...जब केदारघाटी में अंतिम संस्कार के लिए हेलिकॉप्टर से भेजी गई लकड़ियां
उस वक्त मुश्किल यह भी थी कि पहाड़ों में मौजूद लकड़ियां बारिश से पूरी तरह भींग चुकी थी। इससे अंतिम क्रिया नहीं की जा सकती थी। केदारनाथ मंदिर परिसर में भी सैकड़ों शव इधर-उधर बिखरे पड़े थे। सड़ गल रहे इन शवों से उठ रही दुर्गंध ने आवारा हिंसक पशुओं को भी आमंत्रित कर दिया था।
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
विज्ञापनचाहने वालों ने कोशिश तो बहुत की लेकिन
खो गया मैं तो ढूंढ न पाया मुझको!
सख्त हैरत में पड़ी थी मौत, ये जुमला सुनकर
आ, अदा करना है सांसों का किराया मुझको !!
केदारघाटी में जहां-तहां पड़े हजारों शव शायद अपनी सांसों का किराया इसलिए मांग रहे थे क्योंकि उन्हें मुक्ति चाहिए थी। सबसे बड़ा सवाल यही तो था आपदा के बाद, आखिर उन्हें मुक्ति कौन देगा। इसका जिम्मा दिया गया उत्तराखंड पुलिस और एनडीआरएफ की टीम को। बेहद खराब मौसम, रास्तों का अता पता नहीं, कनेक्टिविटी की दिक्कत, भोजन सामग्री की किल्लत, इन सबके बीच जांबाजों को ऐसा काम करना था जिसके लिए उन्हें कभी प्रशिक्षण देने की परिकल्पना भी किसी ने नहीं की होगी। इन जवानों को शवों को खोजकर उनका अंतिम संस्कार करना था।
मौसम की चुनौती थी
इस टीम में पहाड़ों में काम करने का अनुभव रखने वाले विशेष प्रशिक्षण प्राप्त जवान थे। इनका काम था ऊंचे-ऊंचे पहाड़ों में शवों की खोज करना और उन्हें एक जगह जमा करना। फिर इसकी सूचना दूसरी टीम को देना। दूसरी टीम शवों का एक साथ दाह संस्कार करती थी। इस काम में सबसे बड़ी चुनौती थी मौसम की मनमानी।विज्ञापन
बारिश से पूरी तरह भींग चुकी थी लकड़ियां
मुश्किल यह भी थी कि पहाड़ों में मौजूद लकड़ियां बारिश से पूरी तरह भींग चुकी थी। इससे अंतिम क्रिया नहीं की जा सकती थी। केदारनाथ मंदिर परिसर में भी सैकड़ों शव इधर-उधर बिखरे पड़े थे। सड़ गल रहे इन शवों से उठ रही दुर्गंध ने आवारा हिंसक पशुओं को भी आमंत्रित कर दिया था। चुनौती यह भी थी कि अगर इन शवों का जल्द से जल्द दाह संस्कार नहीं किया गया तो महामारी फैल जाएगी।विज्ञापन विज्ञापन
इस चुनौती में एक बार फिर सहारा बनी इंडियन एयर फोर्स की जांबाज टीम। एयर फोर्स के बड़े कार्गो एयरक्राफ्ट से लकड़ियां भेजे जाने का निर्णय हुआ। गौचर स्थित एयर बेस पर सूखी लकड़ियां पहुंचाई जाती थी फिर वहां से इन लकड़ियों को हेलिकॉप्टर में डाल कर केदारघाटी पहुंचाने का काम शुरू हुआ।
इतिहास में पहली बार हो रहा था कुछ ऐसा
एयर फोर्स के इतिहास में यह पहली बार था कि हेलिकॉप्टर से लकड़ियां ढोई जा रही थी। लड़कियों को बैलेंस के साथ हेलिकॉप्टर में रखना और खराब मौसम के बीच घाटी में सुरक्षित उतारने का इससे पहले न तो प्रशिक्षण दिया गया था और न इस प्रशिक्षण के बारे में किसी ने सोचा था। पूरी दुनिया ने इंडियन एयरफोर्स के जांबाजों के साहस को सलाम किया।
इंडियन एयरफोर्स ने इस अभियान को नाम दिया था ऑपरेशन राहत। एयरफोर्स के जांबाजों के पास एक तरफ लोगों को सुरक्षित पहुंचाने की जिम्मेदारी थी दूसरी तरफ शवों के दाह संस्कार की। इस ऑपरेशन को एयर कमोडोर राजेश इस्सर लीड कर रहे थे।
घाटी में बनाए गए थे स्पेशल हैलीपैड
एयरफोर्स ने 23 एमआई-17, 2 सी-130 हरक्यूलिस ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट सहित करीब 45 एयरक्राफ्ट को पूरी ताकत के साथ इस ऑपरेशन में झोंक दिया था। गौचर और धरासू में एडवांस्ड लैंडिग ग्राउंड तैयार किया। केदारघाटी में भी स्पेशल हैलीपैड बनाए गए थे। लोगों को बचाने की जिम्मेदारी पूरी करने के साथ-साथ एयरफोर्स की टीम घाटी में सूखी लकड़ियां भी पहुंचाने लगी थी।
एयरफोर्स की सहायता मिलने के बाद शवों के अंतिम संस्कार में तेजी आई। तत्कालीन डीआईजी संजय गुंज्याल को इस टीम को लीड करने की जिम्मेदारी मिली थी। इस जांबाज पुलिस अधिकारी ने अपने सहयोगियों के साथ कई दिनों तक केदारघाटी में खतरनाक और विपरीत परिस्थितियों के बीच कैंप किया।
खुद शवों को उठाकर चिता सजाई। सामूहिक चिताओं को राजकीय सम्मान देते हुए अपने साथियों के साथ उन्हें अंतिम सलामी दी। फिर उनका संस्कार किया। कई दिनों तक यही प्रक्रिया चलती रही।
उस वक्त के डीआईजी जीएस मातोर्लिया, डीआईजी अमित सिन्हा, एसएसपी निलेश आनंद भरणे, एसपी प्रदीप कुमार राय, एसपी मणिकांत मिश्रा, एसपी नवनीत भुल्लर, एसपी स्वतंत्र सिंह ये कुछ ऐसे नाम थे जो अपनी टीम के साथ आपदा के समय हीरो की तरह उभरे।
न नाम की चाहत, न टीवी पर चेहरा चमकाने की ख्वाहिश, न अखबार के पन्नों में जगह की तमन्ना और न कोई अवार्ड की हसरत। बेहद खतरनाक परिस्थितियों में इन्होंने अपने कर्तव्य को अंजाम दिया। तत्कालीन डीजीपी सत्यव्रत बंसल ने भी अपनी लीडरशिप क्वालिटी की बेहतरीन मिसाल कायम की।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।