केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था।
माना जा रहा है कि यहां मुकाबला राष्ट्रीय जनता दल के अब्दुल बारी सिद्दीकी और बीजेपी के गोपाल जी ठाकुर के बीच रहा है। दरभंगा यादव, मुसलमान और ब्राह्मणों का प्रभाव वाला क्षेत्र माना जाता है। इस सीट पर मुसलमान वोटरों की संख्या करीब 3 लाख 50 हजार है, जबकि यादव व ब्राह्मण वोटरों की संख्या 3-3 लाख के करीब है। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 3 सीटें आरजेडी के खाते में गईं, 2 जेडीयू और एक सीट बीजेपी ने जीती थी।
मधबुनी
यहां 6 मई को वोट डाले गए। मधुबनी लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के टिकट से अशोक कुमार यादव और महागठबंधन के उम्मीदवार विकासशील इंसान पार्टी के टिकट से बद्री कुमार पुर्बे के बीच मुख्य मुकाबला माना जा सकता है। लेकिन कांग्रेस नेता डॉ. शकील अहमद ने कांग्रेस प्रवक्ता पद से इस्तीफा दे मधुबनी से निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर लोकसभा चुनाव के लिए चुनाव लड़ा है।
उनका यह कदम बिहार में महागठबंधन की मुश्किलें बढ़ाने वाला रहा। इससे पहले साल 2014 में मधुबनी लोकसभा सीट से बीजेपी के हुकुमदेव नारायण यादव ने जीत हासिल की थी। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इनमें से तीन सीटें आरजेडी, एक सीट बीजेपी, एक सीट कांग्रेस और एक सीट आरएलएसपी ने जीती थी।
तिरहुत
प्रमंडल में पड़ने वाला सीतामढ़ी क्षेत्र नक्सल प्रभावित है और माओवादी रेड कॉरिडोर का हिस्सा होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से संवेदनशील माना जाता है। ये बिहार का बड़ा सियासी केंद्र भी है। सीतामढ़ी लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र से 2014 के चुनाव में एनडीए की जीत हुई और राष्ट्रीय लोक समता पार्टी, आरएलएसपी के राम कुमार शर्मा कुशवाहा सांसद बने थे।
2014 में उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी बीजेपी के साथ थी। 2019 में आरएलएसपी आरजेडी-कांग्रेस के साथ महागठबंधन में शामिल हो गई। 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से बीजेपी और आरजेडी को 2-2 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। जबकि 1-1 सीट जेडीयू और कांग्रेस के खाते में गई। इस बार लोकसभा चुनाव में मुकाबला जेडीयू के डॉ वरुण कुमार और आरजेडी के अर्जुन राय के बीच रहा।
शिवहर
यह लोकसभा सीट पर 2014 में बीजेपी की रमा देवी जीतकर सांसद बनीं। शिवहर क्षेत्र राजपूत बहुल सीट माना जाता है। यहां की सियासत पर राजपूत समाज का खासा प्रभाव है और चुनावी नतीजों में इसका साफ असर दिखता है। शिवहर क्षेत्र से बाहुबली आनंद मोहन सिंह का नाम उभरा और एक जमाने में आनंद मोहन को उत्तरी बिहार के कोसी क्षेत्र का बेताज बादशाह कहा जाता था।
आनंद मोहन ने 1996 के चुनाव में समता पार्टी के टिकट पर चुनाव जीता और फिर 1998 में ऑल इंडिया राष्ट्रीय जनता पार्टी के टिकट पर जीत की कहानी दोहराई।
आनंद मोहन की पत्नी लवली आनंद भी 1994 में वैशाली लोकसभा सीट के उपचुनाव में जीतकर सांसद बनीं। 2009 में बीजेपी ने इस सीट से रमा देवी को उतारा। रमा देवी ने 2009 और 2014 के चुनाव में शिवहर लोकसभा सीट से जीत हासिल कर संसद का प्रतिनिधित्व किया। 2015 के विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 2-2 सीटें बीजेपी और जेडीयू को मिली थीं। जबकि 1-1 सीट कांग्रेस और आरजेडी के हाथ आई थी। इसबार भी 12 मई को हुए मतदान में बीजेपी की उम्मीदवार रमा देवी का मुकाबला आरजेडी के सैयद अली फसल से हुआ है।
