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Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Kurukshetra: From Nirbhaya gangrape case to Hathras incident, what the governments has taken the actions after the incident

कुरुक्षेत्र: निर्भया से हाथरस कांड तक, सरकारों को वारदात के बाद उनकी कार्रवाई से तोलें

Vinod Agnihotri विनोद अग्निहोत्री
Updated Thu, 08 Oct 2020 02:55 PM IST
सार

जहां निर्भया कांड के बाद सत्ताधारी कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने और कानून बनाने के हक में खड़े हो गए थे, वहीं हाथरस कांड पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं के बयान न सिर्फ अपनी प्रदेश सरकार के बचाव में आ रहे हैं

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Kurukshetra: From Nirbhaya gangrape case to Hathras incident, what the governments has taken the actions after the incident
Hathras Rape Protest - फोटो : PTI

विस्तार

हाथरस कांड उसी तरह इन दिनों गर्म है जैसे कभी दिल्ली के निर्भया बलात्कार कांड ने पूरे देश को हिला दिया था। तब आम लोग सड़कों पर थे और दिल्ली की कांग्रेस और केंद्र की यूपीए सरकार के खिलाफ उसे मुद्दा बनाकर तत्कालीन विपक्ष भारतीय जनता पार्टी और अन्ना आंदोलन के तत्कालीन सिपहसालार और आज की आम आदमी पार्टी के नेताओं और मीडिया ने पूरे देश को गरम कर दिया था। मामला था भी संवेदनशील और लोगों का गुस्सा भी स्वाभाविक था। कुछ इसी तरह हाथरस जिले के चंदवा गांव में हुए बलात्कार और उसके बाद पीड़िता की मौत ने पूरे देश के मानस को झकझोर दिया।

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इस बार भाजपा प्रदेश और देश में सत्तासीन है और कांग्रेस विपक्ष में है। कांग्रेस ने इसे मुद्दा बनाकर निर्भया कांड के अंदाज में ही भाजपा और उत्तर प्रदेश सरकार को घेरा है। कांग्रेस के साथ ही समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, रालोद और आम आदमी पार्टी के साथ साथ तृणमूल कांग्रेस औऱ भीम आर्मी तक हाथरस कांड को लेकर उत्तर प्रदेश की योगी सरकार के खिलाफ लामबंद हो गए।। रालोद नेता जयंत चौधरी पर तो पुलिस ने लाठियां भी भांजी।
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जबकि आप सांसद संजय सिंह पर कुछ शरारती तत्वों ने स्याही फेंकी। वहीं पीड़ित परिवार से मिलने की कोशिश में सपा कार्यकर्ताओं पर भी पुलिस ने लाठियां बजाईं। सपा प्रवक्ता अनुराग भदौरिया भी पुलिस लाठीचार्ज का शिकार लखनऊ में हुए। घर में करीब करीब नजरबंद किए गए भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद को आखिरकार घटना स्थल पर जाने की इजाजत प्रशासन को देनी ही पड़ी।
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लेकिन निर्भया कांड और हाथरस कांड की गंभीरता समान होने के बावजूद इसे लेकर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया अलग अलग हो रही हैं। तमाम कानून बनने और प्रशासनिक सख्ती के बावजूद अपराधिक घटनाएं कभी भी कहीं भी हो सकती हैं और इसके लिए सीधे-सीधे किसी भी मुख्यमंत्री और राज्य के शीर्ष अधिकारियों को तब तक दोषी नहीं माना जाना चाहिए, जब तक कि घटना के बाद उनकी प्रतिक्रिया और आरोपितों के खिलाफ पुलिस प्रशासन की कार्रवाई सामने न आ जाए। कोई भी सरकार और प्रशासन अपराध को रोकने और अपराधियों को कानूनी अंजाम तक पहुंचाने और पीड़ित पक्ष को न्याय दिलाने के लिए कितना प्रयत्नशील है, यही सबसे बड़ी कसौटी होनी चाहिए।

जहां निर्भया कांड के बाद बिना किसी राजनीतिक और सामाजिक भेदभाव के आमजनता और सत्ताधारी कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दल एकजुट होकर अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने और भविष्य में एसी घटनाएं न हों इसके लिए कानून बनाने के हक में खड़े हो गए थे, वहीं हाथरस कांड पर सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के कुछ नेताओं के बयान न सिर्फ अपनी प्रदेश सरकार के बचाव में आ रहे हैं बल्कि बलात्कार और हत्या के आरोप में गिरफ्तार किए गए युवकों का बचाव करते दिख रहे हैं।

जिस तरह बलिया जिले के भाजपा विधायक सुरेंद्र सिंह और बाराबंकी के एक कथित भाजपा नेता ने हाथरस कांड को लेकर लड़कियों पर विवादित और आपत्तिजनक बयान दिए हैं, वो बेहद शर्मनाक हैं। निर्भया कांड में दिल्ली पुलिस ने तत्परता दिखाते हुए 24 घंटों के भीतर सभी दोषियों की पहचान करके उन्हें गिरफ्तार करके गंभीर धाराओं का अभियुक्त बनाकर जेल भेज दिया था।

दिल्ली की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने निजी तौर पर पीड़ित परिवार से मिलकर न सिर्फ अपनी संवेदनाएं प्रकट कीं बल्कि तब तक जीवन मृत्यु के बीच झूल रही पीड़िता को तत्काल दिल्ली के सबसे ज्यादा चिकित्सा सुविधा संपन्न अस्पताल अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में भर्ती कराया। तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, कांग्रेस और यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी और कांग्रेस तत्कालीन उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी अस्पताल जाकर पीड़िता का हालचाल लिया और परिवार से संवेदना प्रकट की।

यही नहीं पीड़ित परिवार से मिलने जो भी राजनीतिक दलों के नेता आए किसी को भी नहीं रोका गया और न ही पीड़ित परिवार के घर की पुलिस घेराबंदी की गई। हालत ज्यादा बिगड़ने पर निर्भया को बेहतर इलाज के लिए सिंगापुर भेजा गया, लेकिन उसे बचाया न जा सका। वहां से जब रात में उसका शव आया तो उसे लेने आए परिवार के साथ हवाई अड्डे पर प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री ने मौजूद होकर ढांढस बंधाया। दिन के उजाले में सम्मान के साथ पूरे विधि विधान से पीड़िता का अंतिम संस्कार किया गया और उसे अंतिम श्रद्धांजलि देने के लिए मनमोहन सिंह, सोनिया गांधी, शीला दीक्षित, राहुल गांधी समेत भाजपा औऱ अन्य दलों के नेता भी मौजूद थे। यही नहीं इसके बाद निर्भया के परिवार के साथ सतत संपर्क में रहकर राहुल गांधी ने परिवार के बेटे को पायलट बनने में पूरी सहायता की।

अब हाथरस कांड पर आते हैं। घटना हुई। एक सप्ताह तक पुलिस ने कोई सुनवाई नहीं की। फिर एफआईआर हुई और घायल लड़की को बुरी हालत में अलीगढ़ के अस्पताल में भर्ती कराया गया, जबकि घर वाले उसे दिल्ली ले जाने की मांग करते रहे। हालत जब बिगड़ी तो दिल्ली लाया गया और न प्रदेश सरकार ने कोई ध्यान दिया न केंद्र सरकार ने। एम्स की जगह सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कराया गया और जब लड़की की मौत हो गई तो आधी रात को अस्पताल से शव ले जाकर परिवार वालों की मर्जी के खिलाफ बिना उनकी मौजूदगी में गांव के बाहर खेतों में जला दिया गया। तब तक लखनऊ में बैठी प्रदेश सरकार के अफसर और मुख्यमंत्री मंत्री ने कोई संवेदनशीलता नहीं दिखाई। दबाव में आरोपित गिरफ्तार तो किए गए, लेकिन उन्हें बचाने का खेल भी शुरू हो गया। जिले से लेकर लखनऊ तक के पुलिस अधिकारियों ने कहना शुरू कर दिया कि मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई है।

जबकि निर्भया के बाद संसद में सर्वसम्मति से पारित नए कानून में पीड़िता का बयान (मरने से पूर्व) ही पर्याप्त साक्ष्य है, मेडिकल जांच में पुष्टि हो या न हो। इस मामले में पीड़िता ने मरने से पहले अस्पताल में अपने साथ बलात्कार होने की बात कही है। जिसकी वीडियो क्लिप तमाम समाचार चैनलों ने चलाया। फिर भी अधिकारी और भाजपा के कुछ नेता यही दोहरा रहे हैं कि मेडिकल जांच में बलात्कार की पुष्टि नहीं हुई। भाजपा सांसद विनय कटियार तो पूरे दावे के साथ कह रहे हैं कि बलात्कार नहीं हुआ। भाजपा के एक और विधायक सुरेंद्र सिंह बयान दे रहे हैं कि माता-पिता लड़कियों में संस्कार डालें, जिससे कि उन्हें बलात्कार से बचाया जा सके। यानी लड़कियों को संस्कार की जरूरत है और लड़के खुले सांड की तरह घूमें और मनमानी करें।

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी तब जागे जब इस मामले को लेकर मीडिया और विपक्ष ने खासा शोर मचाया। तब उन्होंने आनन-फानन में पीड़ित परिवार को 25 लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा की। मामले की एसआईटी जांच का एलान किया गया और जब दबाव ज्यादा बढ़ा तो एसपी समेत कुछ पुलिस अधिकारी निलंबित किए गए और सीबीआई जांच की सिफारिश की गई। इतना सब होने के बावजूद एक मुख्यमंत्री और दो उप मुख्यमंत्री और दर्जनों मंत्री वाली सरकार के किसी मंत्री ने गांव आकर पीड़ित परिवार से मिलने की तकलीफ नहीं की।

उल्टे हाथरसे के पूर्व विधायक और आरोपितों के सजातीय राजवीर सिंह पहलवान ने लड़की की हत्या का आरोप उसकी मां और भाई पर लगा कर उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करके गिरफ्तारी की मांग की और इसके लिए उन्होंने अपने घर में बाकायदा जातीय पंचायत बुलाई, जिसे धारा 144 लागू होने के बाद भी प्रशासन ने पूरी सुरक्षा और सुविधा प्रदान की जबकि मीडिया और विपक्षी दलों के नेताओं को परिवार ने न मिलने देने के लिए पुलिस और प्रशासन ने हर वो हथकंडा अपनाया जिसकी इजाजत लोकतंत्र में नहीं है।

राज्य सरकार तब चेती जब कांग्रेस नेता राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने अपने समर्थकों के साथ दो दिन हाथरस कूच का एलान किया। एक दिन तो उन्हें ग्रेटर नोएडा से आगे नहीं जाने दिया गया, लेकिन इसके एक दिन बाद काफी जद्दोजहद करके पांच लोगों के साथ उन्हें हाथरस जाकर पीड़ित परिवार से मिलने की इजाजत दी गई। इसके एक दिन पहले राज्य के डीजीपी हरीशचंद्र अवस्थी और  अपर मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने लखनऊ से हाथरस आकर पीड़ित परिवार से बात की और उन्हें न्याय का भरोसा दिया।

लेकिन दूसरी तरफ हाथरस कांड की आड़ में जातीय दंगा भड़काने की कथित साजिश का पर्दाफाश भी उत्तर प्रदेश पुलिस ने करने का दावा किया और खुद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने संवाददाता सम्मेलन करके इसकी जानकारी मीडिया को दी। इसके पीछे सरकार ने पीएफआई के जरिए विदेशी साजिश किए जाने का आरोप लगाते हुए विपक्ष को भी निशाने पर लिया है। साथ ही इस मामले को नया मोड़ देने के लिए कथित रूप से बलात्कार पीड़िता लड़की और एक आरोपित के बीच मोबाईल फोन काल्स की डिटेल्स भी मीडिया के एक हिस्से को लीक करके यह साबित करने की कोशिश हो रही है कि पीड़ित लड़की और एक आऱोपित के बीच प्रेम-संबंध थे और उनके बीच लगातार मोबाईल से बातचीत होती थी। जबकि पीड़ित परिवार ने इसे गलत बताया है। पीड़ित लड़की को चरित्रहीन साबित करने के लिए तमाम तरह की अफवाहों को फैलाया जा रहा है। पूरे मामले को जातीय रंग देकर सवर्ण बनाम दलित बनाने की पुरजोर कोशिश हो रही है।

दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि इस कोशिश में स्थानीय पुलिस प्रशासन की तरफ से भी हवा दी जा रही है। लेकिन इन सवालों के संतोषजनक जवाब किसी के पास नहीं हैं कि पीड़ित लड़की को किन परिस्थितियों में तब खींच कर ले जाया गया जब वह अपनी मां के साथ खेत में काम कर रही थी और जब स्थानीय पुलिस से इसकी शिकायत की गई तो पुलिस न त्वरित कार्रवाई क्यों नहीं की। लड़की जब खेत में मरणासन्न अवस्था में मिली तो उसे तत्काल बेहतर इलाज के लिए उच्चस्तरीय सुविधाओं वाले दिल्ली के अस्पताल में क्यों नहीं भेजा गया और कई दिन बाद परिवार और मीडिया के दबाव जब दिल्ली भेजा गया तो एम्स की जगह सफदरजंग अस्पताल में क्यों दाखिल कराया गया, जहां उसने दम तोड़ दिया। इसके बाद परिवार की सहमति के बिना शव को अस्पताल से लाकर चुपचाप रात के अंधेरे में क्यों जला दिया गया।

हालाकि सुप्रीम कोर्ट में इस मामले पर राज्य सरकार की ओर से कहा गया है कि शव का दाह संस्कार परिवार की सहमति से पूरे विधि विधान से किया गया लेकिन परिवार ने इसे लगातार अपने बयानों में इसे गलत बताया है। हाथरस कांड पर जब विपक्ष और दलित संगठन उत्तर प्रदेश सरकार और स्थानीय पुलिस प्रशासन के खिलाफ सड़कों पर उतरकर दबाव बना रहे थे और मीडिया के एक बड़े हिस्से ने भी जब इस मामले को पूरे जोरशोर से उठाया तो भाजपा नेताओं और प्रवक्ताओं ने राजस्थान के बारां में दो जनजातीय युवतियों के साथ हुए बलात्कार कांड की आड़ लेकर विपक्ष को कठघरे में खड़ा करना शुरू कर दिया।

यह भाजपा और कांग्रेस की राजनीतिक लड़ाई के लिहाज से ठीक माना जा सकता है लेकिन बलात्कार जैसे जघन्य अपराध पर एक-दूसरे से अपनी कमीज को ज्यादा उजला बनाने की सियासी होड़ न सिर्फ दुर्भाग्यपूर्ण है बल्कि नारी की गरिमा पर भी चोट है। बेहतर ये होना चाहिए कि कांग्रेस राजस्थान की सरकार पर दबाव बनाए कि बारां के अपराधियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई हो और भाजपा उत्तर प्रदेश सरकार को हाथरस के आरोपितों के खिलाफ हर तरह की कानूनी कार्रवाई के लिए विवश करे। हाथरस और बारां के अलावा हाल ही में उत्तर प्रदेश में बलरामपुर, भदोही, कानपुर देहात, बुलंदशहर में और मध्य प्रदेश के खारगौन और एक दो अन्य जगहों पर बलात्कार और हत्या की दुर्भाग्यपूर्ण वारदात हुईं जो हाथरस के शोर में दब गईं।


संबंधित राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन को इन घटनाओं का संज्ञान लेकर भी दोषियों के खिलाफ कड़ा कार्रवाई बिना किसी भेदभाव और लागलपेट के करनी होगी। दुर्भाग्य और दुखद यह है कि निर्भया कांड के बाद पूरे देश में बलात्कार और महिलाओं के यौन शोषण के खिलाफ जो एक आम सहमति बनी थी, वह राजनीतिक दलों के दोहरे रवैए की वजह से टूटती जा रही है। जिसकी वजह से महिलाओं की सुरक्षा का सवाल और गंभीर हो गया है।

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