राजनीति में कार्यकर्त्ता के नेता बनने की रस्म तो है पर नेता के कार्यकर्त्ता बनने का कोई रिवाज नहीं
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राजनीति में न स्थाई दोस्त होता है और न ही स्थाई दुश्मन, स्थाई होता है केवल स्वार्थ। कल तक जो दूसरे दल की आलोचना कर रहा था, अचानक उसका उसी दल के लिए प्रशंसागान करना अब जनता को अचंभित नहीं करता क्योंकि जनता इस तरह के घटनाक्रम को देखने की अभ्यस्त हो चुकी है।
मध्यप्रदेश के राजनीतिक संकट के कर्णधार कमलनाथ, दिग्विजय, सिंधिया या भाजपा नहीं बल्कि हमारी राजनीतिक संस्कृति है। भारत की राजनीतिक संस्कृति में स्पष्ट रूप से दिखता है कि दलों के लिए सत्ता और नेताओं के लिए राजनीतिक या संवैधानिक पद की प्राप्ति करना ही अंतिम लक्ष्य होता है। सुब्रमण्यम स्वामी ने अटल बिहारी वाजपेयी और कपिल मिश्रा ने नरेंद्र मोदी के चरित्र पर क्या कुछ नहीं कहा, लेकिन आज वे दोनों भारतीय जनता पार्टी में है।
नवजोत सिंह सिद्धू पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने राष्ट्रीय टेलीविजन पर राहुल गांधी के लिए पप्पू शब्द का इस्तेमाल किया और आज वह भी कांग्रेस में है। लालू यादव को चारा घोटाले में जेल भिजवाने में शिवानंद तिवारी की भूमिका किसी से छिपी नहीं, लेकिन आज वह राजद में हैं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हमारे आसपास मौजूद है।
यदि दलों की स्थिति देखी जाए तो वह इससे भी फूहड़ दिखती है। जैसे सपा-बसपा, जद (यू)-राजद, कांग्रेस-वामपंथी दल, भाजपा-पीडीपी, कांग्रेस-शिवसेना न जाने कितने बेमेल गठजोड़ बने और बिगड़े, लेकिन ऐसी स्थितियों के निर्माण का आधार ही सत्ता प्राप्ति रहा।
ज्योतिरादित्य सिंधिया कल तक भाजपा की नीतियों और नीयत पर सवाल खड़ा करते-करते कब भाजपा के साथ खड़े हो गए यह जनता को पता ही नहीं चला। जिस जनता की दुहाई देकर सिंधिया भाजपा में गए हैं, उस जनता को प्रेस कॉन्फ्रेंस से खबर हुई कि सिंधिया उनलोगों के लिए ऐसा कर रहे हैं। दरअसल, सिंधिया जनता जनार्दन के लिए नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक प्रासंगिकता बचाने के लिए कहीं से निकलकर कहीं पहुंच चुके हैं।
राजनीतिक प्रासंगिकता आपके राजनीतिक हस्तक्षेप से तय होती है और यह हस्तक्षेप करने की शक्ति आपको राजनीतिक पद से आती है। इस तरह दलों में आने और जाने वाले लोगों को भारतीय राजनीति गतिशील मानती है और एक जगह टिके रह जाने को जड़ मानती है। दरअसल, हमारी राजनीतिक संस्कृति में कार्यकर्ता के नेता बनने की रस्म तो है लेकिन नेता के कार्यकर्ता बन जाने का कोई रिवाज नहीं।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।