गंभीर विषय: क्या समाज में बढ़ते यौन अपराधों के लिए ‘लिव इन रिलेशनशिप’ जिम्मेदार है?
भारतीय समाज में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कोई नई बात नहीं है। वैदिक काल में हमारे यहां मान्य आठ विवाह पद्धतियों में से एक ‘गंधर्व विवाह पद्धति’ भी प्रकारांतर से ‘लिव इन रिलेशनशिप’ ही थी।
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क्या समाज में बढ़ते अपराधों के लिए ‘लिव इन रिलेशनशिप’ जिम्मेदार है? अगर मप्र हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ की ताजा टिप्पणी पर गौर करें तो जवाब ‘हां’ में है। हालांकि भारत जैसे पारंपरिक देश में युवाओं के बीच ‘लिव इन रिलेशनशिप’ के बढ़ते चलन की वैधता को लेकर अदालतों की राय अलग-अलग है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसे अनैतिक तो माना है, लेकिन गैर कानूनी नहीं माना है। आम तौर पर इस संवेदनशील मामले में अदालतों का रूख यही है कि बालिग स्त्री-पुरूष अपनी मर्जी से सहजीवन में रह सकते हैं, फिर चाहे वो समाजमान्य विवाह पद्धति से भले न हो।
इंदौर हाई कोर्ट ने ये तल्ख टिप्पणियां एक ‘लिव इन’ में रह रही एक महिला से बार-बार बलात्कार, उसकी सहमति के बिना उसका जबरन गर्भपात कराने, आपराधिक धमकी देने और अन्य आरोपों का सामना कर रहे 25 वर्षीय व्यक्ति की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कीं। कोर्ट ने कहा कि ‘लिव इन रिलेशनशिप’ समाज के लिए अभिशाप है। इससे यौन अपराध बढ़ रहे हैं।
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कोर्ट ने कहा कि इस ‘आजादी’ का उपयोग करने वाले यह नहीं समझते कि ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में जोड़ीदारों का एक दूसरे पर कोई अधिकार नहीं होता।
कोर्ट ने बताया समाज के लिए नुकसानदायक
इंदौर हाईकोर्ट के जस्टिस सुबोध अभ्यंकर ने कहा कि ‘लिव-इन" संबंधों का यह अभिशाप नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का ‘‘बाय-प्रोडक्ट’’ (सह-उत्पाद) है। हाल के दिनों में लिव-इन संबंधों से पैदा हुए अपराधों की बाढ़ का संज्ञान लेते हुए अदालत यह टिप्पणी करने पर मजबूर है कि यह भारतीय समाज के लोकाचार को निगल रहा है। लिव इन सम्बन्ध तीव्र कामुक व्यवहार के साथ ही व्यभिचार को बढ़ावा दे रहा है, जिससे यौन अपराधों में लगातार इजाफा हो रहा है।’
यूं भारतीय समाज में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ कोई नई बात नहीं है। वैदिक काल में हमारे यहां मान्य आठ विवाह पद्धतियों में से एक ‘गंधर्व विवाह पद्धति’ भी प्रकारांतर से ‘लिव इन रिलेशनशिप’ ही थी। आधुनिक काल में इसे युवा स्त्री-पुरूषों का ‘बिन फेरे हम तेरे’ सहजीवन कहा जा सकता है, ऐसा रिश्ता जिसे लिव इन पार्टनर तो मानते हैं, लेकिन समाज उसे मन से स्वीकार नहीं करता। क्योंकि यह रिश्ता सामाजिक मर्यादाओं और दायित्वों को अमान्य करता है।
यहां सवाल यह है कि आज पहले की तुलना में ज्यादा युवा ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में क्यों रहना पसंद कर रहे हैं? ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब युवक-युवतियों ने अपने अभिभावकों से शादी के बजाए लिव इन में रहने की इजाजत मांगी। ‘विधिवत विवाह’ को अब वो एक ‘जंग लगी’ व्यवस्था मानते हैं। लेकिन हम देख रहे हैं कि ‘लिव इन’ के दुष्परिणाम सबसे ज्यादा लड़कियों को भोगने पड़ रहे हैं, फिर भी वो लिव इन में क्यों रहना चाह रही हैं ?
