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केदारनाथ आपदा से क्या सीखा हमने?

Mon, 17 Jun 2024 04:03 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Mon, 17 Jun 2024 04:03 PM IST
सार

अगर केदारनाथ आपदा से कोई सबक सीखा होता तो 7 फरवरी 2021 को सीमान्त चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में धौली गंगा और ऋषिगंगा की बाढ़ की तबाही नहीं होती।

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Kedarnath Tragedy: Natural Disaster In Uttarakhand Impact And Effect On The Nature
केदारनाथ धाम - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

विस्तार

केदारनाथ आपदा को गुजरे हुए 11 साल हो गए मगर उस विभीषिका के घाव अब तक नहीं भर पाए। उस त्रासदी में न जाने कितने लोग मरे होंगे, इसका सटीक अनुमान नहीं लग सका। मगर राज्य पुलिस द्वारा मानवाधिकार आयोग को सौंपी गई रिपोर्ट में इस आपदा में पूरे 6182 लोग लापता बताए गए। इनके अलावा लगभग 500 नरकंकाल पहाड़ियों पर भी मिले। लापता का मतलब जो कभी नहीं लौट सके। जिन साधुओं का पूछने वाला कोई नहीं तथा देश के सुदूर हिस्सों से आये गरीब यात्रियों का कोई रिकार्ड ही नहीं था। गैर सरकारी अपुष्ट अनुमानों में मृतकों की संख्या 10 हजार से अधिक बतायी गयी थी। 
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अगर केदारनाथ आपदा से कोई सबक सीखा होता तो 7 फरवरी 2021 को सीमान्त चमोली जिले के उच्च हिमालयी क्षेत्र में धौली गंगा और ऋषिगंगा की बाढ़ की तबाही नहीं होती। उस त्रासदी में कम से कम 206 लोगों के मारे जाने की पृष्टि हुयी। अगर स्थानीय जनता और चण्डी प्रसाद भट्ट जैसे पर्यावरणविदों के विरोध के बावजूद ऋषिगंगा पर 13.2 मेगावाट और धौली गंगा पर 520 मेगावाट के बिजली प्रोजक्ट नहीं बन रहे होते तो इन नदियों की बाढ़ उतनी विनाशकारी नहीं होती। लगता है हमारे योजनाकार और नीति नियंता न तो केदारनाथ की और ना ही धौलीगंगा की बाढ़ की विभीषिका से कोई सबक सीख सके। सवाल केवल उत्तराखण्ड हिमालय के विप्लवों का नहीं है। विकास के नाम पर पारिस्थितिकी से बेतहासा छेड़छाड़ सम्पूर्ण हिमालय के साथ हो रही है, जिसका अंजाम हम पिछले साल हिमाचल प्रदेश में भी देख चुके हैं।
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सौंदर्य के नाम पर जोखिम को आमंत्रण

अगर 2013 के केदारनाथ और 2021 की धौलीगंगा आपदा से सबक लिया गया होता तो केदारनाथ में सौंदर्यीकरण और सुरक्षा के नाम पर इस तरह भारी भरकम निर्माण नहीं किया जा रहा होता। जबकि भारतीय भूगर्व विभाग के तत्कालीन निदेशक सहित महेन्द्र प्रताप सिंह बिष्ट आदि भूवैज्ञानिकों ने रामबाड़ा से ऊपर किसी भी हाल में भारी निर्माण कार्यों पर रोक लगाने की सिफारिश के साथ कहा था कि केदारनाथ धाम किसी ठोस जमीन पर न होकर मलबे के ऊपर स्थापित है, जो कि भारी निर्माण को सहन नहीं कर सकता। इधर विशेषज्ञों की चेतावनियों के बावजूद सौंदर्यीकरण के नाम पर बदरीनाथ धाम को भी खोद दिया गया। इस खुदाई के कारण बदरीनाथ की क्रोम धारा जैसी कुछ पवित्र धाराएं लुप्त हो गयीं।
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संवेदनशील हिमालय पर आस्था की बाढ़

यातायात के साधनों और सहूलियतों में वृद्धि के चलते उत्तराखण्ड के चारों धामों में यात्रियों की भीड़ पिछले रिकार्ड तोड़ती जा रही है। इस साल 16 जून तक चारों धामों में 23,54,440 यात्री पहुंच चुके थे। जबकि सन् 2000 तक पूरे छह महीनों में इससे बहुत कम यात्री आते थे। इन तीर्थों तक मोटर सड़क बनने से पहले मात्र 60-70 हजार यात्री ही पहुंच पाते थे। खास बात यह है कि यात्रियों का सैलाब बदरीनाथ से ज्यादा केदारनाथ में उमड़ रहा है। जबकि केदारनाथ के लिये 21 किमी लम्बी पैदल यात्रा है और बदरीनाथ सीधे वाहन से जाया जाता है।

भारी भीड़ जब संभल नहीं पाई तो सरकार ने यात्रियों के लिए प्रतिदिन का कोटा रखा मगर फिर उसे हटा दिया। आखिर सरकार को भी यात्रियों की भारी संख्या की उपलब्धि का बखान करना है। पद्मभूषण चण्डी प्रसाद भट्ट आदि विशेषज्ञों के अनुसार हिमालयी तीर्थों पर उनकी धारक क्षमता से इतनी अधिक भीड़ विनाशकारी ही हो सकती है।

