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दूसरा पहलू - अंग्रेजों के काले इतिहास की गवाह लाल सड़क
Mon, 05 Jan 2026 08:14 AM IST
पवन पांडेय
गुरदीप सिंह
गुरदीप सिंह
Published by: पवन पांडेय
Updated Mon, 05 Jan 2026 08:14 AM IST
सार
यह सड़क अंग्रेजों की दमनकारी नीति के साथ-साथ ब्रितानियों से टक्कर लेने वाले शूरमाओं की अमिट गाथा की दास्तां का प्रतीक है। हजारों क्रांतिकारियों को इस सड़क पर लिटाकर कुचल दिया गया, जिससे यह खून से सनकर लाल हो गई और नाम पड़ा ‘लाल सड़क’। हरियाणा के हांसी के ऐतिहासिक किले के बिल्कुल पास स्थित यह सड़क वर्तमान में सीमेंट की बनी है, पर इसे लाल रंग से रंगा गया है, ताकि अमर क्रांतिकारियों की गाथा भूल न जाएं।
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अंग्रेजों के काले इतिहास की गवाह लाल सड़क
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
13 अप्रैल, 1919 को जलियांवाला बाग में हुआ नरसंहार आज भी चीख-चीख कर अंग्रेजी हुकूमत के जुल्म की गवाही देता है। ऐसी ही एक दास्तां हरियाणा में 23वां जिला बनाए गए हांसी के इतिहास के काले पन्नों में दर्ज है।
बात 1857 की है। जब आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम की दहकती आग में हांसी के क्रांतिकारियों ने भी आहुति दी थी। दिन-दहाड़े क्रांतिकारियों ने हिसार में डिप्टी कलेक्टर बेडर्नबर्न की कोर्ट रूम में गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना से अंग्रेजी हुकूमत बौखला गई और लोगों पर कहर बरपा दिया। आसपास के गांवों के हजारों क्रांतिकारियों को हांसी लाकर एक सड़क पर लिटाकर गिरड़ी (पत्थर से बना एक भारी औजार, जिसका प्रयोग अनाज निकालने के लिए किया जाता है) से कुचल दिया गया। सड़क क्रांतिकारियों के खून से सनकर लाल हो गई, तो उसका नाम पड़ा ‘लाल सड़क’।
यह सड़क अंग्रेजों की दमनकारी नीति के साथ-साथ उन शूरमाओं की अमिट गाथा की दास्तां का प्रतीक बन चुकी है, जिन्होंने घुटने टेकने की बजाय स्वाभिमान को चुना। न जाने कितने ही वीर बांकुरों ने आजादी के लिए अपने प्राणों को बलिदान कर दिया। अंग्रेजों ने हांसी में आकर सैनिक छावनी और स्कीनर हॉर्स रेजिमेंट भी बनाई थी। 1832 में हिसार को जिला बनाकर हांसी को उपमंडल भी बनाया, यह सोचकर कि यहां से लंबे अर्से तक ब्रिटिश शासन की जड़ों को फैलाते रहेंगे, लेकिन वे यह भूल बैठे थे कि हांसी के लोगों की रगों में खून के साथ विद्रोह की आग भी दौड़ रही थी। जिन जड़ों को अंग्रेज मजबूत करना चाहते थे, उन्हें यहां के शूरवीरों ने उखाड़ फेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
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इतिहासकार जगदीश सैनी बताते हैं कि सैनिक विद्रोह में हुकमचंद जैन, फकीर चंद, मिर्जा मुनीर बेग और मुर्तजा बेग ने तन-मन-धन से क्रांतिकारियों का सहयोग किया था। इस आरोप में अंग्रेजों ने राजद्रोह के तहत उन्हें घर के सामने फांसी पर लटका दिया। परंपरा के उलट हुकमचंद जैन को अंग्रेजों ने दफनाया, जबकि मुनीर बेग को फांसी के बाद जला दिया गया था। उस समय घटे इन वाकयों की जानकारी तो भले ही किताबों में दर्ज है, लेकिन ब्रिटिश काल के अत्याचार से जुड़ी दास्तां लाल सड़क पर रखे हर कदम के साथ सदा के लिए जेहन में कौंधती रहेगी।
हांसी के ऐतिहासिक किले के बिल्कुल पास बनी इस लाल सड़क को देखने आज भी लोग पहुंचते हैं। 1992 में इन क्रांतिकारियों की याद में बनाया गया शहीद स्मारक भी यहां विद्यमान है। हालांकि, वर्तमान में यह सड़क सीमेंट की बनी है, लेकिन इसे लाल रंग से रंगा गया है, ताकि अमर क्रांतिकारियों की गाथा लोग भूल न जाएं।
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बात 1857 की है। जब आजादी के पहले स्वतंत्रता संग्राम की दहकती आग में हांसी के क्रांतिकारियों ने भी आहुति दी थी। दिन-दहाड़े क्रांतिकारियों ने हिसार में डिप्टी कलेक्टर बेडर्नबर्न की कोर्ट रूम में गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना से अंग्रेजी हुकूमत बौखला गई और लोगों पर कहर बरपा दिया। आसपास के गांवों के हजारों क्रांतिकारियों को हांसी लाकर एक सड़क पर लिटाकर गिरड़ी (पत्थर से बना एक भारी औजार, जिसका प्रयोग अनाज निकालने के लिए किया जाता है) से कुचल दिया गया। सड़क क्रांतिकारियों के खून से सनकर लाल हो गई, तो उसका नाम पड़ा ‘लाल सड़क’।
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यह सड़क अंग्रेजों की दमनकारी नीति के साथ-साथ उन शूरमाओं की अमिट गाथा की दास्तां का प्रतीक बन चुकी है, जिन्होंने घुटने टेकने की बजाय स्वाभिमान को चुना। न जाने कितने ही वीर बांकुरों ने आजादी के लिए अपने प्राणों को बलिदान कर दिया। अंग्रेजों ने हांसी में आकर सैनिक छावनी और स्कीनर हॉर्स रेजिमेंट भी बनाई थी। 1832 में हिसार को जिला बनाकर हांसी को उपमंडल भी बनाया, यह सोचकर कि यहां से लंबे अर्से तक ब्रिटिश शासन की जड़ों को फैलाते रहेंगे, लेकिन वे यह भूल बैठे थे कि हांसी के लोगों की रगों में खून के साथ विद्रोह की आग भी दौड़ रही थी। जिन जड़ों को अंग्रेज मजबूत करना चाहते थे, उन्हें यहां के शूरवीरों ने उखाड़ फेंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
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इतिहासकार जगदीश सैनी बताते हैं कि सैनिक विद्रोह में हुकमचंद जैन, फकीर चंद, मिर्जा मुनीर बेग और मुर्तजा बेग ने तन-मन-धन से क्रांतिकारियों का सहयोग किया था। इस आरोप में अंग्रेजों ने राजद्रोह के तहत उन्हें घर के सामने फांसी पर लटका दिया। परंपरा के उलट हुकमचंद जैन को अंग्रेजों ने दफनाया, जबकि मुनीर बेग को फांसी के बाद जला दिया गया था। उस समय घटे इन वाकयों की जानकारी तो भले ही किताबों में दर्ज है, लेकिन ब्रिटिश काल के अत्याचार से जुड़ी दास्तां लाल सड़क पर रखे हर कदम के साथ सदा के लिए जेहन में कौंधती रहेगी।
हांसी के ऐतिहासिक किले के बिल्कुल पास बनी इस लाल सड़क को देखने आज भी लोग पहुंचते हैं। 1992 में इन क्रांतिकारियों की याद में बनाया गया शहीद स्मारक भी यहां विद्यमान है। हालांकि, वर्तमान में यह सड़क सीमेंट की बनी है, लेकिन इसे लाल रंग से रंगा गया है, ताकि अमर क्रांतिकारियों की गाथा लोग भूल न जाएं।