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Caste Census: राजनीतिक संतुलन साधने के लिए दोबारा जाति जनगणना कराएगी कर्नाटक सरकार!

Prabhakar Mani Tewari प्रभाकर मणि तिवारी
Updated Sun, 27 Jul 2025 12:25 PM IST
सार

मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की दलील है कि विभिन्न जातियों के साथ होने वाले भेदभाव और असमानता को दूर करना ही ताजा कवायद का प्रमुख मकसद है। राज्य का अगला बजट भी इसी जनगणना रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया जाएगा।

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Karnataka government will conduct caste census again to maintain political balance
सिद्धारमैया, सीएम, कर्नाटक - फोटो : ANI

विस्तार

कर्नाटक में दस साल पहले वर्ष 2015 में जाति जनगणना कराई गई थी, लेकिन इसमें लंबा समय लगा और उसके नतीजे सत्तारूढ़ पार्टी की उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहे थे। इसी वजह से लंबे समय बाद बीते साल इसकी रिपोर्ट सरकार को पेश की गई थी। लेकिन इस साल की शुरुआत में रिपोर्ट के कुछ हिस्से लीक होने के बाद राज्य में राजनीतिक और सामाजिक संतुलन गड़बड़ाने लगा था।

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पहले की रिपोर्ट पर परदा डालने और सत्ता संतुलन साधने  के लिए सिद्धारमैया सरकार ने नए सिरे से जाति जनगणना का फैसला किया है। यह कवायद 22 सितंबर से सात अक्तूबर तक चलेगी। राज्य की सात करोड़ आबादी के लिए इस काम में 1.60 लाख सरकारी कर्मचारियों को लगाया जाएगा। इसकी रिपोर्ट नवंबर के पहले सप्ताह के दौरान आ जाएगी। 
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इससे पहले सिद्धारमैया के पहले कार्यकाल में वर्ष 2015 में हुई जनगणना रिपोर्ट पिछड़ा आयोग के अध्यक्ष एच। के। कंथराज के नेतृत्व में तैयार की गई थी। लेकिन उसके बाद यह ठंढे बस्ते में पड़ी रही। सिद्धारमैया के दूसरी बार सत्ता में आने के बाद आयोग के तत्कालीन अध्यक्ष के. जयप्रकाश हेगड़े की अध्यक्षता वाली एक समिति ने उस रिपोर्ट में संशोधन कर बीते साल अप्रैल में सरकार को सौंपा था। लेकिन वह रिपोर्ट शुरू से ही विवादों में घिर गई थी,लेकिन सरकार ने पहले की रिपोर्ट के बावजूद आखिर नए सिरे से इस कवायद का फैसला क्यों किया?
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मुख्यमंत्री सिद्धारमैया की दलील है कि विभिन्न जातियों के साथ होने वाले भेदभाव और असमानता को दूर करना ही ताजा कवायद का प्रमुख मकसद है। राज्य का अगला बजट भी इसी जनगणना रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया जाएगा। उन्होंने बैठक के बाद कहा कि जातियों के साथ होने वाले भेदभाव को दूर करना सर्वेक्षण का मुख्य उद्देश्य है। उन्होंने यह भी कहा कि यह सर्वेक्षण पूरे देश के लिए एक उदाहरण होना चाहिए। अगला बजट इसी सर्वेक्षण के आधार पर बनेगा। 

लेकिन परदे के पीछे की हकीकत कुछ और है। आमतौर पर माना जाता है कि राज्य में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय की आबादी ज्यादा है और राजनीति में भी यह दोनों निर्णायक स्थिति में हैं। लेकिन पहली रिपोर्ट में इन समुदायों की आबादी कम बताई गई थी। इसलिए इन समुदायों के विधायकों मने रिपोर्ट के खिलाफ बगावत कर दी थी। इन दोनों के अलावा ब्राह्मण समुदाय में इस रिपोर्ट से काफी नाराजगी थी। 

