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कानों देखीः गडकरी पर निगाहें, अकबर पर सियासत

Mon, 15 Oct 2018 10:05 PM IST
Updated Mon, 15 Oct 2018 10:05 PM IST
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Kano Dekhi: Apart from PM narendra Modi and Amit Shah Eyes on Nitin Gadkari in 2019 elections

वैसे तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भाजपा के नेताओं में सबसे ताकतवर हैं। संघ भी उनके साथ खड़ा है। इसके बाद पूरी भाजपा को अमित शाह संचालित कर रहे हैं। लेकिन नितिन गडकरी लगातार अपने वजूद में खड़े हैं। गडकरी परफार्मिंग मिनिस्टर हैं और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी उन्हें माकूल संदेश देने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। हाईवे के उद्घाटन के दौरान भी मोदी ने गडकरी को जो कहना था, वह कह दिया। अभी मराठी टीवी चैनल पर टाक-शो में गडकरी ने जो कहा सूत्र बताते हैं, उस पर भी खिंचाई की।

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बताते हैं गडकरी जब कैबिनेट की बैठक से निकल रहे थे तो प्रधानमंत्री ने कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के कटाक्ष के साथ कुछ सामग्री गडक़री को उपलब्ध कराई। यह उनके टीवी शो से ही संबंधित था। गडकरी ने सफाई भी दी, लेकिन प्रधानमंत्री अपने व्यवहार के अनुरुप आगे बढ़ गए। प्रधानमंत्री के फालोवर इससे भी परेशान है कि 2019 में गडकरी को पीएम बनाए जाने की हवा भी अपनी जगह बनाए है।

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क्यों लें एमजे अकबर का इस्तीफा

डीएमके के ए राजा के इस्तीफे और कनिमोझी के जेल जाने के साथ यूपीए-2 सरकार के दिन लदने लगे थे। प्रधानमंत्री मोदी की सरकार इसे बखूबी समझती है। प्रधानमंत्री इसे भी बखूबी समझते हैं कि जो कानून की गिरफ्त में आता है, वहीं अपराधी भी कहलाता है। फिर एमजे अकबर का इस्तीफा क्यों हो? इस्तीफा ने लेने के मामले में पीएम ने काफी धैर्य से काम लिया है। इससे पहले हर स्तर पर और सतर्क रहकर मुद्दे की हवा निकालने की कोशिश हुई। मसलन भाजपा प्रवक्ता और केंद्रीय मंत्रियों की शांति, पार्टी की महिला नेताओं और मंत्रियों के संभले हुए बयान और अंत में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी का चार सदस्यीय रिटायर्ड जजों के समिति की घोषणा।

अंत में एमजे अकबर की चिट्ठी। यह तब है, जब संघ के नेता चाहते हैं कि एमजे अकबर पर #MeToo अभियान के तहत लगे आरोप पर कार्रवाई होनी चाहिए। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह (अकबर को बचाए रखकर) एक्शन चाहते हैं। सबने मामले को प्रधानमंत्री के ऊपर छोड़ दिया। सबको उम्मीद थी कि रविवार को इस मामले में प्रधानमंत्री कोई निर्णायक नतीजे पर पहुंचेंगे। क्योंकि इसी दिन अकबर को भी विदेश दौरे से लौटना था।

बताते हैं प्रधानमंत्री ने अपनी पूरी खाना पूर्ति कर ली है, लेकिन अभी हवा का रुख देख रहे हैं। वहीं वित्त मंत्री अरुण जेटली ने साफ कर दिया कि इस तरह हर आरोप पर अगर कार्रवाई करते रहे तो फिर बचेगा कौन?

राहुल का चुनौती बम

भाजपा की निगाह कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के चुनौती बम पर टिकी है। इसी को केंद्र में रखकर पार्टी मध्यप्रदेश और राजस्थान में चुनावी बिसात पर मोहरे बिछाने की तैयारी में लग गई है। छत्तीसगढ़ भाजपा को लग रहा है कि वह आसानी से वहां चुनाव जीत जाएगी। मध्यप्रदेश में धर्म और जाति का खेल चलता है।