उजियारपुर
उजियारपुर सीट पर 29 अप्रैल को वोटिंग हुई यहां से सांसद और बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष चुनाव मैदान में हैं। इस बार टक्कर बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय और आरएलएसपी के उपेंद्र कुशवाहा के बीच है। राजनीति में सफलता के कई फैक्टर होते हैं। इन्हीं में से एक है जातीय समीकरण। उजियारपुर लोकसभा क्षेत्र में यादव और कुशवाहा जाति के 4.60 लाख वोटर हैं।
3 लाख से ज्यादा यादव जाति के वोटर हैं। कुशवाहा और यादव वोटर हार-जीत तय करते हैं. 2014 में नित्यानंद राय ने स्वजातीय यादव जाति के वोट को अपने पक्ष में मोड़ा और ब्राह्मणों के वोट को समेटकर जीत हासिल की। उजियारपुर में ब्राह्मण और मुस्लिम का वोट लगभग बराबर हैं। 2019 के लोकसभा चुनाव में उजियारपुर में एनडीए और महागठबंधन के बीच मुकाबले के आसार हैं।
मुजफ्फरपुर
इस सीट पर पिछले 20 सालों से एनडीए का दबदबा रहा है। इस क्षेत्र में समाजवादी और साम्यवादी विचारधारा भी बहती रही। देश की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभानेवाले कांग्रेस नेताओं के अलावा समाजवादी विचारधारा के कई नेता मुजफ्फरपुर संसदीय सीट से चुने जाते रहे। सीट पर 6 मई को पांचवें चरण में वोट डाले गए।
शाही लीची के लिए प्रसिद्ध बिहार के मुजफ्फरपुर लोकसभा सीट पर मुख्य मुकाबला बीजेपी के अजय निषाद और वीआईपी के राजभूषण चौधरी के बीच माना जा रहा है। इस सीट से मौजूदा सांसद जयनारायण निषाद के बेटे अजय निषाद भारतीय जनता पार्टी के टिकट से चुनाव मैदान में हैं।
2015 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 3 सीटों पर आरजेडी ने जीत हासिल की थी, जबकि दो सीट बीजेपी के खाते में गई थीं। इमरजेंसी से पहले मुजफ्फरपुर कांग्रेस के अभेद्य किले के रूप में जाना जाता था। 1952 से लेकर 1971 तक हुए 5 आम चुनावों में हर बार जीत कांग्रेस के हाथ लगी। आपातकाल के बाद 1977 में हुए पहले आम चुनाव में मजदूरों की लड़ाई लड़ने वाले नेता जॉर्ज फर्नाडिस ने कांग्रेस का किला भेद दूसरी बार संसद पहुंचे।
डाइनामाइट केस में जेल में बंद होने के कारण वे एक बार भी अपने निर्वाचन क्षेत्र नहीं गए। लेकिन, इसके बावजूद उन्होंने 3 लाख से ज्यादा वोटों से जीत दर्ज की। मुजफ्फरपुर सीट से सबसे ज्यादा जीत का रिकॉर्ड भी जॉर्ज फर्नाडिस के नाम है। वे यहां से 5 बार सांसद बने।
वैशाली लोकसभा सीट लंबे समय तक आरजेडी के वरिष्ठ नेता और पूर्व केंद्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह का सियासी गढ़ रहा है। लेकिन अभी यहां से वर्तमान सांसद हैं एलजेपी के रामा सिंह। डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह यहां से लगातार पांच बार सांसद रहे हैं।12 मई को बिहार की वैशाली लोकसभा सीट पर भी मतदान हुआ। यहां से आरजेडी ने एक बार फिर डॉ. रघुवंश सिंह को चुनावी मैदान में उतारा है। वहीं एलजेपी ने वर्तमान सांसद रामा किशोर सिंह की जगह पूर्व भाजपा विधायक वीणा देवी पर दांव खेला है।
