फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Know Why strong opposition is important for democracy

क्या मजबूत विपक्ष की भूमिका निभा पाएगी कांग्रेस? संसद से सड़क तक एक्टिव रहेंगे राहुल गांधी?

Tue, 28 May 2019 05:01 PM IST
Shilpa Thakur शिल्पा ठाकुर
Updated Tue, 28 May 2019 05:01 PM IST
विज्ञापन
Know Why strong opposition is important for democracy
2019 में हुआ 17वीं लोकसभा का चुनाव कई मामलों में अलग रहा। - फोटो : अमर उजाला

2019 में हुआ 17वीं लोकसभा का चुनाव कई मामलों में अलग रहा। एक ओर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा अमेरिका और फ्रांस की तरह राष्ट्रपति प्रणाली की तरह चुनावी जंग में उतरना और अपने दमखम पर सांसदों को जिताने देने की करिश्माई बदलाव इस चुनाव की खासियत रही है। लेकिन इस चुनाव की दूसरी सबसे अलग बात जो नजर आई वह थी विपक्ष की भूमिका। दरअसल, विपक्ष नजर तो आया लेकिन चुनाव परिणामों में जमीन पर बेहद कमजोर दिखाई दिया।  

विज्ञापन


आखिर क्यों कमजोर हुआ विपक्ष? 
23 मई को आए नतीजों में जनता ने भाजपा को भारी मतों से जिताया।  भाजपा को जहां 543 में से 303 सीटें मिलीं, वहीं कांग्रेस 52 पर सिमटकर रह गई। इस बार का लोकसभा चुनाव कई मायनों में ऐतिहासिक भी रहा। ऐतिहासिक इस रूप में कि आमतौर पर लोग उम्मीदवारों का चयन करते हैं, जिसके बाद उम्मीदवार प्रधानमंत्री को चुनते हैं। वहीं इस बार मामला एकदम उलट रहा। इस बार लोगों ने उम्मीदवारों को नहीं बल्कि सीधे प्रधानमंत्री को चुना। लोगों का ये भी कहना रहा कि उन्होंने वोट उम्मीदवार को देखकर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री को देखकर दिया। 
विज्ञापन


बहरहाल, इस पूरी चुनावी प्रक्रिया में एक बार फिर से कांग्रेस बिखरी हुई और हाशिये पर नजर आई। आलम यह रहा कि पार्टी संसद में विपक्षी दल का तमगा हासिल करने से भी तीन पायदान पीछे रह गई है। कांग्रेस 10 फीसदी यानी 55 सीट पाने में नाकाम रही है जिसके चलते राहुल गांधी को लीडर ऑफ अपोजीशन (एलओपी) का पद मिलते-मिलते रह गया।
विज्ञापन
विज्ञापन


कांग्रेस ही नहीं दूसरे दल भी पिछड़े 
अगर बात कांग्रस के अलावा अन्य विपक्षी दलों की करें तो उनकी स्थिति भी अब काफी खराब हो गई है। क्षेत्रीय पार्टियों का प्रदर्शन इस बार पहले की तरह अच्छा नहीं रहा। सिक्किम में सिक्किम डेमोक्रेटिक फ्रंट पार्टी को हार मिली, जिससे पवन कुमार चामलिंग का 25 साल पुराना दौर खत्म हो गया।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी ने पहले से खराब प्रदर्शन किया और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की पार्टी का सफाया हो गया। वहीं उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के गठबंधन का जादू भी नहीं चला। बिहार में लालू की पार्टी का भी इतना बुरा हाल शायद ही पहले कभी हुआ हो। 

Know Why strong opposition is important for democracy
लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरूरी है। - फोटो : File Photo

लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए विपक्ष कितना जरूरी?
बहरहाल, इस चुनावी उठापटक के बीच भले ही जनता ने बहुमत से अपनी पसंद के नेता को चुन लिया हो लेकिन विपक्ष का कमजोर होना भी कई मायनों में चिंताजनक है।

दरअसल, लोकतंत्र को जिंदा रखने के लिए एक मजबूत विपक्ष का होना बहुत जरूरी है। सरकार जो भी काम कर रही है, अगर उसमें कोई गलती होती है तो उसपर सवाल विपक्ष ही उठाएगा। जिन लोगों की आवाज सरकार नहीं सुनती वो आवाज विपक्ष ही सरकार तक पहुंचाता है।

एक ऐसा कानून जो किसी वर्ग विशेष को फायदा पहुंचाता हो और एक अन्य वर्ग के लिए खतरा उत्पन्न कर रहा हो, इस कानून को पास होने से रोकने में भी विपक्ष ही बड़ी भूमिका निभा सकता है। 

ऐसे में साफ सीधी बात ये है कि अगर विपक्ष मजबूत होगा तो सरकार तानाशाह नहीं होगी और देश की संवैधानिक संस्थाएं भी आजादी से बिना डरे अपना काम कर पाएंगी। यानी अगर एक मजबूत विपक्ष होगा तो वो सरकार को निरंकुश होने से रोकेगा। सरकार की मनमानी को रोकेगा।

क्या है निरंकुशता?
अगर सरकार निरंकुशता की ओर बढ़ती है तो एक मजबूत विपक्ष को देख वह अपने कदम पीछे खींच लेती है। कई बार विपक्ष जनहित के फैसलों और जनकल्याण के फैसले लेने के लिए सरकारों को बाध्य करता है। निर्णयों पर सोचने के लिए मजबूर करता है। 

पिछली सरकार में सुप्रीम कोर्ट के चार जजों का प्रेस कॉन्फ्रेंस करना गंभीर चिंता का विषय था, जिसमें उन्होंने आरोप लगाया कि न्यायपालिका के कामकाज को प्रभावित करने की कोशिश की जा रही है। यही नहीं सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति के दौरान भी हमें उठापटक देखने को मिली। ये सारे मामले बताते हैं कि लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका ना केवल प्रभावी होती है बल्कि सरकारों की निरंकुशता को भी नियंत्रण में रखने में भी कारगर होती है। 

Know Why strong opposition is important for democracy
कांग्रेस कार्यसमिति में राहुल और सोनिया गांधी - फोटो : PTI

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक मजबूत विपक्ष की भूमिका आज से नहीं बल्कि दशकों से देखी जाती रही है। 1975 में लगी इमरजेंसी और बाद में उसका विरोध भी विपक्ष के बूते ही संभव था। एक वो भी दौर था जब संसद में अटल बिहारी वाजपेयी, भैरों सिंह शेखावत और लाल कृष्ण आडवाणी जैसे नेता बोलते थे तो सत्ता पक्ष गंभीरता से उन्हें सुनता था। ये वो लोग तो सरकारों के दिशाहीन और निरंकुश होने की प्रवृत्ति पर लगाम लगाने वाले रहे। 

2014 से पहले यूपीए-2 की सरकार में टूजी से लेकर कोयला घोटाले जैसे मामलों में विपक्ष की भूमिका ही थी जिसने सड़क से लेकर संसद तक सरकार को घेरा और आखिरकार चुनाव के समय सत्ता से उखाड़ फेंका। यही नहीं इससे पहले 2004 में एनडीए-1 में वाजपेयी सरकार भी जमीन पर लोकलुभावन नारों से जनता को रिझाती रही तो कांग्रेस ने जमीनी मुद्दों और गरीबों के हक की आवाजों को उठाकर इंडिया शाइनिंग नारे की हवा निकालती। नतीजा यूपीए-1 के सामने हमारे पास आया। 

खास बात यह है कि 70 के दशक के बाद भारत की सत्ता में लंबे समय तक एक ही दल की सरकार होने की वजह से भारत की संसदीय प्रणाली में विपक्ष का चेहरा वैसा नहीं बन पाया जो एक समय नेहरु की सरकार के समय समाजवादियों का रहा। डॉ राम मनोहर लोहिया, मधु लिमिये, आचार्य नरेंद्र देव जैसे समाजवादियों ने कांग्रेस के सामने विपक्ष का जो चेहरा रखा वैसा चेहरा नेहरु के जाने के बाद नहीं दिखा।

लोहिया की मृत्यु और नेहरु का जाना विपक्ष के बीच के संबंधों की रेखा को भी तार-तार कर गया। हालांकि जयप्रकाश नारायण ने जो तेवर इंदिरा सरकार को दिखाए वैसे बाद में देखने को नहीं मिले, लेकिन जेपी पार्टी से दूर जनांदोलन के नेता थे और वे एक विशाल जनसमूह को सरकार की नीतियों के खिलाफ एकजुट करने में सफल रहे। यह वह समय था जब तानाशाही सरकारों को सत्ता से उखाड़ने के  लिए विपक्ष के चेहरे के रूप में याद किया जाता है।

सवाल यह है कि 2019 के चुनावों में विपक्ष का वह चेहरा कहां है? और यदि नहीं है तो लोकतांत्रिक प्रणाली में जनता की बात सरकार तक संसद में पहुंचाएगा कौन? कौन उन फैसलों पर नजर रखेगा जिनमें केवल चमकदार कंगुरे भर हों जबकि जनहित की नींवे नदारत हो? 

बिखरे और भटके हुए विपक्ष अक्सर लोकतंत्र को कमजोर करते हैं। उम्मीद है देश की सबसे पुरानी पार्टी में हमें एक कमजोर नहीं बल्कि मजबूत विपक्ष का चेहरा देखने को मिलेगा। राहुल गांधी और तमाम विपक्षी दल संसद से सड़क तक एक्टिव रहेंगे।  

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed