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मूल निवास के आधार पर आरक्षण संविधान की कसौटी पर

Mon, 25 Dec 2023 03:08 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 25 Dec 2023 03:08 PM IST
सार

सवाल केवल उत्तराखण्ड के मूल निवास आन्दोलन तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश की पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा जन्म के आधार पर राज्यवासियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की घोषणा की जा चुकी थी। मूल निवास के आधार पर विरोध और समर्थन की बहसों के बावजूद कुछ राज्यों में जन्म के आधार पर और कुछ में भाषा के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था लागू हो चुकी है।

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Land law in Uttarakhand: Reservation on the basis of domicile
सवाल केवल उत्तराखण्ड के मूल निवास आन्दोलन तक सीमित नहीं है। - फोटो : istock

विस्तार

इस वर्षान्त में मुट्ठीभर युवाओं द्वारा मूल निवास और मजबूत भूमि कानून की मांग को लेकर देहरादून में आहूत महारैली में जिस तरह जनसैलाब उमड़ पड़ा उसे उत्तराखण्ड की जनता की भावनाओं का उद्वेग ही कहा जा सकता है। चूंकि उत्तराखण्ड में अभी तक मूल निवास के आधार पर सरकारी नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। इसलिए जनभावनाओं का यह विस्फोट फिलहाल लोगों की संस्कृतिक पहचान के लिए ज्यादा लगता है।

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बाहरी लोगों द्वारा की जा रही जमीनों की खरीद फरोख्त पर मजबूत भू-कानून के जरिए रोक लगाने की मांग भी कमोवेश जनसांख्यिकी के असन्तुलन को रोक कर पहाड़ी लोगों की सांस्कृतिक पहचान अक्षुण रखने के लिए ही है। लेकिन मूल निवास का मुद्दा अन्ततः नौकरियों और अन्य सरकारी सुविधाओं तक ही पहुंचेगा जिसे संवैधानिक रुकावटों से गुजरना होगा, क्योंकि भारत का संविधान अपने नागरिकों को समानता के मौलिक अधिकार के साथ राज्य के अधीन किसी भी पद के संबंध में धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, उद्भव, जन्मस्थान, निवास या इसमें से किसी के आधार पर भेदभाव की स्पष्ट मनाही करता है।
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सवाल केवल उत्तराखण्ड के मूल निवास आन्दोलन तक सीमित नहीं है। मध्य प्रदेश की पूर्ववर्ती शिवराज सिंह चौहान सरकार द्वारा जन्म के आधार पर राज्यवासियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण की घोषणा की जा चुकी थी। मूल निवास के आधार पर विरोध और समर्थन की बहसों के बावजूद कुछ राज्यों में जन्म के आधार पर और कुछ में भाषा के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था लागू हो चुकी है। इसलिए आज मांग उत्तराखण्ड से उठ रही है तो कल देश के अन्य राज्यों में भी यह मांग उठेगी। आरक्षण का मुद्दा एक संवैधानिक विषय होने के कारण विभेद विहीन समान अवसरों की गांरटी देने वाले अनुच्छेद 16 के उपखण्डों में संशोधन भी संसद ही कर सकती है। इसलिए समय आ गया है कि केन्द्र सरकार इस संबंध में स्पष्ट नीति बना कर एक ही बार में संविधान में आवश्यक संशोधन करें।
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मूल निवास या जन्म के आधार पर आरक्षण की बात उठती है तो संविधान के अनुच्छेद 16के उपखण्डों का जिक्र आवश्यक हो जाता है। भारत के संविधान में अनुच्छेद-16 सरकारी नौकरियों में अवसर की समानता को संदर्भित करता है जबकि अनुच्छेद 16(1) राज्य के अधीन किसी भी पद पर रोजगार या नियुक्ति से संबंधित मामलों में सभी नागरिकों के लिए अवसरों की समानता की गारंटी देता है। अनुच्छेद 16(2) यह भी स्पष्ट करता है कि कोई भी नागरिक केवल धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग, वंश, जन्म स्थान, निवास के आधार पर राज्य के तहत किसी भी रोजगार या कार्यालय के लिए अयोग्य नहीं होगा या उसके साथ भेदभाव नहीं किया जाएगा। लेकिन अनुच्छेद 16(3) इन कानूनों को अपवाद प्रदान करता है।

इसमें कहा गया है कि संसद उस राज्य या केंद्र शासित प्रदेश के भीतर निवास के किसी विशेष स्थान की आवश्यकता निर्धारित करने वाला कोई भी कानून बना सकती है जिसमें सार्वजनिक पद या रोजगार हो। छूट देने की यह एक ऐसी शक्ति केवल स्पष्ट रूप से संसद में निहित है, न कि किसी राज्य विधानमंडल में। इसका मतलब यह है कि जन्म स्थान के आधार पर सार्वजनिक रोजगार में आरक्षण के बारे में निर्णय केवल भारत की संसद ही ले सकती है, किसी राज्य की कोई विधायिका नहीं। संसद अब तक इस प्रावधान का लाभ आघ्र प्रदेश, मणिपुर, त्रिपुरा और हिमाचल प्रदेश को दे चुकी है। कुछ राज्यों को छूट देना और कुछ को छूट से वंचित रखना भी राज्यों के समानता के अधिकार का हनन है।