माना जा रहा है कि इस बार वैशाली में कांटे की टक्कर देखने को मिलेगी। वैशाली संसदीय सीट पर 12 चुनावों में से दस बार राजपूत उम्मीदवार की जीत हुई है। दो बार भूमिहार उम्मीदवार जीते, जबकि छह बार दूसरे स्थान पर रहे। 2015 को विधानसभा चुनाव में वैशाली से जडीयू और पारू से बीजेपी को सफलता मिली थी। बरूराज, मीनापुर और साहेबगंज से आरजेडी और कांटी से निर्दलीय अशोक कुमार चौधरी जीते थे। इस सीट पर अगड़ी जातियों को शुरू से बोल-बाला रहा है। यहां राजपूत, यादव और भूमिहार जाति के वोटर ज्यादा हैं, लेकिन कई उपजातियों को मिलाने के बाद अतिपछड़ों और दलितों की आबादी की यहां निर्णायक है। खासकर कुर्मी, कुशवाहा और नोनिया जाति को वोटर चुनाव पर असर डालते हैं। एनडीए को केन्द्र और राज्य सरकार के काम पर भरोसा है। वहीं महागठबंधन को सांसद की विफलता और जातीय समीकरण पर।
हाजीपुर
लोकसभा सीट पर 6 मई को वोट डाले गए। यहां से इस बार लोक जनशक्ति पार्टी के नेता रामविलास पासवान के भाई पशुपति पारस किस्मत आजमा रहे हैं। उनका मुकाबला राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार शिवचंद्र राम से है। महागठबंधन के प्रत्याशी जहां लड़ाई को स्थानीय बनाम बाहरी की लड़ाई बनाने पर जोर देकर अपनी पकड़ मजबूत बनाने की जुगत में हैं। वहीं एनडीए की ओर से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के चेहरे को आगे रखकर विकास की तस्वीर प्रस्तुत की जा रही है। 2015 के विधानसभा चुनाव में 6 में से 3 सीटों पर आरजेडी और 1-1 सीट पर बीजेपी, जेडीयू और एलजेपी ने जीत हासिल की।
2014 के आम चुनाव में यहां से एलजेपी अध्यक्ष रामविलास पासवान ने जीत दर्ज की थी। राम विलास पासवान के लिए हाजीपुर लोकसभा सीट का नतीजा बेहद अहम होगा। यह उनकी परंपरागत सीट रही है। 1977 में उन्होंने इस सीट पर पहली बार जीत दर्ज की और उसके बाद 2014 तक वह आठ बार यहां से सांसद निर्वाचित हुए।
बिहार में आम धारणा है कि इस सीट से रामविलास पासवान की राजनीति की दिशा और दशा तय होनी है। रामविलास पासवान ने हाजीपुर को जीतने के लिए पूरी ताकत झोंक दी है। माना जा रहा है कि इस सीट से भले ही पासवान भले ही चुनाव नहीं लड़ रहे हों, लेकिन असली लड़ाई उनकी उनके धुर विरोधी लालू यादव से है।
झंझारपुर
लोकसभा सीट पर 2014 में मोदी लहर के दौरान यहां बीजेपी का खाता खुला। बीजेपी प्रत्याशी वीरेंद्र कुमार चौधरी राजद के मंगनी लाल मंडल को हराकर संसद पहुंचे। गठबंधन में यह सीट जेडीयू के खाते में आई है। उसने यहां से रामप्रीत मंडल को टिकट दिया। वहीं, महागठबंधन की तरफ से गुलाब यादव मैदान में हैं। इस सीट पर मुख्य मुकाबला एनडीए और महागठबंधन के बीच है। 23 अप्रैल को यहां मतदान हो चुका है। झंझारपुर सीट से सबसे ज्यादा जीत का रिकॉर्ड देवेंद्र प्रसाद यादव के नाम है। वे यहां से 5 बार चुने गए। 1989, 1991 और 1996 में वे जनता दल के टिकट पर लोकसभा पहुंचे। झंझारपुर संसदीय क्षेत्र यादव, ब्राह्मण और अतिपिछड़ा बहुल है। यादव लगभग 20 प्रतिशत, ब्राह्मण 19 से 20 प्रतिशत, अतिपिछड़ा 35 प्रतिशत, मुस्लिम 15 प्रतिशत और 10 प्रतिशत में अन्य भूमिहार, राजपूत, कायस्थ, वैश्य आते हैं।
