महिला दिवस विशेष 2024: जंगल जीवन और अनुभव का संसार
जब मैं चौथी कक्षा में थी, तब हम मसूरी में रहते थे, लेकिन जल्द ही हम मुंबई में रहने लगे। मेरा मसूरी से मुम्बई का सफर मेरे लिए बहुत मुश्किल था। प्रकृति की मनोरम वादियो से परे कंकरीट के जंगलों मे मुझे मसूरी की बहुत याद आती थी।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
जब मैं चौथी कक्षा में थी, तब हम मसूरी में रहते थे, लेकिन जल्द ही हम मुंबई में रहने लगे। मेरा मसूरी से मुम्बई का सफर मेरे लिए बहुत मुश्किल था। प्रकृति की मनोरम वादियो से परे कंकरीट के जंगलों मे मुझे मसूरी की बहुत याद आती थी। यही वह समय था जब मैंने हरियाली और पक्षियों से भरे प्राकृतिक स्थानों की शांति और सुंदरता का विश्लेषण करना शुरू किया। प्रकृति के प्रति इस रुझान के बावजूद, मैंने स्कूल में, वास्तव में सीनियर स्कूल में, पर्यावरण से संबंधित किसी भी चीज़ पर ध्यान नहीं दिया और न ही मैंने जीवन विज्ञान या वन्यजीव संरक्षण पर ध्यान दिया।
2015 में, जब मैंने बायोलॉजिकल साइंसेज के छात्र के रूप में पिलानी में बिड़ला इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी और साइंस में दखिला लिया, तब मेरे प्राकृतिक प्रेम को, जो मेरे मन मे कही सुप्तावस्था मे था उसे सतही होने का अवसर प्राप्त हुआ। इसके साथ ही मेरे अपने कॉलेज का फोटोग्राफी क्लब को ज्वाइन करने के निर्णय ने मुझे स्वाभाविक रूप से पक्षी और प्रकृति फोटोग्राफी की ओर आकर्षित होने मे सहयोग प्रदान किया और मुझे पक्षीविज्ञान के क्षेत्र में शोध करने के लिये प्रेरित किया।
शुरुआत में मेरा शोध कार्य मेरे आसपास की पक्षियों और पौधों के रिकॉर्ड बनाने और कुछ बुनियादी व्यवहार संबंधी अवलोकन करने तक ही सीमित था। एक शोधकर्ता के रूप में मुझे मेरा पहला पूर्णकालिक अनुभव तब प्राप्त हुआ, जब मैने कोर्स की थीसिस के लिए 2018 में,देहरादून में वन अनुसंधान संस्थान (Forest Research Institute, FRI) ज्वाइन किया। यहां मेरे अनुसन्धान का विषय देहरादून के शहरी क्षेत्रों में पक्षियों की आबादी और विविधता को प्रभावित करने वाले कारक- जैसे वनस्पति, शहरी हरे स्थानों का आकार (urban green spaces)का अध्ययन था। मैंने इस प्रोजेक्ट पर 6 महीने तक काम किया।
2019 में, मैं हिमाचल प्रदेश वन विभाग में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में शामिल हो गई। जहां मैं चिहिर [Cheer Pheasant (Catreus wallichi)] नामक पक्षी के पुनरुत्पादन (reintroduction) प्रोजेक्ट मे कार्यरत थी। यह एक जमीन पर रहने वा्ला पक्षी है और केवल हिमालय के घास के मैदानों में पा्या जाता है। कु्छ अन्य कारणों के अलावा, निवास स्थान के नुकसान और खंडित शिकार के कारण इसकी संख्या में कमी आ रही है।
इस प्रोजेक्ट के लिए मैं सेरी नामक सुदूर गांव में रहती थी, जो शिमला से 40 किमी दूर है। मैं यहां दो साल तक रही और मैने रेडियो ट्रेसिंग और कैमरा ट्रैकिंग जैसी विभिन्न तकनीकें सीखी। मैंने स्थानीय समुदाय के साथ काम करना भी सीखा और जमीनी संरक्षण में मदद करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका को समझा।
इस प्रोजेक्ट के अंत तक, मैंने अपने दृष्टिकोण को व्यापक बनाते हुए केवल पक्षियों को देखने के बजाय पारिस्थितिकी तंत्र दृष्टिकोण से कंन्जरवेशन को समझने का सतत प्रयास किया। इसी क्रम को आगे बढ़ाते हुए मैं अपने वर्तमान प्रोजेक्ट ‘Mangrove Monitoring for Climate Change Mitigation in India’ (Centre for International Forestry Research &World Agroforestry (CIFOR-ICRAF)PUSA Campus, दिल्ली) में कार्यरत हूं।
इस परियोजना के एक अंश के रूप में हम जलवायु परिवर्तन के खिलाफ मैंग्रोव की लचीलाई (resilience) को समझने का प्रयास कर रहे हैं। इसे पता करने के लिए हम भारत में मैंग्रोव में दीर्घकालिक निगरानी क्षेत्र स्थापित कर रहे हैं। भारतीय तट के चुनिंदा मैंग्रोव क्षेत्रों में सतह की ऊंचाई में परिवर्तन को निर्धारित करने के लिए दीर्घकालिक निगरानी क्षेत्र स्थापित करके, यह कार्यक्रम प्रबंधन निर्णय लेने, पुनर्स्थापना की प्राथमिकताओं की पहचान करने, और मैंग्रोव संरक्षण के लिए हस्तक्षेप की योजना बनाने के लिए आवश्यक जानकारी प्रदान करता है।
इस परियोजना के अंतर्गत, मुझे आंध्र प्रदेश में कोरिंगा वन्यजीव अभयारण्य और पश्चिम बंगाल में सुंदरवन बायोस्फीयर रिजर्व में काम करने का अवसर मिला है। इस अध्ययनको आगेबढ़ाते हुये, मैं आने वाले दिनोमें जल्द ही अन्य मैंग्रोव क्षेत्रोंपर भी काम करूँगी।
मुझे अपना कार्यपसंद है, लेकिन मेरा मानना है कि इसमें कई चुनौतियाँ हैं। अनुसंधान में बहुत समय और समर्पण चाहिए और फील्ड काम भी थकान और जोखिम भरा होता हैं। महिला होने के कारण शारीरिक सुरक्षा के अलावा और भी अधिक चुनौतियाँ होती हैं, जैसे कि कुछ लोगों के विरोध और समर्थन की कमी।
मैं भाग्यशाली हूं कि मुझे अच्छे गुरु और सहकर्मी मिले हैं, और मेरे कुछ दोस्तों, वरिष्ठों, और परिवार ने मुझे समर्थन और मार्गदर्शन दिया है। चुनौतियों के बावजूद, मुझे अपने काम में आनंद आता है और मैं मैदान में काम करते समय खुश होती हूं। मैंने देश के कुछ सबसे खूबसूरत जगहों पर काम किया है, और मुझे आशा है कि मैं और भी कई क्षेत्रों में काम कर पाऊंगी। मैं आशा करती हूं कि मेरा काम पर्यावरणीय संरक्षण और रख-रखाव में योगदान करेगा।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।