कुरुक्षेत्र: गंगा और चंबल के किनारों पर नड्डा की अग्निपरीक्षा
बताया जाता है कि अपने कार्यकाल के प्रारंभिक दिनों में नड्डा जब संगठन को लेकर किए जाने वाले फैसलों के बारे में मोदी और शाह की सलाह लेने बार-बार जाने लगे तो एक दिन खुद मोदी ने उनसे कहा कि अब वह पार्टी के अध्यक्ष हैं और उन्हें अपनी लकीर खुद खींचनी चाहिए...
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भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष जेपी नड्डा पार्टी के भीतर और बाहर दोहरी चुनौती से जूझ रहे हैं। एक तरफ उन्हें साबित करना है कि भाजपा ने अपने पूर्व अध्यक्ष और मौजूदा गृह मंत्री अमित शाह के कार्यकाल में जिन ऊंचाईयों को छुआ है वो न सिर्फ बरकरार रहेंगी बल्कि पार्टी उनसे आगे भी जाएगी। दूसरी तरफ नड्डा के सामने देश की बिगड़ती अर्थव्यवस्था, कोरोना संक्रमण से उत्पन्न संकट, बेरोजगारी और किसान कानूनों को लेकर हो रहे विरोध के सामने भाजपा और सरकार दोनों का बचाव करते हुए आक्रामक हो रहे विपक्ष को करारा जवाब देना है।
कुल मिलाकर नड्डा के सामने अमित शाह द्वारा खींची गई लकीर से अगर बड़ी नहीं तो कम से कम बराबर की लकीर खींचने की चुनौती है और अध्यक्ष पद संभालने के पहले दिन से ही नड्डा इस काम में जुटे हुए हैं। नड्डा की गंगा के दोनों किनारों पर बसे बिहार और मध्य प्रदेश में चंबल के किनारों पर हो रहे विधानसभा चुनाव और उपचुनावों में पहली अग्निपरीक्षा है। बेहद मृदुभाषी और सहज स्वभाव वाले जेपी नड्डा यानी जगत प्रकाश नड्डा भाजपा अध्यक्ष बनने से पहले पार्टी के महासचिव रहे और पिछले साल लोकसभा चुनावों के बाद उन्हें तत्कालीन अध्यक्ष अमित शाह के नेतृत्व में ही कार्यकारी अध्यक्ष की जिम्मेदारी देकर यह साफ कर दिया गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें जल्दी ही पार्टी की कमान संभालने की बड़ी जिम्मेदारी देना चाहते हैं।
कार्यकारी अध्य़क्ष के रूप में नड्डा ने अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाई और एक तरह से उन्होंने धीरे धीरे संगठन के सारे पेंच समझ लिए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ जे पी नड्डा का सांगठनिक और निजी रिश्ता तब से है जब मोदी भाजपा के महासचिव और हिमाचल प्रदेश के प्रभारी हुआ करते थे। मोदी तब से ही नड्डा के व्यवहार और संगठन क्षमता से परिचित थे, इसीलिए उन्होंने पहले नड्डा को केंद्र में बतौर पार्टी महासचिव फिर कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में परखने के बाद अपने बेहद विश्वस्त अमित शाह के उत्तराधिकारी के रूप में भाजपा अध्यक्ष पद पर बिठाया है।
बताया जाता है कि अपने कार्यकाल के प्रारंभिक दिनों में नड्डा जब संगठन को लेकर किए जाने वाले फैसलों के बारे में मोदी और शाह की सलाह लेने बार-बार जाने लगे तो एक दिन खुद मोदी ने उनसे कहा कि अब वह पार्टी के अध्यक्ष हैं और उन्हें अपनी लकीर खुद खींचनी चाहिए। नड्डा अपने नेता का संकेत समझ गए और उन्होंने फिर बिना किसी दबाव और प्रभाव के अपने फैसले लेने शुरू कर दिए
हैं। कई महीनों की जद्दोजहद के बाद जेपी नड्डा ने अपनी टीम बना ली है और उनकी टीम में जहां कई पुराने चेहरों पर फिर भरोसा जताया गया है, वहीं राम माधव. अनिल जैन, ओम माथुर, मुरलीधर राव जैसे कुछ पुराने दिग्गजों को संगठन की जिम्मेदारी से मुक्त किया गया है।
जाहिर है नड्डा ने इतना अहम फैसला सिर्फ अपने विवेक से ही नहीं लिया होगा। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री और संघ नेतृत्व दोनों की सहमति ली होगी। पार्टी अध्यक्ष पद से मुक्त होने के बाद अमित शाह की मौजूदगी न बिहार विधानसभा के चुनावों में दिख रही है और न ही मध्य प्रदेश के उपचुनावों में वह सक्रिय हैं। इसकी एक वजह पिछले दिनों उनका अस्वस्थ होना भी हो सकता है, हालाकि इलाज के बाद अब उन्होंने गृह मंत्रालय में अपना कामकाज बखूबी संभाल लिया है।शाह की इस गैर मौजूदगी से इन चुनावों में पार्टी की नैया पार लगाने की पूरी जिम्मेदारी अध्यक्ष के नाते जेपी नड्डा पर ही आ गई है।