बाढ़ व सुखा, जर्जर सड़कें, बंद पड़ी चीनी मील, गन्ना किसान व दशकों से लंबित जिले की मांग यहां के मुख्य मुद्दे हैं। रोजगार के लिए खेती के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं। हर साल यहां से सैकड़ों लोग रोजगार की तलाश में पलायन करते हैं। उच्च शिक्षा के लिए भी छात्रों को दूसरे शहर जाना पड़ता है। जितने सरकारी स्कूल और कॉलेज हैं, वहां शिक्षकों की भारी कमी है।
जननायक कर्पूरी ठाकुर की जन्मभूमि और कर्मभूमि समस्तीपुर लोकसभा क्षेत्र अपनी समृद्ध सियासी विरासत के लिए जाना जाता है। आजादी से अब तक कई बड़ी हस्तियों ने इस क्षेत्र का प्रतिनिधित्व किया। 1977 में कांग्रेस विरोधी लहर में लोकदल से कर्पूरी ठाकुर सांसद बने थे। सीट पर 29 अप्रैल को चौथे चरण में वोट डाले गए।
समस्तीपुर सीट पर एक बार फिर से कांग्रेस और एलजेपी के बीच सीधा मुकाबला है। यहां से एलजेपी प्रमुख रामविलास पासवान के भाई रामचंद्र पासवान चुनाव मैदान में हैं, जबकि कांग्रेस से डॉक्टर अशोक कुमार चुनावी रण में उतरे हैं। 2014 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. अशोक कुमार को पराजित कर पासवान सांसद बने थे। 2015 में 6 में 4 विधानसभा क्षेत्र में जेडीयू को जीत मिली थी। 1-1 सीट कांग्रेस-RJD के हिस्से गई थी. जातीय समिकरण के हिसाब से समस्तीपुर क्षेत्र में सबसे अधिक तीन लाख 90 हजार से अधिक कुशवाहा वोटर हैं।
दूसरे नंबर पर ढाई लाख से ज्यादा पासवान वोटर हैं, उसके बाद तीसरे नंबर यादव वोटर हैं। इनकी संख्या भी सवा दो लाख के आसपास है़। इसके अलावा सवर्ण, मुस्लिम और पचपनिया वोटर भी हैं। इस बार समस्तीपुर में मुख्य सियासी मुद्दा क्षेत्र में तकनीकी की स्थापना है। क्योंकि यहां पूसा स्थित राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय को छोड़ कोई तकनीकी कॉलेज नहीं है। बंद चीनी मिल और दूसरे उद्योग को खोलने की मांग जनता कर रही है।
कोसी
पांच लोकसभा सीटों वाले कोसी क्षेत्र में सोपौल, मधेपुरा, बेगुसराय, खगड़िया और भागलपुर सीटें शामिल हैं। यहां जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे शरद यादव आरजेडी की टिक्ट पर मधेपुरा में जन अधिकार पार्टी के नेता और सांसद पप्पु यादव के खिलाफ चुनाव लड रहें हैं। 1991 और 1996 के चुनाव में जनता दल के टिकट पर यहां से जीतकर शरद यादव लोकसभा पहुंचे थे। मधेपुरा लालू यादव का मजबूत गढ़ माना जाता है। आरजेडी चीफ लालू यादव दो बार मधेपुरा सीट से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं। मधेपुरा से 2014 में पप्पू यादव ने आरजेडी के टिकट पर चुनाव लड़ा था और जीते थे।
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन 6 सीटों में से 3 पर जेडीयू और 3 पर आरजेडी की जीत हुई थी। पप्पू यादव की पत्नी और कांगेस की टिकट पर सांसद रंजीत रंजन सुपौल से चुनाव लड रहीं हैं। 2014 में मोदी लहर के बावजूद रंजीत रंजन ने 60000 वोटों से जेडीयू के उम्मीदवार दिलेश्वर कमैत को हरा दिया और लोकसभा पहुंचीं। सुपौल उत्तर में नेपाल, दक्षिण में मधेपुरा, पश्चिम में मधुबनी और पूर्व में अररिया जिले से घिरा हुआ है. कोसी नदी के पानी से हर साल आने वाले बाढ़ से प्रभावित होता ये इलाका नेपाल से करीब होने के कारण सामरिक रूप से भी काफी महत्त्वपूर्ण है। इस इलाके में बाढ़ और रोजगार के लिए पलायन सबसे बड़ी समस्या है।
बेगूसराय सीट
कभी मिनी मास्को (वामपंथ) के रूप में जाना जाने वाला बेगूसराय सीट से जेएनयू छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार ने दावा ठोककर इसे फिर से हॉट केक बना दिया है। इस सीट पर बीजेपी के केंद्रीय मंत्री गिरीराज सिंह को कन्हैया कुमार ने चुनौती दी है। राजद ने यहां से तनवीर हसन को मैदान में उतारा है, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय रहा है। यह तय माना जा रहा है कि भूमिहार जाति का वोट गिरिराज सिंह के पक्ष में गया है, वहीं कन्हैया की जीत तभी संभव है जब गैर सवर्ण और मुस्लिम वोटरों ने उसे एकमुशत वोट किया हो। लेकिन कन्हैया की राह में सबसे बड़े बाधक हैं राजद के उम्मीदवार तनवीर हसन। पहले पिछली बार यानी वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव पर निगाह डालते हैं।
भाजपा ने भोला सिंह को अपना उम्मीदवार बनाया था जो कि भूमिहार जाति के हैं। वहीं सीपीआई की तरफ से भी भूमिहार उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह चुनाव लड़े थे। भोला सिंह को लगभग सभी सवर्णों का एकमुश्त वोट मिला। उन्हें 4 लाख 28 हजार 227 वोट से जीत हासिल हुई थी। वर्षों पूर्व यहां कई छोटे-बड़े उद्योग भी थे। जो धीरे-धीरे बंद हो गए जिससे रोज़गार और पलायन की समस्या बढ़ी है जो यहां चुनाव में मुख्य मुद्दा रहा।
खगडिया लोकसभा सीट पर इस बार महागठबंधन में शामिल विकासशील इंसान पार्टी के मुकेश साहनी और लोक जन शक्ति पार्टी के चौधरी महबूब अली कैसर के बीच कांटे का मुकाबला हुआ। मुकेश साहनी बॉलीवुड के फेमस सेट डिजाइनर हैं और निषादों की राजनीति में इनका बड़ा दखल है। जनता दल और जेडीयू की पकड़ इस सीट पर भले मजबूत रही हो लेकिन पिछले कुछ वर्षों में आरजेडी भी यहां तेजी से उभरी है। 2004 के चुनाव में आरजेडी ने यहां अच्छी जीत हासिल की और इस बार भी एलजेपी को टक्कर देती दिखी। 2014 के लोकसभा चुनाव में इस सीट से एलजेपी उम्मीदवार चौधरी महबूब अली कैसर ने जीत दर्ज की थी। 2009 के चुनाव में जदयू के दिनेश चंद्र यादव जीते थे।
भागलपुर
भागलपुर को बिहार की सिल्क सिटी के रूप में जाना जाता है। साल 2014 में मोदी लहर के बाद भी भागलपुर में कमल नहीं खिला था। इस सीट पर इस बार एनडीए और महागठबंधन के बीच मुकबला है। लोकसभा सीट पर जनता दल युनाइटेड ने अजय कुमार मंडल और राष्ट्रीय जनता दल ने शैलेश कुमार को चुनाव मैदान में उतारा है।
भागलपुर लोकसभा क्षेत्र में 18 अप्रैल को मतदान हो चुका है। साल 2014 के लोकसभा चुनाव में यहां भारतीय जनता पार्टी के शाहनवाज हुसैन और आरजेडी के प्रत्याशी शैलेष कुमार मंडल के बीच सीधी टक्कर देखने को मिली थी। इस चुनाव में शैलेष कुमार मंडल विजयी घोषित किए गए थे। इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ ही दिन पहले भागलपुर में एक चुनावी रैली की थी। सांप्रदायिक रूप से यह सीट संवेदनशील है। 1989 में हुए दंगे की ताप को लोग आज भी महसूस करते हैं।
इस सीट पर मुस्लिम और यादव वोटर का दबदबा है। ओबीसी, ईबीसी और सवर्ण वोटर का भी वर्चस्व है। सवर्ण भाजपा के परंपरागत वोटर रहे हैं। 2006 और 2010 में बीजेपी प्रत्याशी शाहनवाज हुसैन मुस्लिम वोटरों को अपनी तरफ खींचने में सफल रहे थे। भागलपुर के शहरी इलाकों को छोड़ दिया जाए तो सभी जगह बिजली, पानी और सड़क की समस्या है। देवघर में इंटरनेशनल एयरपोर्ट बनने के बाद भागलपुर एयर कनेक्टिविटी से जोड़ने का प्लान ठंडे बस्ते में है।