पार्टी के नेताओं ने वहां बसपा या सपा से गठबंधन न होने पाने पर थोड़ा राहत की सांस ली है। वहीं राजस्थान में वसुंधरा राजे ने अपनी पकड़ को थोड़ा कम किया है। ऐसे में अमित शाह का प्रबंधन हावी हुआ है। इसके सामानांतर पार्टी के नेताओं में मध्यप्रदेश में कांग्रेस के खेमे में सिर फुटौव्वल साफ दिखाई दे रहा है। ज्योतिरादित्य सिंधिया और कमलनाथ गुट तेजी से सक्रियता बढ़ा रहा है। वहीं दिग्विजय सिंह हालात को समझकर दांव चल रहे हैं।

कांग्रेस अध्यक्ष ने यहां से किसी बड़े नेता को चुनाव में न उतारने का मन बना रखा है। राहुल चाहते हैं कि बड़े नेताओं अधिक से अधिक सीटें जितवाने में मदद करें। इसके बरअक्स राजस्थान और छत्तीसगढ़ में यह शर्त नहीं है। कुल मिलाकर कांग्रेस की कोशिश म. प्र., राजस्थान, छत्तीसगढ़ में से दो राज्यों में किला फतेह की है। भाजपा को लग रहा है कि ऐसा हुआ तो 2019 मुश्किल होता जाएगा और न हीं हुआ तो राहुल गांधी के सामने चुनौती बम फटना भी तय है।

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पीएम मोदी- शाह की चौसर

राजनीति की बिसात पर पीएम मोदी-अमित शाह के मोहरे गजब की करामात दिखा रहे हैं। पार्टी उ.प्र. को लेकर अति संवेदनशील है। इसी ताने-बाने में प्रधानमंत्री मोदी सपा के संस्थापक मुलायम सिंह यादव के संसदीय क्षेत्र आजमगढ़ में रैली कर आए थे। समादवादी पार्टी के बागी और वहां से निकाले गए नेता अमर सिंह की तारीफ कर दी। दोनों ही पहल अपना काम कर रही है। अमर सिंह की कोशिश से शिवपाल सिंह यादव भाजपा के करीब आए हैं।

समाजवादी पार्टी का सेक्युलर मोर्चा गठित कर दिया है। उन्हें ससम्मान मायावती द्वारा खाली किया गया आलीशान बंगला आवंटित हो गया है। जल्द अखिलेश यादव के बंगले के आवंटन की भी बारी है। अब शिवपाल और अमर सिंह के सारे पाप धुल गए हैं। उन पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों की हवा भी निकल चुकी है। समाजवादी पार्टी की केंद्रीय राजनीति में बचे तो केवल मुलायम और राम गोपाल। राम गोपाल से भाजपा को कोई खतरा नहीं है। मुलायम सिंह यादव अस्वस्थ हैं।

वैकल्पिक राजनीति का यह खेल अब बड़े बड़े रणनीतिकारों के चिंतन का विषय बन गया है। उधर मायावती ने छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश में कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। हर रोज तीखे बयान दे रही है। तेलंगाना में भी भाजपा अपने झंडे को चमका रही है। इतना ही डूबती नाव सी लग रहे राजस्थान में भी पार्टी के भीतर कोई सिर दिखाने वाला नहीं है।

सिंधिया एक्शन में

अपने पिता माधव राव सिंधिया की तरह तो नहीं, लेकिन कुछ मायनों में उनसे कम भी नहीं। नई ज्योति जगाने की तैयारी में हैं। उन्हें लग रहा है कि मध्यप्रदेश में राजनीतिक गठजोड़ हो सकता है। उनके राजनीति के इस जज्बे का स्वागत। बताते हैं कि अभी प्रत्याशी घोषित होने में थोड़ा समय बचा है। बसपा और सपा के पास अपना मध्यप्रदेश की सीटों को लेकर गुणा-गणित है। क्यों न आखिरी कोशिश कर ली जाए।

बताते हैं सिंधिया ने इसके लिए पसीना बहाना शुरू कर दिया है। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी को इसमें कुछ भी बुरा नहीं लग रहा है। यदि बात बन गई तो बल्ले-बल्ले। न बनी तो कांग्रेस के सूरमा हैं ही। देखिए आगे होता है क्या? बताते हैं बसपा भी समझ रही है। यदि कांग्रेस के साथ मिलकर चुनाव लड़ी तो दर्जन भर या इससे अधिक सीटें आ सकती हैं। यदि अकेले लड़ेगी तो 2-4 सीट से संतोष करना पड़ेगा। समाजवादी पार्टी की स्थिति तो अभी और ढुलमुल है। यही सिंधिया की ताकत है और होने वाले सहयोगियों की कमजोरी है।

बसपा के पास बस जनबल

बसपा के पास एकमुश्त जनबल के सिवा बचा क्या है? यह बात  बसपा के रणनीतिकारों को परेशान कर रही है। वैसे भी बसपा में गांधी आजाद सरीखे पुराने नेता रह नहीं गए। कांशीराम की पीढ़ी वाले नेता अब बचे खुचे ही हैं। जो हैं भी वह बसपा प्रमुख मायावती की या तो दया पर है या फिर पार्टी में अपनी इज्जत बचाकर पड़े हैं। लेकिन बसपा के मूवमेंट का ख्याल आते ही उनके माथे पर चिंता की लकीरें दौड़ जाती हैं। सुधीर गोयल से लेकर सब परेशान हैं।

एक पुराने नेता का कहना है कि बसपा के पास उ.प्र. 19-21 प्रतिशत ठोस जनबल है, लेकिन सत्ता में हिस्सेदारी.....? मध्यप्रदेश में चार सीट और बाकी बस गिनने के लिए। लोकसभा में एक भी प्रत्याशी नहीं। राज्यसभा में हर बार सिमट रहे हैं। हालत यह कि पूरे देश के बसपा के कार्यालय का खर्च, बिजली, पानी का बिल सबका संकट खड़ा हो रहा है। जबकि 90 के दशक से बाद सबसे तेजी से विकास करने वाला दल बसपा ही रही। अब तो दलितों को मिले अधिकार पर भी चोट होने लगी है। न बुहजन रह पा रहा है और न सर्वजन बन पा रहा है, लेकिन सबकी परेशानी यही है कि इसका साझा मायावती से कौन करे।

कर्नाटक में नाटक 

बात कर्नाटक की। वहां फिर सब ठीक नहीं चल रहा है। पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा फार्म में हैं। बसपा के कोटे के मंत्री ने राज्यमंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया है। एचडी कुमारस्वामी के बारे में आम है कि उनकी निगाह अपने लक्ष्य पर टिकी रहती है। इसके लिए वह दिन में भी सपने देख लेते हैं। कांग्रेस के नेता सिद्धारमैया अलग तान में रहते हैं।

कुछ कांग्रेस के नेता भी गठबंधन सरकार में असहज महसूस कर रहे हैं। वहीं भाजपा के रणनीतिकार चाहते हैं कि अपने कर्मों से किसी तरह एचडी कुमारस्वामी सरकार फरवरी 2019 तक गिर जाए। बताते हैं भाजपा केंद्रीय नेतृत्व को भी यही सूट कर रहा है। वहीं, कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी कर्नाटक को लेकर पूरी तरह संवेदनशील बने हुए हैं। देखिए आगे होता क्या है?

भाजपा के बुजुर्ग और 2019

डा. मुरली मनोहर जोशी में युवा सांसद से भी अधिक जोश है। भौतिकी, भाषा, संस्कृत, धर्म, दर्शन के विद्वान डा. जोशी संघ में अच्छी पकड़ रखते हैं। वह 2019 में लोकसभा चुनाव लड़ना चाहते हैं। वहीं विदेश मंत्री सुषमा स्वराज ने किडनी ट्रांसप्लांट कराने के बाद अपनी सक्रियता को सीमित कर लिया है। जोशी के अलावा मार्गदर्शक मंडल के दूसरे सदस्य लाल कृष्ण आडवाणी जी उम्रदराज होते जा रहे हैं। उनकी स्थिति राजनीति से संन्यास लेने की आ गई है।

कुल मिलाकर भाजपा में ऐसे बड़े नेताओं की संख्या बढ़ रही है, जो लोकसभा चुनाव लड़ने की बजाय राज्यसभा का रास्ता चाहते हैं। उत्तराखंड के भगत सिंह कोश्यारी से लेकर मेजर जनरल (रिटा.) खंडूरी तक की यही स्थिति है। जबकि 2019 का जिस तरह से आभामंडल बनता दिखाई दे रहा है, उसमें प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष शाह को ऐसे तमाम चेहरों के छाया की जरूरत पड़ सकती है।

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