इसके लिए पहले राजनीतिक समीकरणों और इसमें दोनों तबकों यानी लिंगायत और वोक्कालिगा की भागीदारी को समझना जरूरी है।  राज्य की 224 सदस्यीय विधानसभा में लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय से इस समय 99 विधायक हैं।  इनमें सत्तारुढ़ पार्टी यानी कांग्रेस के क्रमशः 34 (लिंगायत) और 23 (वोक्कालिगा) यानी 58 विधायक हैं।

विधानसभा में कांग्रेस के कुल 138 विधायक हैं। ऐसे में इन विधायकों उनकी नाराजगी सरकार के लिए भारी पड़ सकती है। पिछली रिपोर्ट में वोक्कालिगा समुदाय राज्य में चौथे नंबर पर आ गया था।  मौजूदा उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार, जिनको मुख्यमंत्री पद का दावेदार माना जाता है, इसी समुदाय के हैं। 

उस रिपोर्ट में कर्नाटक की कुल आबादी में 70 फीसदी अन्य पिछड़ी जातियों के शामिल होने के कारण उनके लिए 51 फीसदी आरक्षण की सिफारिश की गई थी।  इसके अलावा  वोक्कालिगा और लिंगायत समुदायों की आबादी 10 से 11 फीसदी के बीच बताया गया था। इससे दोनों तबकों में नाराजगी भड़क उठी थी। उन्होंने नए सिरे से सर्वेक्षण या जनगणना कराने की मांग उठाई। 

कई नेताओं की दलील थी कि यह आंकड़े 2015 के हैं और जमीनी हकीकत से मेल नहीं खाते। रिपोर्ट से नाराज लिंगायत, वोक्कालिगा और ब्राह्मण समुदाय के नेताओं का आरोप था कि उनकी कई उपजातियों को इस जनगणना में शामिल नहीं किया गया है।  इसके अलावा खासकर शहरों में जनगणना करने वाले घर-घर नहीं पहुंच सके हैं। 

इन समुदायों की नाराजगी के कारण सत्ता संतुलन गड़बड़ाने की वजह से राज्य मंत्रिमंडल ने बीती जून में पिछली रिपोर्ट को खारिज करते हुए नए सिरे से जाति जनगणना कराने का फैसला किया था। उसके बाद मुख्यमंत्री ने कहा था कि कई मंत्रियों और समुदायों ने पिछली जनगणना पर आशंकाएं जताई हैं।  इसलिए नए सिरे से जनगणना का फैसला किया गया है। 

अब विपक्षी भाजपा ने सरकार पर इस जनगणना के जरिए राज्य के विभिन्न समुदायों के बीच मतभेद पैदा करने का आरोप लगाया है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष बी। वाई। विजयेंद्र ने ताजा सिरे से जनगणना के फैसले पर सवाल उठाते हुए आरोप लगाया है कि सरकार चिन्नास्वामी स्टेडियम में हुई भगदड़ से ध्यान बंटाने के लिए ही ऐसा कर रही है। 

राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि सिद्धारमैया के अपने पहले कार्यकाल में जातिगत जनगणना का सरकार का दांव उल्टा पड़ा था। यही वजह थी कि वह रिपोर्ट लंबे समय तक फाइलों में ही दबी रही। दूसरे कार्यकाल में बीते साल अप्रैल में सरकार को रिपोर्ट सौंपे जाने के बावजूद उसे इस साल मंत्रिमंडल के सामने रखा गया।

उसके बाद ही विभिन्न समुदायों की नाराजगी सामने आने लगी।  इससे सत्ता का संतुलन डगमगाने लगा। उसके बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के साथ बैठक में नए सिरे से यह कवायद शुरू करने का फैसला किया गया है। 

विश्लेषकों का मुताबिक, ताजा जनगणना का मकसद दोनों ताकतवर समुदायों की नाराजगी दूर कर राजनीतिक संतुलन साधना है। इससे मुख्यमंत्री की कुर्सी की दौड़ में शामिल उपमुख्यमंत्री डी. के. शिवकुमार की नाराजगी भी कुछ हद तक दूर की जा सकती है, लेकिन इसकी वजह से पिछली जनगणना पर खर्च हुए करीब 165 करोड़ रुपए पानी में बह गए हैं।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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