मोदी सरकार ने शिक्षा व्यवस्था दुरुस्त करने के लिए विक्रमशिला यूनिवर्सिटी बनाने का प्रपोजल दिया और इसके लिए 500 करोड़ रुपए का फंड जारी किया, लेकिन जमीन न मिलने की वजह से निर्माण शुरू नहीं हो सका। भागलपुर में जवाहर लाल नेहरु मेडिकल कॉलेज को छोड़ दूसरा कोई सरकारी अस्पताल नहीं है। लोगों को इलाज के लिए पटना या दूसरे शहर जाना पड़ता है। रोजगार की कमी के चलते हर साल यहां से सैकड़ों युवाओं को पलायन करना पड़ता है।
सीमांचल
सीमांचल की चार सीटों पर बीजेपी को दिक्कत पेश आ सकती है। अररिया, पुर्णिया, कटिहार और किशनगंज में मुस्लिम समाज काफी संख्या में है। पूर्णिया, कटिहार और किशनगंज में दूसरे चरण के तहत 18 अप्रैल को चुनाव हुआ। जबकि अररिया सीट पर तीसरे चरण में 23 अप्रैल को वोट डाले गए। सीमांचल में इस बार बीजेपी ने सिर्फ अररिया लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा है। पूर्णिया और कटिहार लोकसभा सीट से जेडीयू प्रत्याशी मैदान में थे। कटिहार में एनसीपी प्रत्याशी के मैदान में उतरने और किशनगंज में एमआईएम प्रत्याशी के चुनावी दंगल में होने से यहां मुकाबला रहा।
कटिहार लोकसभा सीट पर 18 अप्रैल को मतदान हो चुका है। यहां से पांच बार सांसद चुने गए कांग्रेस के तारिक अनवर का मुकाबला जेडीयू प्रत्याशी दुलाल चंद गोस्वामी से हुआ। वह पहली बार लोकसभा चुनाव लड़े। हालांकि, उनके पास विधायक का अनुभव है। इस सीट से एनसीपी प्रत्याशी मो शकूर ने लड़ाई को रोचक बना दिया। 2014 के लोकसभा चुनाव में कटिहार सीट से एनसीपी के टिकट पर तारिक अनवर ने जीत दर्ज की थी। हालांकि अब उन्होंने कांग्रेस ज्वॉइन कर ली है।
कटिहार
लोकसभा सीट को तारिक अनवर का गढ़ माना जाता है. यहां से वो 5 बार सांसद चुने जा चुके हैं। 2015 के विधानसभा चुनाव में 2 बीजेपी, 2 कांग्रेस, 1 आरजेडी और 1 सीट CPI(ML) (L) ने जीती थी। कटिहार पर मुस्लिमों के अलावा यादव और सवर्ण वोटरों का दबदबा है। इसके अलावा इस सीट पर आदिवासियों का वोट भी गेम चेंजर साबित हो सकता है। रोजगार और विकास यहां मुख्य मुद्दा है। कटिहार के लोगों के लिए खेती के अलावा रोजगार का कोई दूसरा साधन नहीं है। रोजगार नहीं मिलने से हर साल हजारों की संख्या में लोग यहां से पलायन करने को मजबूर हैं। विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर की कमी के चलते यहां से छात्र उच्च शिक्षा के लिए दूसरे राज्यों में जाने के लिए मजबूर हैं। कई प्रखंडों में लोग पानी, बिजली और सड़क जैसे मूलभूत सुविधाओं से महरूम हैं। सरकारी अस्पताल में सभी तरह के इलाज की व्यवस्था नहीं होने के चलते यहां के लोगों को भागलपुर और पटना जाना पड़ता है।
पूर्णिया
पूर्णिया लोकसभा सीट से जेडीयू प्रत्याशी संतोष कुशवाहा और कांग्रेस प्रत्याशी उदय सिंह उर्फ पप्पू सिंह के बीच आमने-सामने का मुकाबला रहा। पप्पू सिंह दो बार सांसद चुने जा चुके हैं, जबकि संतोष कुशवाहा दूसरी बार सांसद बनने के लिए चुनावी मैदान में जद्दोजहद करते दिखाई दिए। 2014 में पूर्णिया में मोदी लहर बेअसर साबित हुई थी। लोकसभा चुनाव में जेडीयू उम्मीदवार संतोष कुमार ने बीजेपी के उदय सिंह को पछाड़ कर अपनी पार्टी जेडीयू को पूर्णिया लोकसभा सीट पर कब्जा दिलाया था।
2015 के बिहार विधानसभा चुनाव में इन छह विधानसभा सीटों में से दो सीटें बीजेपी, दो सीटें जेडीयू और दो सीटें कांग्रेस के खाते में गई थीं। पूर्णिया की 60 प्रतिशत आबादी हिंदुओं की और 38 प्रतिशत मुस्लिमों की है, यहां यादव वोट भी बहुतायत में है,यादव और अल्पंख्यक मतों की गोलबंदी पर ही हार-जीत का फैसला निर्भर है, हालांकि, अतिपिछड़ी जातियां भी एक ताकत के तौर पर यहां स्थापित हैं जो किसी की भी पार्टी के गणित को फेल कर सकती है। विकास की कम रफतार यहां एक अहम चुनावी मुद्दा है।
अररिया
एनडीए के लिए एक बेहद मुश्किल सीटों में से एक है। लोकसभा सीट से बीजेपी प्रत्याशी प्रदीप कुमार सिंह और आरजेडी प्रत्याशी सरफराज आलम के बीच आमने-सामने की लड़ाई हुई। 2014 में हुए लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद इस सीट पर बीजेपी को हार का सामना करना पड़ा था। आरजेडी प्रत्याशी मोहम्मद तस्लीमुद्दीन ने बीजेपी के प्रदीप कुमार सिंह को हराया था। 2017 में तस्लीमुद्दीन का निधन हो गया। इसके बाद 2018 में हुए उपचुनाव में आरजेडी ने तस्लीमुद्दीन के बेटे सरफराज आलम को टिकट दिया।
सरफराज बीजेपी प्रत्याशी प्रदीप सिंह को हराकर पहली बार लोकसभा पहुंचे। 1967 से लेकर 2014 तक मुस्लिम बहुल अररिया लोकसभा सीट पर हुए 14 आम चुनावों में 4 बार कांग्रेस, 3-3 बार बीजेपी, जनता दल, आरजेडी और एक बार भारतीय लोक दल को जीत मिली है। अररिया सीट पर करीब 44 फीसदी मुस्लिम मतदाता हैं।
एमवाय समीकरण की वजह से यहां आरजेडी की स्थिति काफी मजबूत है। संसदीय क्षेत्र में 6 विधानसभा क्षेत्रों में 4 सीटों पर एनडीए, एक सीट राजद और एक पर कांग्रेस का कब्जा है। सिर्फ जातियों के मुद्दे पर प्रत्याशी चुनाव लड़ रहे हैं। बीजेपी एक तरफ राष्ट्रवाद का झंडा बुलंद किए है वहीं दूसरी तरफ महागठबंधन धर्मनिरपेक्षता को मुद्दा बनाई हुई है। जिले में न कोई इंजीनियरिंग कॉलेज है और न कोई मेडिकल कॉलेज। रेल के नाम पर जोगबनी से एक-दो ट्रेनें हैं। परमान नदी की वजह से हर साल आने वाले बाढ़ से जनजीवन करीब 3 से 4 महीने तक त्रस्त रहता है लेकिन इस चुनाव में ये मुद्दा कहीं नहीं है।
किशनगंज
लोकसभा सीट से कांग्रेस प्रत्याशी डॉ. जावेद और जेडीयू प्रत्याशी मो. असरफ के बीच मुकाबला है। 18 अप्रैल को यहां वोट डाले गए। डॉ. जावेद चार बार विधायक रह चुके हैं। पहली बार लोकसभा चुनाव में लड़े। यहां एमआईएम प्रत्याशी अख्तरूल इमान भी मैदान उतरे। उन्होने पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ा है। वह विधायक रह चुके हैं। इस सीट पर भी तिकोना मुकाबले रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में किशनगंज सीट से कांग्रेस उम्मीदवार असरार-उल-हक़ क़ासमी ने जीत दर्ज की थी। उन्होंने अपनी करीबी प्रतिद्वंदी बीजेपी के डॉ. दिलीप कुमार जायसवाल को शिकस्त दी थी।
दिसंबर 2018 में किशनगंज से सांसद मौलाना असरार-उल-हक़ क़ासमी का निधन हो गया था, जिसके बाद से इस सीट का राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल गया। विकास की रफतार और शिक्षा यहां चुनाव में अहम मुद्दा है। मुस्लिम समुदाय यहां किसी भी चुनाव में निर्णायक भूमिका में रहा है।
कुल मिलाकर बिहार के चुनावों में एनडीए बेहतर स्थिति में तो दिखाई देती है लेकिन राज्य मो विकास के मुद्दे और महागठबंधन का जातीय समिकरण एनडीए के राज्य में कई सीटों पर मुश्किल पैदा करता दिखाई देता है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।