कहानी कश्मीर में अनुच्छेद 370 और 35 ए कीः इतिहास से झांकता एक ऐतिहासिक फैसला
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जम्मू-कश्मीर को स्वायतता देने वाला अनुच्छेद 370 को मोदी सरकार ने खत्म कर दिया। निःसंदेह यह नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली राष्ट्रीय लोकतंत्रिक गठबंधन सरकार का ऐतिहासिक फैसला है। दरअसल, स्वतंत्रता के समय द्विराष्ट्रवाद के सिद्धांत को लेकर जब भारत और पाकिस्तान का विभाजन हो रहा था तो देश की कुछ रियासतों ने अपने आप को दोनों देशों से अलग स्वतंत्र अस्तित्व की बात की थी, जिसमें जम्मू-कश्मीर, हैदराबाद के निजाम, जूनागढ़ प्रमुख थे।
चूंकि हैदराबाद और जूनागढ़ भारत के आंतरिक भाग में था इसलिए अंततोगत्वा दोनों को भारतीय संघ में विलय के लिए मजबूर होना पड़ा, लेकिन जम्मू-कश्मीर की भौगोलिक स्थिति उसे अलग बना रहा था। कश्मीर के तात्कालीन राजा महाराजा हरिसिंह ने जम्मू-कश्मीर को अलग रखने का पूरा मन बना लिया था लेकिन इसी बीच पाकिस्तान की ओर से अफगानी कबालियों ने कश्मीर पर हमला बोल दिया।
इस अचानक हमले से राजा घबरा गए और सहायता के लिए भारत की ओर हाथ बढ़ाया। भारत ने सशर्त सहयोग का आश्वासन दिया और अपनी सेना भेज दी। युद्ध हुआ, लेकिन तबतक पाकिस्तानी कश्मीर के एक बड़े हिस्से पर कब्जा कर चुके थे। कश्मीर का अधिकतर हिस्सा भारत में रहा और कुछ हिस्से पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया। भारत पाकिस्तान के बीच झूल रहे जम्मू-कश्मीर को भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू संयुक्त राष्ट्र में ले गए लेकिन वहां भी मामला उलझा ही रहा। इसके कारण कश्मीर का मामला दिन ब दिन उलझता ही गया।
चूंकि पाकिस्तान के साथ कश्मीर में युद्ध की स्थिति बनी थी और वहां अशांति भी थी साथ ही पूरा का पूरा कश्मीर भी भारत का अंग नहीं बन पाया था इसलिए भारत का संविधान वहां की विधानसभा में पारित नहीं हो पाया। ऐसी परिस्थिति में कश्मीर को भारत का अंग बनाए रखने के लिए संविधान में अलग से एक व्यवस्था दी गई जिसे धारा 370 के नाम से जाना गया।
इसके बाद भारत के प्रथम राष्ट्रपति डाॅ. राजेन्द्र प्रसाद और कश्मीर के राजा महाराजा हरि सिंह के सिपहसालार शेख अब्दुल्ला के बीच 1954 में एक समझौता हुआ। उस समझौते के तहत एक आदेश से अनुच्छेद 35-ए को भारतीय संविधान में जोड़ा गया था। इस अनुच्छेद को संविधान में शामिल करने से कश्मीरियों को यह विशेषाधिकार मिला कि बाहरी यहां नहीं बस सकते हैं। 35-ए से जम्मू-कश्मीर को विशेषाधिकार मिला हुआ था।
जम्मू-कश्मीर से बाहर का कोई भी व्यक्ति यहां अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता है। इसके साथ ही कोई बाहरी व्यक्ति यहां की महिला से शादी करता है तब भी संपत्ति पर उसका अधिकार नहीं हो सकता है। लेकिन इस दर्जे को लेकर पूरे देश में असंतोष था।
खासकर भारतीय जनता पार्टी इसे दो विधान, दो प्रधान, दो निशान मानती रही और इसके खिलाफ आन्दोलन करती रही। जम्मू-कश्मीर को लेकर डाॅ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के नेतृत्व में अखिल भारतीय जनसंघ ने सबसे पहले आन्दोलन प्रारंभ किया। उस आन्दोलन में डाॅ. मुखर्जी गिरफ्तार हुए और जम्मू-कश्मीर में ही उनकी मौत हो गई।
कश्मीर पूरा न तो भारत के पास है और न ही पाकिस्तान के पास है। कश्मीर को भारत द्विपक्षीय मुद्दा मानता है जबकि पाकिस्तान को तीसरे पक्ष से परहेज नहीं है। पाकिस्तान कश्मीर में जनमत संग्रह की मांग करता रहा है लेकिन भारत सदा से इसके पक्ष में नहीं रहा। भारत का कहना है कि वहां भारतीय संविधान के आधार पर प्रत्येक पांच साल पर संसद के चुनाव हो रहे हैं और व्यवस्थित विधानसभा है इसलिए जम्मू-कश्मीर में जनमत संग्रह की कोई जरूरत नहीं है।
अनुच्छेद 370 के कारण जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान था। इसके साथ ही सुरक्षा और विदेश मामलों को छोड़कर हर फैसला लेने का अधिकार था। संविधान के इस हिस्सा के हटने से संविधान से कश्मीर को मिला विशेष दर्जा अब खत्म हो गया है। हालांकि जानकार बताते हैं कि 1947 में स्वायतत्ता के आधार पर ही कश्मीर भारत के साथ आया था लेकिन भारतीय पक्ष इस बात को नकारता रहा है।
भारतीय पक्ष, खासकर भाजपा से संबंधित चिंतकों का दावा है कि जम्मू-कश्मीर में चूंकि पाकिस्तान हावी हो रहा था इसलिए वहां के राजा ने भारत के साथ विलय की सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किया। अनुच्छेद 370 से जम्मू-कश्मीर को संविधान में विशेष दर्जा मिला हुआ था। इसे गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में खत्म करने घोषणा कर दी। इससे पहले प्रधानमंत्री के आवास पर कैबिनेट की बैठक हुई थी।
अमित शाह ने कहा कि जम्मू-कश्मीर का फिर से पुनर्गठन किया गया है। जम्मू-कश्मीर को दो हिस्सों में केंद्र शासित प्रदेश बना दिया गया है। जम्मू-कश्मीर एक केंद्र शासित प्रदेश होगा और दूसरा लद्दाख केन्द्र शासित प्रदेश होगा। जम्मू-कश्मीर में विधानसभा होगी जबकि लद्दाख फिलहाल केन्द्र के जिम्मे रहेगा।
केन्द्रीय गृहमंत्री के द्वारा संसद में पेश किए गए संकल्प और धारा 370 को वापस लेने के बाद अब जम्मू-कश्मीर को वह अधिकार प्राप्त नहीं रहेगा जो पहले था। इसलिए यह फैसला सचमुच भाजपा सरकार का ऐतिहासिक फैसला है। भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में सदा से इस बात को जोड़ती रही थी कि वह पूरे देश में एक प्रकार का संविधान लागू करेगा। इस संकल्प को भाजपा ने पूरा किया और उसने न केवल तीन तलाक विधेयक संसद के दोनों सदनों में पास करवाया अपितु कश्मीर को भी विशेष दर्जा से मुक्त कर दिया।
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