इस सवाल का जवाब यही हो सकता है कि आधुनिक युवतियों में ऐसा करने के पीछे हर तरह के सामाजिक बंधनों से मुक्ति और मनमर्जी से जीवन जीने की चाहत है। लिव इन के पैरोकार इस रिलेशनशिप को अक्सर ‘एक दूसरे को पूरी अंतरंगता से जानने की समयावधि’ भी करार देते हैं। हकीकत में यह एक दूसरे को ‘समझना’ कम, काम वासना पूर्ति का जरिया ज्यादा है। क्योंकि दोनों परस्पर सम्बन्धों के आगे कोई पारिवारिक जिम्मेदारी लेना नहीं चाहते, ऐसी जिम्मेदारी जो उन्हें समाज का हिस्सा बनाती है।
अनावश्यक जोखिम उठाने का खमियाजा ज्यादातर उन युवतियों को उठाना पड़ता है, जो अविवाहित माएं बन जाती हैं, अपने लिव इन पार्टनर से लगातार बलात्कार का शिकार होती हैं। ऐसी युवतियां अमूमन परिवार द्वारा ठुकरा दी जाती हैं। अविवाहित यौन सम्बन्धों से जन्मे बच्चों का भविष्य तो और अनिश्चित तथा कठिनाइयों से भरा होता है। उनकी सामाजिक वैधता पर भी प्रश्नचिन्ह होता है।
भारत में बढ़ता चलन
इन तमाम तथ्यों के बाद भी भारत में भी युवाओं में ‘लिव इन रिलेशनशिप’ की स्वीकार्यता बढ़ रही है। शायद इसलिए भी क्योंकि यह धर्म, जाति, वर्ग और नस्ल के परे जाकर सम्बन्धों को मान्य करता है। हालांकि अधिकांश मामलों में शुरू में परस्पर आकर्षण और आपसी सहमति से बनने वाले ये अंतरंग सम्बन्ध बाद में सतत झगड़े और यौन शोषण में तब्दील हो जाते हैं।
हाल में सामने आए पुलिस महिला सुरक्षा शाखा के एक अध्ययन में खुलासा हुआ कि मध्यप्रदेश में वर्ष 2019, 2020 व 2021 के दौरान ‘लिव इन’ में रहने वाली युवतियों ने सबसे ज्यादा रेप के मामले दर्ज कराएं हैं। इस अवधि में कुल 14 हजार 476 मामले बलात्कार के दर्ज हुए, इनमें से 85 फीसदी प्रकरण लिव इन रिलेशनशिप से जुड़े थे। इनमें सभी आरोपी लिव इन पार्टनर थे। केवल 2 फीसदी मामलों में आरोपी अजनबी थे।
ज्यादातर मामलों में यह देखने में आया है कि पुरुष, महिलाओं को कुछ समय बाद शादी करने का झांसा देकर ‘लिव इन रिलेशनशिप’ में रहने के तैयार कर लेते हैं। एक बार यह हो जाने पर शादी करने से पल्ला झाड़ लेते हैं। ऐसे में उनकी महिला लिव इन पार्टनर कहीं की नहीं रहती। बावजूद इसके लड़कियां लिव इन पार्टनर बनने इतनी आसानी से तैयार क्यों हो जाती हैं, इस सवाल का जवाब कठिन है।
इसका एक कारण शहरों में उन्मुक्त जीवन जीने की चाह, सही उम्र में विवाह न हो पाना, आर्थिक संकट, पसंदीदा वर न मिल पाना या परिवार से बगावत भी कारण हो सकता है। कई मामलों में तो यह भी देखने में आता है कि पुरुष पार्टनर पहले से शादीशुदा होता है और केवल यौनेच्छा पूर्ति के लिए किसी महिला को लिव इन पार्टनर बना लेता है।
अदालतों का क्या मानना है?
बावजूद इस हकीकत के देश की अदालतों का नजरिया लिव इन पार्टनरशिप मामले में अलग-अलग है और मुख्यत: व्यक्ति की स्वतंत्रता के आग्रह से प्रेरित है। इंदौर हाई कोर्ट के बरक्स पिछले साल राजस्थान हाई कोर्ट की जोधपुर खंडपीठ ने लिव इन रिलेशनशिप मामले में अपने एक फैसले में कहा कि पति व पत्नी के रहते हुए भी कोई व्यक्ति अपने किसी और साथी के साथ लिव इन रिलेशनशिप में बिना तलाक रह सकता है। कोर्ट ने कहा कि देश में अब भी ऐसे कई प्रदेश हैं, जहां पर रूढ़िवादी सोच वाले लोग इसको स्वीकार नहीं करते हैं।
इससे पहले पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप के पक्ष में फैसला दिया था। पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने कहा कि जो भी व्यक्ति लिव-इन रिलेशनशिप का रास्ता अपनाता है, उसे अन्य नागरिकों की तरह कानून का बराबर संरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
कोर्ट ने कहा कि समाज में लिव-इन रिलेशनशिप की स्वीकार्यता बढ़ रही है। ऐसा करना कोई अपराध नहीं है। ऐसा करने वाले जोड़े को कोर्ट संविधानिक सुरक्षा प्रदान करती है।
कोर्ट का नजरिया जो भी हो, समाज के अपने नियम अभी भी ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को मान्य करने के लिए तैयार नहीं हैं। इसका कारण केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता नहीं है, बल्कि उससे जुड़े सामाजिक दायित्व भी हैं।
जब तक ‘लिव इन रिलेशनशिप’ को मान्य करते हुए ऐसे रिश्तों को कानूनी संरक्षण नहीं मिलेगा, तब तक ‘लिव इन पार्टनर’ के साथ यौन अपराधों के मामले बढ़ते ही रहेंगे। लेकिन यहां बुनियादी सवाल यही है कि क्या हमारा मानस इसे पूरी तरह स्वीकार करने के लिए तैयार है?
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं।