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लता मंगेशकर स्मृति शेष: वे अपने गीतों से अमर रहेंगी.!

Fri, 11 Feb 2022 12:26 PM IST
Shakeel Ahmad शकील अहमद
Updated Fri, 11 Feb 2022 12:26 PM IST
सार

लता मंगेशकर को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ से तो सन 2001 में नवाज़ा, लेकिन भारत की जनता के दिलों में वे एक ‘अनमोल रत्न’, एक ‘बेशक़ीमती रत्न’ के रूप में पिछले पचहत्तर बरसों से महफूज हैं।

भारत की जनता के साथ-साथ बेशुमार संगीत हस्तियों ने उनकी आवाज पर तारीफों के सुर बिखेरे, शायरों ने कसीदे पढ़े, लेखकों ने किताबों के अंबार लगा दिए, अखबारों को जब भी मौका मिला अपने पन्ने उनके सुरीले, मीठे और सदाबहार गीतों से संगीतमय बना दिए।  

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Lata Mangeshkar Death The Melodious Journey of Swar Kokila Lata Mangeshkar
वे दुनिया भर के लिए ‘स्वर साम्राज्ञी’ और ‘स्वर कोकिला’ कहलाईं। - फोटो : PTI

विस्तार

लता मंगेशकर को भारत सरकार ने ‘भारत रत्न’ से तो सन 2001 में नवाज़ा, लेकिन भारत की जनता के दिलों में वे एक ‘अनमोल रत्न’, एक ‘बेशक़ीमती रत्न’ के रूप में पिछले पचहत्तर बरसों से महफूज हैं। भारत की जनता के साथ-साथ बेशुमार संगीत हस्तियों ने उनकी आवाज पर तारीफों के सुर बिखेरे, शायरों ने कसीदे पढ़े, लेखकों ने किताबों के अंबार लगा दिए, अखबारों को जब भी मौका मिला अपने पन्ने उनके सुरीले, मीठे और सदाबहार गीतों से संगीतमय बना दिए।  

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जब लता के ही साथी और सुप्रसिद्ध संगीतकार नौशाद अली ने कहा- 

 

‘लता की आवाज में हिंदुस्तान का दिल धड़कता है’, तो भला उनके इस बयान को कौन झुठला सकता है।


सचमुच हजारों-हजार ऐसी मिसालें हैं, जो यह साबित करती हैं कि हां..लता की आवाज में हिंदुस्तान का दिल धड़कता है, हिंदुस्तान की हर मां, बहन, प्रेमिका, पत्नी, बेटी, बहू, सहेली, भाभी, साली, ननद के खयालों को लता की आवाज में आवाज मिलती है। लता की आवाज में उन्हें सुकून महसूस होता है, उनकी खुशी उमड़ पड़ती है, उनका दर्द छलक आता है, उनकी वेदना तड़प उठती है, उनकी दुहाई बिलख उठती है, उनकी पुकार सिहर उठती है!

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लता की आवाज में मिलन को बेचैन एक प्रेमिका की इल्तिजा को आवाज मिलती है, तो जुदाई में विरह-वेदना में तड़पती प्रेमिका की आह को स्वर मिलता है। उनकी आवाज में अठखेलियां हैं, शोखियां हैं, खुशी है, पीड़ा है और दर्द भी है, तो उनकी आवाज में समाज से जुड़ा सरोकार भी है, अभागन नारी की दुहाई है, तो पतिता की वेदना भी है, अत्याचार और ज़ुल्म के ख़िलाफ उठी हुंकार है, तो समाज को दिशा देती आशा की किरण भी है।

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हिंदुस्तान क्या, लता की आवाज में तो सारे उपमहाद्वीप का दिल धड़कता है, क्योंकि पाकिस्तान, बांग्लादेश, अफगानिस्तान, नेपाल, भूटान, श्रीलंका जैसे देशों में उनकी आवाज दिलो-जान से सुनी जाती है, सराही जाती है और दिल में बसाई जाती है। वे दुनिया भर के लिए ‘स्वर साम्राज्ञी’ और ‘स्वर कोकिला’ कहलाईं।


28 सितम्बर 1929 को इंदौर में पैदा हुईं लता का ताल्लुक यूं तो मप्र से है, लेकिन उनकी आवाज आगे चलकर पूरे देश की आवाज बन गई। लता जी ने अपने संगीत सफर की शुरुआत महज 13 साल की उम्र में 1942 में की थी और सफ़र तकरीबन सत्तर बरसों तक चलता रहा। इस दौरान उन्होंने कई भारतीय भाषाओं में 30 हजार से ज्यादा गानों को अपनी आवाज से सजाया।

Lata Mangeshkar Death The Melodious Journey of Swar Kokila Lata Mangeshkar
सन् 1948 में मास्टर विनायक की मौत के बाद संगीतकार गुलाम हैदर ने लता के गायन करियर को एक दिशा दी। - फोटो : फाइल

सुर और संगीत लता की रगों में दौड़ता है। उनके पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर मराठी संगीत नाट्य के लोकगायक और नाटककार थे। इसलिए घर का माहौल पूरी तरह संगीतमय था। वे संगीत की स्वरलहरियों के बीच ही पलने लगीं, इसलिए संगीत उनके साथ पाठशाला की कक्षाओं में भी चला आया। कक्षा में वे दूसरों बच्चों को गाना सिखाने लगीं। शिक्षक ने मना किया, तो उन्हें बड़ा नगवार गुजरा और दूसरे दिन से ही स्कूल से नाता तोड़ लिया और पूरी तरह संगीत से जोड़ लिया और फिर वे ताज़िंदगी संगीत की ही होकर रह गईं।

लता ने यूं तो पहली बार एक मराठी फिल्म में गाना गया और अभिनय भी किया। फिल्म का नाम था ‘पहिली मंगला गौर’ (1942)। मास्टर विनायक ने उन्हें यह अवसर दिया था, जो दीनानाथ मंगेशकर के मित्र थे। दीनानाथ इसी बरस चल बसे थे और उस समय लता थीं सिर्फ 13 बरस कीं। मास्टर विनायक ने ही सन 1945 में हिंदी फ़िल्म ‘बड़ी मां’ बनाई, तो उन्होंने उसमें लता और आशा को भूमिकाएं भी दीं और लता को एक भजन गाने का मौका भी दिया।

सन् 1948 में मास्टर विनायक की मौत के बाद संगीतकार गुलाम हैदर ने लता के गायन करियर को एक दिशा दी।
 

सन 1948 की बात है, एक दिन गुलाम हैदर लता को लेकर निर्माता शशधर मुखर्जी के पास गए। वे उन दिनों ‘शहीद’ फिल्म बना रहे थे। मुखर्जी ने लता की आवाज सुनी तो यह कहकर उसे खारिज कर दिया कि इस लड़की की आवाज तो बहुत ही पतली है। गुलाम हैदर आगबबूला हो उठे, कहा, आने वाले दिनों में निर्माता, निर्देशक लता के पैरों पर गिरेंगे और अपनी फिल्म में गाने के लिए गुजारिश करते फिरेंगे।


और हुआ भी वही, आगे चलकर लता की आवाज़ हर फिल्म का जरूरी हिस्सा हो गई, उनकी आवाज के बिना कोई भी संगीतकार महिला गीत की कल्पना भी नहीं कर सकता था। सबसे बढ़कर यह कि उनकी आवाज फिल्म की सफलता का एक पैमाना बन गई।

गुलाम हैदर शशधर मुखर्जी के वहां से चले तो आए, लेकिन फिर सन 1948 में ही अपनी फ़िल्म ‘मजबूर’ में लता से एक गाना गवाया और इस तरह फ़िल्म संगीत में लता का सफर धीमी गति से आगे बढ़ा।

शुरू में उनकी आवाज पर उस समय की मशहूर और दिग्गज गायिका नूरजहां की आवाज की छाप नजर आती थी, लेकिन बाद में उन्होंने अपनी खुद की शैली बना ली और फिर उनकी एक अलग पहचान भी बन गई। गायन का शास्त्रीय आधार तो उनके पास था ही, रियाज भी वे खूब करतीं। शायरी और गीतों पर अच्छी पकड़ के लिए दिल लगाकर उर्दू भी सीख ली।

यूं तो लता के पहले गुरु उनके पिता दीनानाथ ही थे, लेकिन उनके बाद उन्होंने उस्ताद अमान अली खां साहब भेंडीबाजार वाले से शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। लेकिन जब वे 1947 में पाकिस्तान चले गए, तो लता ने उस्ताद अमानत खां देवास वाले से बाकायदा गंडा बंधवाकर शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली। लता ने महान शास्त्रीय गायक उस्ताद बड़े ग़ुलाम अली खां साहब के शागिर्द पंडित तुलसीदास शर्मा से भी शास्त्रीय संगीत की शिक्षा ली और उनकी परम्परा को भी आगे बढ़ाया।


फिर शुरू हुआ लता का दौर यानी पचास का दशक, जिसमें उन्होंने फ़िल्म संगीत इतिहास के तमाम दिग्गज संगीतकारों के साथ गाया, अलग-अलग अंदाज में गाया और हर तरह की शैलियों, परिस्थितियों, जरूरतों और जज्बातों के लिए गाया। गीत, नज्म, कव्वाली, भजन, नात, गजल, कैबरे, मुजरा, लोरी, लोकगीत, नृत्यगीत, भक्तिगीत, देशभक्ति गीत, प्रार्थना आदि में अपने सुरों को घोला।
 
उन्होंने ग़ुलाम हैदर, अनिल विश्वास, शंकर-जयकिशन, नौशाद, एस. डी. बर्मन, सी. रामचंद्र, सलिल चौधरी, खेमचंद प्रकाश, हेमंत कुमार, सज्जाद हुसैन, रोशन, वसंत देसाई, मदन मोहन, लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल, जतिन-ललित, नदीम-श्रवण आदि संगीतकारों के साथ गाया और इतिहास रच दिया।

देश के महान शास्त्रीय गायक उस्ताद बड़े गुलाम अली खां से जुड़ा एक किस्सा बहुत मशहूर है-

महान शास्त्रीय गायक पंडित जसराज ने कहा था- वे एक बार बड़े गुलाम अली खां से मिलने अमृतसर गए, वे बातें ही कर रहे थे कि ट्राँजिस्टर पर लता का गाना 'ये जिंदगी उसी की है जो किसी का हो गया' सुनाई पड़ा। खां साहब बात करते-करते एकदम से चुप हो गए और जब गाना खत्म हुआ, तो बोले, “कमबख़्त कभी बेसुरी होती ही नहीं।“ इस टिप्पणी में पिता का प्यार भी था और एक कलाकार का रश्क भी।

Lata Mangeshkar Death The Melodious Journey of Swar Kokila Lata Mangeshkar
लता मंगेशकर के सुरों की सुरीली और अमर दास्तां... - फोटो : PTI

सन् 1958 में उन्हें फ़िल्म ‘मधुमति’ के गीत ‘आजा रे परदेसी’ के लिए पहली बार फिल्मफेयर का सर्वश्रेष्ठ पार्श्वगायिका का पुरस्कार मिला। इसका संगीत सलिल चौधरी ने तैयार किया था। उसके बाद उनकी आवाज में निखार आता चला गया और नए संगीतकारों के साथ उनकी आवाज को नए आयाम भी मिलने लगे।

साठ के दशक की शुरूआत में ही नौशाद की ऐतिहासिक फिल्म ‘मुगल-ए-आजम’ ने सफलता के नए रिकॉर्ड कायम कर दिए और संगीत के क्षेत्र में तो एक मिसाल ही बन गई। एक से बढ़कर एक तराशे हुए हीरों की तरह बेशकीमती और बेमिसाल गीतों ने सारे भारत को मदहोश बना दिया, जिसमें लता की आवाज का जादू लोगों के सिर चढ़कर बोला।

साठ के दशक में उन्हें दूसरा फिल्मफेयर पुरस्कार मिला फिल्म ‘बीस साल बाद’ के लिए, जिसका संगीत तैयार किया था गायक हेमंत कुमार ने और गीत था ‘कहीं दीप जले, कहीं दिल’। महान स्वतंत्रता सेनानी और देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के बारे में मशहूर था कि वे सार्वजनिक तौर पर कभी रोते नहीं थे और न ही दूसरों को रोता देखना पसंद करते थे।

लेकिन 27 जनवरी, 1963 को जब लता मंगेशकर ने कवि प्रदीप का लिखा गाना 'ऐ मेरे वतन के लोगों' गाया तो वे अपने आंसू नहीं रोक पाए। गाने के बाद लता स्टेज के पीछे कॉफ़ी पी रही थीं तभी निर्देशक महबूब खां ने लता से आकर कहा कि तुम्हें पंडितजी बुला रहे हैं। महबूब ने लता को नेहरू के सामने ले जा कर कहा, "ये रही हमारी लता। आपको कैसा लगा इसका गाना?"
 

नेहरूजी ने कहा, "बहुत अच्छा। इस लड़की ने मेरी आंखों में पानी ला दिया।" और उन्होंने लता को गले लगा लिया।


इस दौरान उन्होंने कई मराठी फिल्मों के लिए भी गाया और आनंदघन के नाम से संगीत भी दिया। उन्होंने चार मराठी फिल्मों को अपने संगीत-निर्देशन से सजाया। उन्होंने बांग्ला, तमिल और तेलुगू गीतों में भी अपनी आवाज के रंग भरे।

लता ने कुल चार बार फिल्मफेयर पुरस्कार जीता और फिर पुरस्कारों की होड़ से हट गईं, ताकि आनेवाली नई प्रतिभाओं को पुरस्कार पाने का मौका मिले और यह बात है सन 1969 की।

सत्तर के दशक में उन्होंने आर.डी. बर्मन, कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल जैसे नए संगीतकारों के साथ गाया और बहुत ही लोकप्रिय गीत दिए। सन 1972 में आर. डी. बर्मन की संगीतबद्ध फिल्म ‘परिचय’ के गीत ‘बीती ना बिताई रैना’ के लिए उन्हें राष्ट्रीय पुरस्कार से नवाजा गया। यह गीत गुलजार ने लिखा था।

लता ने बाद में गुलजार की लिखी और निर्देशित फिल्म ‘लेकिन’ के गीत ‘यारा सिली सिली बिरहा की रात का जलना’ के लिए एक बार फिर राष्ट्रीय पुरस्कार जीता था। ख़ास बात यह थी कि इस फिल्म का निर्माण उन्होंने ख़ुद किया था और उसका संगीत उनके भाई हृदयनाथ मंगेशकर ने दिया था।

इससे पहले सन 1975 में भी उन्हें फ़िल्म ‘कोरा कागज़’ के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुका था।

अस्सी के दशक में लता ने नए जमाने के साथ नए संगीतकारों की संगत की और देश को एक से बढ़कर एक अनमोल गीत दिए। शिवहरि, राम-लक्ष्मण, हृदयनाथ मंगेशकर जैसे संगीतकारों के लिए गाया। नब्बे के दशक में उन्होंने जतिन-ललित, नदीम-श्रवण और ए. आर. रहमान के सुरों को अपने स्वर दिए और नई पीढ़ी के साथ कदम से कदम मिलाकर चलती रहीं।

मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र सरकार उनके नाम पर उभरती हुई संगीत प्रतिभाओं को ‘लता मंगेशकर’ पुरस्कार प्रदान करती हैं, जो लता के लिए एक बड़ी उपलब्धि है कि उनके जीते-जी उनके नाम पर पुरस्कार दिए जाते हैं।

यूं तो स्वर साम्राज्ञी लता मंगेशकर को देश और दुनिया भर के कई पुरस्कार मिले हैं, लेकिन भारत सरकार ने उन्हें 1969 में पद्मभूषण, 1989 में दादा साहेब फाल्के, 1999 में पद्मविभूषण और फिर 2001 में देश का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारत रत्न’ देकर सम्मानित किया।
 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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