भाजपा की वजह से मजबूत हुईं वामपंथी पार्टियां? जानिए चुनाव में कहां खड़े हैं वामदल?
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इस लोकसभा चुनाव में भाजपा, कांग्रेस, सपा-बसपा जैसी पार्टियों की तो चर्चा है, लेकिन जिस पर मीडिया की भी निगाहें कम हैं वह वामपंथ पार्टियां। जी हां, इस चुनाव में वामपंथी पार्टियों की क्या स्थिति है और उनकी चुनाव को लेकर कितनी तैयारी है और उनकी अहमियत क्या है, इस पर बेहद गंभीरता से पड़ताल की जरूरत है। जाहिर है असहमति की अलग जगह है, लेकिन बता दें कि आधुनिक दौर में भारत में जितने भी राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक एवं आर्थिक रिफॉर्म हुए हैं, उसमें कहीं न कहीं वामपंथी आन्दोलन की भूमिका रही है।
दरअसल, जिस दौर में देश है उस दौर में वामपंथी दम तोड़ रहे हैं, या फिर बुझी हुई चिन्गारी है, इसका पता लगाना बेहद जरूरी है। यह जानना तब और जरूरी हो जाता है जब बिहार की बेगूसराय की सीट के लिए संयुक्त साम्यवादी मोर्चा जद्दोजहद में है।
आखिर कहां खड़ा है वाम?
बहरहाल, कुछ विश्लेषक यह कहते हैं कि वामपंथ अपनी लीक से हट गया है। कुछ जानकारों का कहना है कि जिस मजबूती के साथ भारत में वामपंथी आन्दोलन की जमीन तैयार की गई थी उसपर उतनी अच्छी फसल नहीं लग पाई। दरअसल, वामपंथी आन्दोलन पर भटकाव और मौकापरस्ती के आरोप भी लगते रहे हैं। इन तमाम सवालों के बीच वामपंथी दल, आन्दोलन, सरकार में भागीदारी एवं सरकार की नीतियों में हस्तक्षेप की पड़ताल जरूरी है। यह विश्लेषण भी जरूरी है कि 2019 के चुनावी समर में वामपंथी पार्टियां कहां खड़ी हैं?
सच पूछिए तो वामपंथी आन्दोलन न तो कभी मौकापरस्त रहा और न ही कभी भटकाव का शिकार हुआ। गहराई से अध्ययन करने पर पता चलता है कि ऐसा कुछ भी नहीं है। मसलन इस आन्दोलन में कतिपय भटकाव जो सामने से दिख रहा है वह वामपंथियों की रणनीति का हिस्सा रहा है। यदि वे इस रणनीति पर नहीं चलते तो आज भारत की वामधारा का भी वही हश्र होता जो चीन, रूस, चेकोस्लोवाकिया, अफगानिस्तान, पाकिस्तान, वेनेजुएला आदि देशों के वामपंथियों का हुआ। मसलन दुनिया के किसी भी देश में वामपंथी शतक नहीं लगा पाए। जबकि भारत के वामपंथी बेहद चालाकी से सरकारी नीतियों में अपनी हनक कायम करने में सफल रहे हैं। चाहे वह शिक्षा हो या आर्थिक नीति, हर जगह वामधारा का हस्तक्षेप साफ दिखता है।
आपको बता दें कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने वामपंथी दबाव के कारण ही बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। यही नहीं भारत के संविधान की प्रस्तावना में भी संशोधन वाम दबाव का ही परिणाम है, इसलिए यह कहना कि भारत में वामपंथी आन्दोलन भटका या फिर असफल हो गया, यह अवधारणा सतही है और इसमें सहमति की गुंजाइश कम है।
दुनिया में कहां है वामपंथ?
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखें तो जिस प्रकार दुनिया के वामपंथी अपने लक्ष्य को प्राप्त करने में नाकाम रहे, वैसा भारत में नहीं हुआ। बगल के देश चीन में देख लें, वामपंथ के नाम पर किस प्रकार का नया पूंजीवादी साम्राज्य शी जिगपिंन ने खड़ा कर दिया है। रूस में तो साम्यवाद बुरी तरह हारा और अन्य देशों में भी वामपंथ की कोई अच्छी स्थिति नहीं रही, जबकि भारत में वामपंथी आन्दोलन कई मायनों सफल रहा है। वामपंथी केन्द्रीय सत्ता में कभी नहीं रहे, लेकिन मजदूर आन्दोलन में प्रभावी भूमिका के कारण भारत सरकार की कई नीतियां वामपंथी दबाव के कारण ही जनसरोकार से संबंधित रहीं, इसलिए जो लोग वामपंथी आन्दोलन के भटकाव या असफलता की बात करते हैं, वे सही नहीं हैं।
जहां तक संसदीय चुनाव में वामपंथी ताकत का सवाल है वहां वामपंथी ऊपर से कमजोर जरूर दिख रहे हैं, लेकिन सांगठनिक क्षमता एवं जनाधार में कोई कमी नहीं आई है। भारत में वामपंथ का कोई सीधा-सीधा इतिहास नहीं दिखता है, लेकिन रूसी साम्यवादी क्रांति के बाद भारत में साम्यवाद का संगठित चेहरा दिखने लगा।
क्या कहता है भारत में वामदलों का इतिहास?
सन् 1925 में लाला हरदयाल, एम. मोहम्मद बरकतउल्ला, राजा महेन्द्र प्रताप, मानवेन्द्र नाथ रॉय के कहने पर रूस गए थे। वहां अंतरराष्ट्रीय कम्युनिस्ट कांग्रेस लगी थी। तय यह हुआ था कि लेनिन से भारत की आजादी को लेकर समर्थन मांगा जाएगा, लेकिन लेनिन से जब मुलाकात हुई तो उन्होंने भारतीय क्रांतिकारियों को सहयोग करने से मना कर दिया। वह टीम जब लौट रही थी तो ताशकंद में न केवल स्वतंत्र भारत की सरकार का गठन हुआ, अपितु भारत की कम्युनिस्ट पार्टी का भी गठन किया गया। इसके बाद से भारत में साम्यवादी आन्दोलन संगठित होता चला गया। सन् 1962 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 10 प्रतिशत वोट मिले और वह 29 सीटें जीत गई थी।
इसके बाद पार्टी में विभाजन हो गया और भाकपा का प्रभाव घटने लगा, लेकिन मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का प्रभाव तेजी से बढ़ा। विभाजित वामपंथी दल पहली बार दो पार्टियों के रूप में 1967 में चुनाव लड़े। दोनों को अच्छी सफलता मिली। भाकपा का जहां सीट घटा वहां माकपा का सीट बड़ी तेजी से बढ़ा। 1967 के संसदीय चुनाव में भाकपा 23 सीटों पर जीती और माकपा को 19 सीटें मिली। इसके बाद बड़ी तेजी से माकपा का विस्तार होने लगा। 2004 आते-आते माकपा पूरे जोश में आ गई और संसदीय इतिहास में किसी वामपंथी दल को सबसे ज्यादा सीटें 43 माकपा के खाते में गई। हालांकि 2014 में माकपा का भी पराभव हुआ और पार्टी की सीटें बड़ी तेजी से कम हो गई।
तो क्या आज भी मजबूत हैं वामपंथी?
कुल मिलाकर देखें तो सन् 1925 से लेकर अब तक साम्यवादी अपनी उपस्थिति बड़ी मजबूती से बनाए हुए हैं। हालांकि उन्हें संघर्ष भी करना पड़ा है और कई प्रभावशाली नेता के असमय चले जाने से उन्हें घाटा भी हुआ। साथ ही पूंजीवादी प्रभाव के कारण आन्दोलन की धार भी कुंद हुई है, लेकिन वोट प्रतिशत की दृष्टि से जो 1962 में था वही प्रतिशत आज भी बरकरार है। अगर भूमिगत वामपंथियों को भी जोड़ दिया जाए तो साम्यवादियों की ताकत घटने की अपेक्षा बढ़ी है।
केरल में वाम गठबंधन आज भी सत्ता में हैं। 2004 के बाद 2009 और 2014 के आम चुनाव में संसदीय पृष्टभूमि पर वामपंथी कमजोर दिखे। फिलहाल वामपंथी की ताकत संसद में जिस अनुपात में कम हो रही है, उसी अनुपात में भूमिगत वामपंथियों की ताकत बढ़ रही है। इसके कई उदाहरण सामने आए हैं। जैसे-महाराष्ट्र का भीमा-कोरेगांव आन्दोलन, महाराष्ट्र का किसान आन्दोलन, मध्य प्रदेश का किसान आन्दोलन, अखिल भारतीय मजदूर संगठनों का भारत बंद, पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गन्ना किसानों का आन्दोलन, पंजाब का किसान आन्दोलन।
इन आन्दोलनों ने यह साबित कर दिया है कि वामपंथी संगठनों की ताकत बढ़ रही है। इसको लेकर कॉर्पोरेट घरानों में बढ़ रही बेचैनी इस बात के संकेत देती है कि वामपंथी संगठित हो रहे हैं और उनकी ताकत बढ़ रही है।
कितना है वोट प्रतिशत?
संयुक्त वामपंथ का जनाधार आज भी 15 प्रतिशत के बराबर है। सीपीआई के एक वरिष्ठ नेता बताते हैं कि- सीपीआई और सीपीएम का संयुक्त जनाधार लगभग 8 प्रतिशत के करीब है। इसके अलावा माले का जनाधार भी कमजोर नहीं है। माले नेता कमलजीत बताते हैं कि 2014 लोकसभा चुनाव में माले ने कुल 82 सीटों पर अपने उम्मीदवार खड़े किए थे और 10 लाख के करीब वोट उन्हें प्राप्त हुआ। जनाधार के मामले में विश्वविद्यालय जैसे स्थानों पर भी वामपंथी हावी हो रहे हैं। मसलन पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ जैसे शैक्षणिक संस्थान में चरम वामपंथी संगठन से जुड़ी छात्रा का अध्यक्ष पद पर जीतना इसका जीता-जागता उदाहरण है।
आपको बता दें कि जिस संगठन के माध्यम से उक्त छात्रा जीती उसने मात्र पांच साल पहले पंजाब विश्वविद्यालय में काम प्रारंभ किया। इससे साबित होता है कि वामपंथ का जनाधार मजबूत हो रहा है और पढ़े-लिखे तबकों में वामपंथी रुझान एक बार फिर से जोर मारने लगा है। उनके कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ रहा है और वे उत्तरोत्तर प्रभावशाली हो रहे हैं। यही नहीं कई जगह स्थानीय स्तर पर साम्यवादी जबरदस्त तरीके से सक्रिय हैं और उम्मीदवार भी खड़े करते हैं। जैसे पंजाब में पासला गुट, झारखंड में मार्क्सिस्ट कोआर्डिनेशन कमेटी, एसयूसीआई, अरएसपी, फॉरवाड ब्लाक आदि। इनके पास भी स्थानीय स्तर पर ठीक-ठाक जनाधार है और समय-समय पर वे अपना उम्मीदवार जिता भी लेते हैं। जाहिर है साम्यवादियों का जनाधार कमजोर हो गया है, उचित नहीं होगा, लेकिन आपसी अंतरविरोधों का साम्यवादी शिकार जरूर हुए हैं।
चुनाव के पहले फिर साथ आए वामदल?
दूसरी ओर भाजपा जैसी पार्टियों ने साम्यवादियों को एक होने पर मजबूर कर दिया है। यदि वे इकट्ठे नहीं हुए तो भाजपा जैसी कैडर वाली पार्टी उन्हें समाप्त कर देगी। इस बात का अंदाज वामपंथियों को हो गया है, इसलिए 2019 के चुनाव में वामपंथी अपने सारे अंतरविरोधों को भुलाकर एक मंच पर दिख रहे हैं। इस बार भूमिगत वामपंथी भी संसदीय धारा के वामपंथियों को सहयोग करते देखे जा रहे हैं। यह वामपंथी आन्दोलन के लिए शुभ संकेत हैं। अगर यह निरंतरता बनी रही तो वामपंथी मजबूत होंगे।
हालांकि 2019 के चुनाव में बिना किसी लाग-लपेट के वामपंथी खुद की ताकत पर मैदान में हैं। इस बार यह देखना दिलचस्प होगा कि वामपंथी दलों का कैसा प्रदर्शन होता है। वामपंथियों का दावा है कि इस चुनाव में उन्हें भाजपा के द्वारा अपनाए गए क्रूर पूंजीवाद का फायदा मिलेगा और इस बार कम से कम वे 50 संसदीय सीटों पर चुनाव जीतेंगे, लेकिन प्रेक्षकों का मानना है कि संयुक्त वामपंथ इस चुनाव में 30 के करीब सीटें जीत सकता है।
कुल मिलाकर वामपंथी अपनी योजना में सफल होते रहे हैं। चूकि इस बार सीधी लड़ाई भाजपा से हो रही है इसलिए लड़ाई थोड़ी कठिन जरूर दिख रही है, लेकिन वामपंथियों को इसका फायदा होने का अनुमान है। यदि फायदा मिलता है तो समझ लें कि भारत में वामपंथ की जड़ें बेहद गहरी हो चुकी हैं और फायदा नहीं मिलता है तो यह मान लेना चाहिए कि भारत में वामपंथी आन्दोलन का युग समाप्त हो गया है।
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