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केदारनाथ त्रासदी: केदारनाथ आपदा बनी पत्रकारिता की पाठशाला

Fri, 16 Jun 2023 10:30 AM IST
Kunal Verma कुणाल वर्मा
Updated Fri, 16 Jun 2023 10:30 AM IST
सार

सहस्त्रधारा हैलीपैड पर प्राइवेट एविएशन के हेलिकॉप्टर रेस्क्यू कर रहे थे। जुगाड़ और पैरवी करके जैसे-तैसे कुछ पत्रकार हेलिकॉप्टर से फाटा और गौचर तक पहुंचने में कामयाब भी हो गए थे। पर वहां से आगे जाने का न तो रास्ता था और न साहस। सबकुछ तबाह हो चुका था।

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Kedarnath Tragedy Uttarakhand Disaster Know 2013 Kedarnath Tragedy and Journalism Connection
मौसम ठीक होने के कुछ दिन बाद जब रेस्क्यू टीम केदारनाथ मंदिर के पास पहुंची तो कुछ इस तरह का दृश्य था। - फोटो : कुणाल वर्मा

विस्तार

किसी भी पत्रकार के जीवन में कुछ ऐसी घटनाएं घटती हैं जो उसके लिए पाठशाला बन जाती है। 2013 की उत्तराखंड त्रासदी कुछ ऐसी ही पाठशाला साबित हुई। इस एक पाठशाला ने उत्तराखंड के तमाम पत्रकारों की जिंदगी बदल कर रख दी। खबरों को देखने, समझने और उसे प्रस्तुत करने का हर तरह से नया नजरिया मिला।

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पहाड़ों का दर्द

भयानक आपदा से बचकर आए हर एक शख्स के साथ दस-दस कहानियां थीं। पहाड़ों का दर्द भी था और सरकार की नाकामियां भी थीं। संवाददाताओं और फोटो पत्रकारों को दिल से नमन। उन्होंने उस वक्त जो रिपोर्टिंग की वह पत्रकारिता के लिए मिसाल बनी। हालांकि कुछ ऐसी खबरों ने भी जगह बना ली, जिसने पत्रकारिता को गहराई तक शर्मिंदा किया। आज केदारनाथ त्रासदी के दस साल पर विशेष की दूसरी किस्त में कुछ ऐसी ही साहसिक रिपोर्टिंग और शर्मशार करने वाली खबरों की चर्चा।
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18 जून की शाम के बाद से राजधानी देहरादून के तमाम न्यूज रूम में त्रासदी के अलावा दूसरी खबरों की बात भी नहीं हो रही थी। हर तरफ से छन-छन कर आ रही सूचनाओं का समंदर था, जिसमें से खबर निकालना चुनौती से कम नहीं था। तमाम अखबारों के संवाददाताओं की टीम भी 19 जून की सुबह पहाड़ों की ओर रवाना हो चुकी थी।
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इन संवाददाताओं के साथ विकट समस्याएं थीं। पहाड़ों में पहुंचने के सभी रास्ते बंद थे। फोन और बिजली के लाइन ठप थे। अपनी गाड़ियों से रवाना हुए कुछ संवाददाता बीच रास्ते में फंस चुके थे। देहरादून के जॉली ग्रांट हवाई अड्डे से भारतीय सेना का रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू हो चुका था।

सबकुछ तबाह हो चुका था

सहस्त्रधारा हैलीपैड पर प्राइवेट एविएशन के हेलिकॉप्टर रेस्क्यू कर रहे थे। जुगाड़ और पैरवी करके जैसे-तैसे कुछ पत्रकार हेलिकॉप्टर से फाटा और गौचर तक पहुंचने में कामयाब भी हो गए थे। पर वहां से आगे जाने का न तो रास्ता था और न साहस। सबकुछ तबाह हो चुका था। सबसे अधिक चुनौती इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के सामने थी। उनके पास फुटेज के नाम पर ऋषिकेश में गंगा का रौद्र रूप था। इसी रौद्र रूप में स्वर्गाश्रम के भगवान शिव की बहती प्रतिमा की मोबाइल फुटेज थी। वहीं से लाइव रिपोर्टिंग शुरू थी।

अमर उजाला, दैनिक जागरण और हिन्दुस्तान जैसे बड़े अखबारों के कस्बाई संवाददाता पहाड़ों में मौजूद थे। पर उनके पास भी देहरादून तक खबरों को पहुंचाने का संसाधन सीमित हो चुका था। फिर भी उन्होंने जो किया उसने पत्रकारिता के लिए एक मिसाल कायम की। मुझे अच्छी तरह याद है अमर उजाला के अगस्त्यमुनि सेंटर के संवाददाता की कहानी। उसका नाम था दिनेश जमलोकी। आपदा ने उसका घर, खेत सबकुछ तबाह कर दिया था।