इसे समझते हुए नड्डा महीनों पहले ही बिहार में सक्रिय हो गए। मध्य प्रदेश की जिम्मेदारी उन्होंने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान, केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा औऱ राज्य के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा को सौंप दी है। जो कांग्रेस से बगावत करके भाजपा में आए ज्योतिरादित्य सिंधिया के साथ मिलकर चुनावी महाभारत में भाजपा के रथ की बागडोर संभाले हुए हैं। बिहार में भाजपा और जद(यू) गठबंधन (एनडीए) इन चुनावों में राजद कांग्रेस के साथ साथ लोजपा की दोहरी चुनौती से जूझ रहा है। 15 सालों के नीतीश कुमार के शासन के खिलाफ लोगों में नाराजगी के साथ-साथ स्वर्गीय रामविलास पासवान के बेटे चिराग पासवान ने भी नीतीश कुमार के खिलाफ खुला मोर्चा खोल रखा है। चिराग के निशाने पर भाजपा नहीं जद(यू) है।
अब भाजपा अध्यक्ष के रूप में नड्डा की जिम्मेदारी पूरे एनडीए की है। अध्यक्ष के रूप में वह चिराग और नीतीश का झगड़ा नहीं सुलझा सके और लोजपा की अपनी खिचड़ी अलग पक रही है। माना जा रहा है कि चिराग का अलग लड़ना नीतीश को कमजोर करने की भाजपा की रणनीति है, लेकिन अगर यह रणनीति उल्टी पड़ गई और नीतीश के साथ साथ भाजपा का भी नुकसान हो गया तो उसका असर किसी और पर नहीं पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा की छवि पर पड़ेगा। इसलिए नड्डा के लिए बिहार में एनडीए का जीतना जरूरी है। अगर चिराग फैक्टर की वजह से जद(यू) की सीटें घट भी जाती हैं और भाजपा उससे आगे निकल जाती है तो नड्डा की साख और दबदबा दोनों में इजाफा हो जाएगा, क्योंकि जद(य़ू) की असफलता नीतीश कुमार की अलोकप्रियता के मत्थे मढ़ जाएगी और भाजपा की कामयाबी का सेहरा नए अध्यक्ष के सिर पर बंधेगा। इसलिए नड्डा के नेतृत्व में भाजपा को अपनी 115 सीटों में से कम से कम 80 से 90 सीटें जीतना जरूरी है। और भाजपा इसके लिए पूरा जोर लगा रही है।
मध्य प्रदेश में भले ही भाजपा का सारा दारोमदार शिवराज सिंह चौहान और नरेंद्र सिंह तोमर की जोड़ी और ज्योतिरादित्य सिंधिया के करिश्मे पर है, लेकिन यह मामूली उपचुनाव नहीं है। इस चुनाव के नतीजे मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार के भविष्य का फैसला भी करेंगे जिसे सिंधिया की बगावत के जरिए भाजपा ने कांग्रेस से छीना है। इसलिए यहां भी भाजपा के लिए कम से कम दस विधानसभा सीटें जीतना हर हालत में जरूरी है जिससे उसका अपना बहुमत बरकरार रहे और उसकी अन्य विधायकों पर निर्भरता खत्म हो जाएगी और पार्टी में भी बागी तेवर अपनाने वाले शांत हो जाएंगे।
हालांकि भाजपा के लिए यह कोई मुश्किल लक्ष्य नहीं है, लेकिन फिर भी अगर किसी कारण वश भाजपा इसे पाने से चूक जाती है तो उसका भी असर पार्टी के नेतृत्व पर पड़ेगा। वैसे भाजपा अध्यक्ष का कार्यकाल तीन साल का है और चुनावों की हार जीत से उस पर कोई फर्क नहीं पड़ता है, लेकिन क्योंकि 2014 के बाद से जिस तरह अमित शाह ने कुछ अपवादों को छोड़कर भाजपा को लगातार कई राज्यों में जीत का स्वाद चखाया और आक्रामक तेवर दिए, इसलिए भी जेपी नड्डा को पार्टी का वह रिकार्ड बनाए रखने की चुनौती है। अगर बिहार औऱ मध्य प्रदेश में नतीजे भाजपा के अनुकूल आते हैं तो पार्टी के भीतर बाहर नड्डा की साख बढ़ेगी और उनका दबदबा मजबूत होगा।अगर भाजपा चूकी तो यह उनके लिए पहला झटका होगा। इसलिए भी जेपी नड्डा यह चुनावी रण जीतने के लिए दिन रात मेहनत कर रहे हैं। क्योंकि गंगा और चंबल के किनारों पर उनकी यह पहली अग्निपरीक्षा है।