महाराष्ट्र में, जो कोई भी 15 साल या उससे अधिक समय से राज्य में रह रहा है, वह सरकारी नौकरियों के लिए तभी पात्र है, जब वह मराठी में पारंगत हो। तमिलनाडु भी ऐसी परीक्षा आयोजित करता है। पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों ने मूल निवास के बजाय भाषा को राज्य की सेवाओं में नियुक्ति का आधार बनाया है। इन राज्यों की सेवाओं की चयन प्रकृया में शामिल परीक्षाओं में राज्य की भाषा का ज्ञान आवश्यक विषय रखा गया है। इसके अतिरिक्त, संविधान के अनुच्छेद 371 में कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधान भी हैं। संविधान के अनुच्छेद 371डी के तहत, आंध्र प्रदेश को निर्दिष्ट क्षेत्रों में स्थानीय कैडरों की सीधे भर्ती करने की अनुमति है।

Land law in Uttarakhand: Reservation on the basis of domicile
जन्म के आधार आरक्षण विवादित होने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट भी इसके पक्ष में नहीं है। - फोटो : istock

संविधान निवास के आधार पर भेदभाव की अनुमति नहीं देता है। संविधान के अनुच्छेद 19 (ई) के तहत, भारत के प्रत्येक नागरिक को भारत के किसी भी हिस्से में निवास करने और बसने का अधिकार है। इसके अलावा, भारत संघ के नागरिक के रूप में, किसी भी राज्य में किसी भी सार्वजनिक पद पर भर्ती होने पर भारतीयों के साथ उनके जन्म स्थान के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता है। संविधान कुछ प्रतिबंधों के बावजूद शैक्षिक आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े असमान लोगों को समानता के स्तर तक लाने के लिए अनुच्छेद 15 (4) और 16(4) के जैसे सकारात्मक प्रावधान भी करता है। ये प्रावधान राज्य को उन समुदायों के लिए उच्च शैक्षणिक स्थानों और नियुक्तियों में प्रवेश के आरक्षण के लिए विशेष प्रावधान करने की अनुमति देते हैं।

जन्म के आधार आरक्षण विवादित होने के साथ ही सुप्रीम कोर्ट भी इसके पक्ष में नहीं है। प्रदीप जैन बनाम भारत संघ के मामले में न्यायालय ने भूमिपुत्रों के लिए नौकरियाँ आरक्षित करने की नीतियों को संविधान का उल्लंघन माना था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि प्रथम दृष्टया यह संवैधानिक रूप से अस्वीकार्य प्रतीत होगा, हालांकि कोर्ट ने इस पर कोई निश्चित राय व्यक्त नहीं करने का फैसला किया। सन् 1995 में भी सुप्रीम कोर्ट ने सुनंदा रेड्डी बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के मामले में, प्रदीप जैन वाले मामले के फैसले को बरकरार रखा और उस नीति को रद्द कर दिया, जिसमें शिक्षा के माध्यम के रूप में तेलुगु वाले उम्मीदवारों के लिए अंकों में 5 प्रतिशत अतिरिक्त वेटेज की अनुमति दी गई थी। इस फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने प्रदीप जैन जजमेंट का हवाला देते हुए कहा था कि:

"अब यदि भारत एक राष्ट्र है और केवल एक ही नागरिकता है, अर्थात भारत की नागरिकता, और प्रत्येक नागरिक को भारत के पूरे क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने और भारत के किसी भी हिस्से में रहने और बसने का अधिकार है......। यह समझना मुश्किल है कि तमिलनाडु में अपना स्थाई घर रखने वाले या तमिल भाषा बोलने वाले नागरिक को उत्तर प्रदेश में बाहरी व्यक्ति कैसे माना जा सकता है... उसे बाहरी व्यक्ति मानना उसे उसके संवैधानिक अधिकारों से वंचित करना और आवश्यक एकता को अस्वीकार करना होगा और देश के साथ ऐसा व्यवहार करके उसकी अखंडता को बनाए रखना जैसे कि वह स्वतंत्र राज्यों का एक समूह मात्र हो।" लेकिन जब संसद कुछ राज्यों को जन्म या निवास के आधार पर आरक्षण देने की छूट दे चुकी है तो उसे अब समानता के अधिकार को समान बनाने की पहल भी करनी चाहिए।

वर्ष 2020 में हरियाणा कैबिनेट ने एक अध्यादेश पारित किया जिसमें स्थानीय लोगों के लिए निजी नौकरियों में 75 प्रतिशत आरक्षण का प्रवधान था। सन् 2008 में, महाराष्ट्र ने राज्य प्रोत्साहन चाहने वाले उद्योगों में स्थानीय लोगों के लिए 80 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की थी, हालांकि इसे लागू नहीं किया गया था।

इसी तरह गुजरात ने भी 1995 में स्थानीय लोगों के लिए 85 प्रतिशत आरक्षण की शुरुआत की और फिर भी यह नीति न तो निजी या सार्वजनिक क्षेत्र में लागू की गई। जम्मू और कश्मीर में, सभी सरकारी नौकरियाँ अधिवासियों के लिए आरक्षित हैं। हालांकि, इस आरक्षण को जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई है और उस पर निर्णय लंबित है। असम में असम समझौते की सिफारिशों को लागू करने के लिए सिफारिशें की गई हैं जो केवल उन लोगों के लिए सरकारी नौकरियों में आरक्षण प्रदान करती हैं जो 1951 तक अपने वंश का पता लगा सकते हैं।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकताु, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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