सबसे अधिक चिन्ता का विषय तो यह है कि लाखों वाहन सीधे गंगोत्री और सतोपन्थ ग्लेशियर समूहों के पास तक पहुंच रहे हैं। जिससे इन ग्लेशियरों के पिघलने की गति बढ़ने और हिमालय पर हिमनद झीलों की संख्या और आकार बढ़ने का खतरा उत्पन्न हो गया है। सन् 2013 की बाढ़ में चोराबाड़ी झील ही केदारनाथ पर टूट पड़ी थी। प्राप्त आंकड़ों के अनुसार इस साल 16 जून तक मात्र एक माह और 6 दिन में 2,58,957 वाहन बदरीनाथ और गंगोत्री तक और केदारनाथ तथा यमुनोत्री के निकट पहुंच चुके थे। शासन-प्रशासन यात्रियों की संख्या गिन-गिन कर ही आत्मविभोर है।  

Kedarnath Tragedy: Natural Disaster In Uttarakhand Impact And Effect On The Nature
केदारनाथ मार्ग - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी

एनआइडीएम की सिफारिशें गयीं रद्दी में

केदारनाथ आपदा के कारणों का पता लगाने के लिये राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान (एनआइडीएम) की टीमों ने स्वयं दो बार आपदाग्रस्त क्षेत्र का दौरा करने के साथ ही रिमोट सेंसिंग, वाडिया इंस्टीट्यूट ऑफ हिमालयन जियॉलाजी, राज्य आपदा न्यूनीकरण केन्द्र और भूगर्व सर्वेक्षण विभाग जैसी विभिन्न विशेषज्ञ ऐजेंसियों के सहयोग से तीन खण्डों में अपनी रिपोर्ट तैयार की थी। जिसमें केदारनाथ आपदा से सबक लेने के लिये 19 सिफारिशें और चेतावनियां दीं गयीं थीं। इनमें भी जलविद्युत परियोजनाओं को ज्यादा फोकस कर कहा गया था कि जलविद्युत परियोजनाओं से सदैव पर्यावरण विशेषज्ञों के साथ ही स्थानीय समुदाय को त्वरित बाढ़, जमीन धंसने, जल श्रोत सूखने और जनजीवन प्रभावित होने के साथ ही वन्य जीवन और पर्यावरण दूषित होने की शिकायतें भी रही हैं।  

बिजली परियोजनाओं से खतरे की अनदेखी

रिपोर्ट में कहा गया था कि उत्तराखण्ड जैसे संवेदनशील हिमालयी क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं के लिये पर्यावरण प्रभाव आंकलन बाध्यकारी होना चाहिए। इन परियोजनाओं की विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (डीपीआर) में सुरंगों तथा अन्य क्षेत्रों से पहाड़ काट कर निकले मलबे के निस्तारण का भी स्पष्ट प्लान होना चाहिए। जिसमें मलबा निस्तारण के उचित स्थान और मलबे को निस्तारण स्थल तक पहुंचाने का स्पष्ट उल्लेख होना चाहिये तथा डम्पिंग जोन को नदी क्षेत्र से काफी दूर होना चाहिए। इसमें डम्पिंग स्थल पर सुरक्षा दीवार जरूरी बताई थी ताकि बरसात में मलबा न बह सके? क्योंकि इस मलबे से नदी में त्वरित बाढ़ आने के साथ ही नदी की दिशा भटक जाती है जो कि भूस्खनों को भी जन्म देती हैं। रिपोर्ट में कहा गया था कि केदारनाथ की बाढ़ में श्रीनगर में 330 मेगावाट की परियोजना और चमोली जिले में 400 मेगावाट की विष्णुप्रयाग परियोजनाओं के मलबे ने बाढ़ की विभीषिका को कई गुना बढ़ाया है।

भूस्खलन जोनिंग मैप की अनदेखी

इसरो द्वारा गत वर्ष जारी देश के 147 संवेदनशील जिलों के भूस्खलन मानचित्र में उत्तराखण्ड का रुद्रप्रयाग जिला संवेदनशीलता कह दृष्टि से एक नम्बर पर तथा टिहरी दूसरे नम्बर पर दिखाया गया है। प्रदेश के सभी 13 जिले संवेदनशील बताये गये हैं। लेकिन इस ओर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। एनआइडीएम की रिपोर्ट में भूस्खलन जोनेशन मैपिंग का प्राथमिकता के आधार पर पालन, निर्माण कार्यों में विस्फोटों के प्रयोग पर रोक, सड़क निर्माण में वैज्ञानिक पद्धति के आधार पर, ढलानों के स्थिरीकरण के ठोस प्रयास और ग्लेशियल लेक तथा नदी प्रवाह निगरानी का ठोस ढांचा तैयार करने की सिफारिश भी की गयी थी। अगर इन सिफारिशों पर ध्यान दिया जाता तो पहाड़ इस तरह नहीं काटे जाते और केदारनाथ जैसे संवेदनशील स्थान पर सीमेंट कंकरीट का इतना बड़ा ढांचा भी खड़ा नहीे किया जाता और अब ना ही एवलांच संभावित बदरीनाथ धाम की हजामत की तैयारी न होती।


हिमालयी आपदाओं में 4 गुना वृद्धि

पर्यावरण सम्बन्धी अनुसंधानों में संलग्न संस्था ‘काउंसिल ऑन इनर्जी, इनवायर्नमेंट एण्ड वाटर’ (सीईईडब्लु) द्वारा हाल ही में जारी एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में 1970 की अलकनन्दा बाढ़ के बाद त्वरित बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने, हिमनद झीलों के फटने और बिजली गिरने आदि आपदाओं में चार गुना वृद्धि हो गयी है। इन आपदाओं के खतरे में राज्य के 85 प्रतिशत जिलों की 90 लाख से अधिक आबादी आ गयी है। रिपोर्ट में इन आपदाओं का कारण पर्यावरण की उपेक्षा बताया गया है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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