जैसे-तैसे वह अपने परिवार को बचा सका था। किसी का घर तबाह हो जाए, खाने को मोहताज हो, बेघर हो इससे बड़ी दुख की घड़ी क्या हो सकती है। पर सलाम पत्रकारिता के उस जज्बे को। दिनेश ने पहले अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर पहुंचाया। फिर लगातार पंद्रह दिन तक बिना थके, बिना रुके रिपोर्टिंग की। ऐसी-ऐसी जीवंत रिपोर्ट भेजी जिसने रोंगटे खड़े कर दिए। पहाड़ के दुख दर्द को उन संवाददाताओं ने जिस तरह देखा और महसूस किया उसे पूरी दुनिया तक पहुंचाया। कई विदेशी अखबारों में कस्बाई संवाददाताओं की लिखी रिपोर्ट और तस्वीरों ने जगह बनाई।

करीब तीन दिन बाद जब बारिश थमी तब मीडिया की टीम धीरे-धीरे पहाड़ के ऊपरी क्षेत्रों तक पहुंचने में कामयाब रही। जैसे-जैसे मीडिया पहाड़ों में ऊपर की ओर जा रही थी, वैसे-वैसे खबरों के तेवर बदलते जा रहे थे। खबरों की होड़ के बीच इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का हाल सबसे ज्यादा खराब था। चुंकि इन तीन-चार दिनों के बीच अखबारों के माध्यम से यह स्थापित हो चुका था कि आस्था के सबसे बड़े केंद्र केदारनाथ में ही सर्वाधिक नुकसान हुआ है।

पहले कौन पहुंचता है केदारनाथ?

ऐसे में टीवी पर अक्सर दिखने वाले बड़े चेहरों का बस एक ही मकसद हो गया था कि सबसे पहले केदारनाथ कौन पहुंचता है। हर चैनल पर बाद में यही ब्रेकिंग खबर चली, हम सबसे पहले पहुंचे केदारनाथ मंदिर। हमारे चैनल पर देखिए केदारनाथ की पहली तस्वीर। हमारे रिपोर्ट्स ने जान की बाजी लगा दी यहां तक पहुंचने में। कुछ ऐसे ही हेडलाइन के साथ ब्रेकिंग न्यूज में आपदा पीड़ितों की कहानी दब गई। हालांकि, इस सच्चाई से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सक्रियता नहीं दिखाई होती तो शायद इतनी बड़ी त्रासदी की जीवंत सच्चाई पूरी दुनिया नहीं देख सकती।

इस आपदा ने पत्रकारिता की साख पर बट्टा भी लगाया। एक बड़े चैनल के बड़े पत्रकार ने तो वह कर दिया जो लंबे समय तक याद रखा जाएगा। बांग्लादेश के पहाड़ों में हुए बस एक्सीडेंट की फूटेज को लाइव कवरेज में कंवर्ट करके लाइव रिपोर्ट दिखा दी। पांच-छह घंटे तक चली इस रिपोर्ट के बाद जब चैनल को अहसास हुआ तो तुरंत रिपोर्ट हटा दी गई।

यह वीडियो क्लिप 18 जून से ही सोशल मीडिया में वायरल हो रही थी। इसी को लाइव करके चला दिया गया था। बस खाई में गिर रही थी और चैनल का रिपोर्टर लाइव रिपोर्ट कर रहा था। टीवी पत्रकारिता के पतन की यह हद थी।

ठीक इसी तरह एक राष्ट्रीय अखबार ने केदारनाथ में लूट की खबरों को प्रमुखता से प्रकाशित किया। बताया कि केदारघाटी में नेपाली युवक शवों के साथ किस तरह गंदी हरकत कर रहे हैं। महिलाओं की लाश से गहने चुराए जा रहे हैं। अंगुलियों में पहनी अंगुठी उतारने के लिए चाकू से अंगुली काट दी जा रही है।

अखबार को मांगनी पड़ी थी माफी

हद तो यह हो गई कि एक महिला के शव के अंगुली को काटती तस्वीर भी प्रकाशित कर दी गई। इस खबर और तस्वीर ने तहलका मचा दिया। बाद में वह खबर और तस्वीर झूठी निकली। तस्वीर किसी दूसरे देश की थी। उत्तराखंड सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा और अखबार को माफी तक मांगनी पड़ी।

इस तरह के सैकड़ों उदाहण थे आपदा के दौरान जब पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती सामने थी। एक तरफ जहां ऐसे शर्मशार करने वाले उदाहरण सामने थे, वहीं दूसरी तरफ उत्तराखंड के फोटो पत्रकारों की जीवंत तस्वीरें भी थीं। उन तस्वीरों ने पहाड़ की चुनौतियों को साक्षात दिखा दिया था।

आपदा के दौरान पहाड़ी क्षेत्रों से आने वाली एक-एक तस्वीर अपने आप में कई सौ शब्दों की कहानी बयां करने के लिए काफी थी। इलेक्टॉनिक मीडिया की फुटेज में भी शब्दों का स्थान ना मात्र का ही था। उन तस्वीरों और फुटेज को देखकर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं। 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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