विश्व सिनेमा की जादुई दुनिया: जहां कल्पनाएं उड़ान भरती हैं और दृश्य साकार होते हैं..!
दुनिया में सिनेमा की यात्रा थोड़ी अलग रंगत और किस्सों से भरी पड़ी है। यदि बात विश्व सिनेमा की की जाए तो फिर फिल्मी दुनिया का आसमान फैलने लगता है। एक ओर यूरोप है, जो यूरोप विभिन्न देशों का पुंज है और हर देश का सिनेमा अलग होता है। यहां तक कि एक देश में भी कई तरह का सिनेमा बनता है। यूरोपियन सिनेमा में भी ब्रिटेन का सिनेमा फ़्रांस के सिनेमा से बिल्कुल अलग है, फ़्रांस का सिनेमा जर्मन सिनेमा जैसा नहीं है, इटली से आने वाला सिनेमा फ़्रांस और ब्रिटेन सिनेमा या जर्मन सिनेमा से बहुत अलग होता है..!
दुनिया में सिनेमा की यात्रा थोड़ी अलग रंगत और किस्सों से भरी पड़ी है। यदि बात विश्व सिनेमा की की जाए तो फिर फिल्मी दुनिया का आसमान फैलने लगता है। एक ओर यूरोप है, जो यूरोप विभिन्न देशों का पुंज है और हर देश का सिनेमा अलग होता है। यहां तक कि एक देश में भी कई तरह का सिनेमा बनता है। यूरोपियन सिनेमा में भी ब्रिटेन का सिनेमा फ़्रांस के सिनेमा से बिल्कुल अलग है, फ़्रांस का सिनेमा जर्मन सिनेमा जैसा नहीं है, इटली से आने वाला सिनेमा फ़्रांस और ब्रिटेन सिनेमा या जर्मन सिनेमा से बहुत अलग होता है..!
विस्तार
आज सिनेमा बनाना, प्रसारित करना और देखना कितना आसान है। घर बैठे दुनिया के किसी भी देश, किसी भी भाषा की फ़िल्म देखी जा सकती है। अलादीन का चिराग घिसने पर उससे निकला जिन्न कभी इतनी सारी चीजें नहीं दिखा सकता था, जितना आज के सिनेमा के लिए करना संभव है, लेकिन सदा से ऐसा नहीं था। शुरुआती दौर में सिनेमा बनाना, उसे दर्शकों तक ले जाना एक कठिन प्रक्रिया थी। रोचक होगा यदि हम सिनेमा की बात उसके प्रारंभ से प्रारंभ करें।
सिनेमा की यात्रा और आकार लेती एक दुनिया
अगर प्रश्न किया जाए कि सिनेमा का आविष्कार किसने किया? कुछ लोग चट से उत्तर देंगे लुमियर भाइयों ने। परंतु यह उत्तर पूरी तरह सही नहीं है। इन भाइयों ने जिसका सिनेमा का 28 दिसम्बर 1895 को पेरिस के गैंड कैफ़े के तलघर में प्रदर्शन किया था उसे पूरी तरह से सिनेमा की संज्ञा नहीं दी जा सकती है। असल में किसी एक व्यक्ति (भले ही वे दो भाई हों) ने सिनेमा के आविष्कार नहीं किया है।
लुमियर भाइयों से पहले 1891 में एडीसन की कम्पनी एक तरह का ‘काइनेटोस्कोप’ का सफ़ल प्रदर्शन कर चुकी थी, जिसके द्वारा एक बार में एक व्यक्ति चलती-फ़िरती तस्वीरों को देख सकता था। मगर एडीसन भी इसके जनक नहीं थे। थॉमस अर्मैट ने अपना आविष्कार एडीसन कम्पनी को बेच दिया था। हां, एडीसन दावा कर सकते थे क्योंकि अर्मैट ने उन्हें इस दावे का अधिकार सौंप दिया था।
मोटे तौर पर सिनेमा का अर्थ है, चलती-फ़िरती तस्वीरें। चित्रों की एक श्रृंखला तथा उन्हें तेज गति के साथ देखा जाना। तस्वीरों के चलने-फ़िरने के कारण ही इंग्लिश में इसे ‘मूवी’ कहा गया।
लुमियर भाइयों की तरह एक और जोड़ा भाई कुछ महीने पहले से यह कार्य कर रहे थे। लैथम भाई (ग्रे लैथम तथा ऑटवे लैथम) उसी साल यानी 1895 मई 20 को न्यूयॉर्क में ऐसा ही कुछ कर रहे थे। वे अपने आइडलोस्कोप प्रोजेक्टर से दर्शकों से पैसा लेकर उन्हें बॉक्सिंग दिखा रहे थे। अक्सर लुमियर भाइयों – अगस्ट तथा लुई लुमियर – को सिनेमा का जनक कहा जाता है, क्योंकि उनके काइनेटोस्कोप प्रदर्शन की उपलब्धि काइनेटोग्राफ़ से अधिक संतोषजनक थी।
दरअसल, ये अपने कैमरा-प्रोजेक्टर को सिनेमाटोग्राफ़ कहते थे। इनका सिनेमाटोग्राफ़ एडीसन के काइनेटोग्राफ़ की तुलना में अधिक सुगठित था, यह इलैक्ट्रिक पावर पर निर्भर नहीं था और उन दिनों बहुत कम स्थानों पर बिजली थी।
इसे फ़िल्म शूट करने और फ़िल्म दिखाने के लिए कहीं भी आसानी से ले जाया जा सकता था। मात्र लाइमलाइट यानी कैलसियम लाइट अथवा मैजिक लालटेन (लैंपहाउस) की आवश्यकता होती थी। इन लोगों ने 13 फ़रवरी 1895 को अपने सिनेमाटोग्राफ़ को पेटेंट करा लिया। दिसम्बर में उन्होंने अपना पहला पब्लिक प्रदर्शन किया।
उस समय सिनेमा का अर्थ था, पैसे लेकर दर्शकों के समक्ष फ़ोटोग्राफ़िक चित्रों का चलते-फ़िरते रूप में प्रक्षेपण करना। अगले साल 1894 में यह व्यावसायिक रूप से सफ़ल था। दुनिया में दर्शकों के लिए पार्लर खुल गए थे। भारत भी इस व्यवसाय में कूद चुका था। लुमियर भाई फ़्रांस में पहले दिन सिनेमा दिखा रहे थे उसके बाद जल्द ही सिने-समीक्षा प्रारंभ हो गई।
इधर, शुरू के दिनों फ़्रांस में 15 मिनट में दस फ़िल्में दिखाई जाती थीं और 10 सुबह शुरु करके अगले दिन सुबह 1.30 तक इंटरवल के साथ बीस शो होते थे और टिकट का दाम था, एक फ़्रैंक। दर्शक लाइन लगा कर टिकट लेते थे। ऑनलाइन टिकट की सुविधा अभी कुछ साल पहले शुरु हुई है।
फ्रांस से शुरू हुई एक यात्रा
मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि फ़्रांस में सिनेमा का जन्म हुआ और लुमियर भाइयों ने इसे जन्म दिया। उन्होंने फ़ैक्टरी से निकलते मजदूरों को फ़िल्माया और इसे 22 मार्च 1895 को पेरिस में लोगों को दिखाया। उन्हें सिनेमा का जनक कहने का यह भी एक मजबूत कारण है। बाद में उन्होंने एक मिनट लंबी कई और फ़िल्में बनाईं।
एक फ़िल्म में अगस्ट लुमियर और उसकी पत्नी अपने बच्चे को खाना खिला रहे हैं, एक अन्य में माली बागीचे में पाइप से पानी पटा रहा है, तभी एक बच्चा पाइप दबा देता है और माली पूरी तरह भींग जाता है, वह दौड़ कर बच्चे को पकड़ता है और चपत लगाता है। इसे हम प्रथम कॉमेडी फ़िल्म कह सकते हैं। सिनेमा अन्य कलाओं से भिन्न है। अधिकाँश अन्य कलाएँ द्विआयामी होती हैं, मगर सिनेमा हमें त्रिआयामी आभास देता है।
जल्द बहुत सारे देश सिनेमा बनाने और दिखाने लगे। आज जिसे हम विश्व सिनेमा कहते हैं वह असल में किसी एक तरह का सिनेमा नहीं है। यहां तक कि जिन्हें हम यूरोपियन सिनेमा, अमेरिकन सिनेमा, एशियाई सिनेमा, अफ़्रीकन सिनेमा, ऑस्ट्रेलियन सिनेमा. लातीनी सिनेमा कहते हैं, इनमें से प्रत्येक के भीतर तमाम तरह की भिन्नता है। जैसे जब हम यूरोपियन सिनेमा कहते हैं तो यह किसी एक प्रकार का या एक तरह की विशेषता लिए हुए सिनेमा नहीं है।
यूरोप विभिन्न देशों का पुंज है और हर देश का सिनेमा अलग होता है। यहां तक कि एक देश में भी कई तरह का सिनेमा बनता है। यूरोपियन सिनेमा में भी ब्रिटेन का सिनेमा फ़्रांस के सिनेमा से बिल्कुल अलग है, फ़्रांस का सिनेमा जर्मन सिनेमा जैसा नहीं है, इटली से आने वाला सिनेमा फ़्रांस और ब्रिटेन सिनेमा या जर्मन सिनेमा से बहुत अलग होता है। जर्मनी में तरह-तरह का सिनेमा बनता है। स्पेनश और रोमानिया यूरोप में हैं मगर इनका सिनेमा बिल्कुल भिन्न है। और पुर्तगाली सिनेमा। देखेंगे तो अंतर पता चलेगा।
भले ही अमेरिकन सिनेमा को ‘फ़र्स्ट सिनेमा’ या ‘फ़र्स्ट वल्ड सिनेमा’ कहा जाता है पर अमेरिकन सिनेमा कई प्रकार का है। एकमात्र हॉलीवुड अमेरिकन सिनेमा नहीं है अमेरिका में हॉलीवुड के अलावा इंडिपेंडेंट सिनेमा बनता है, स्टूडियो सिस्टम है, अब वहाँ एक नई लहर ‘न्यू वेव’ के नाम से आई है। इसी तरह जिसे ‘थर्ड सिनेमा’ या ‘थर्ड वल्ड सिनेमा’ कहते हैं उसमें भारत, जापान, चीन, श्रीलंका, इरान, अफ़गानिस्तान, पाकिस्तान और कई अन्य देश आते हैं और इनमें से प्रत्येक देश के सिनेमा की अपनी खासियत है।
जाहिर है इसमें भारत को ही ले लें। खासकर भारत के बाहर के लोग समझते हैं कि मुंबई या बॉलीवुड सिनेमा ही भारतीय सिनेमा है। हम जानते हैं पंजाब का सिनेमा मराठी सिनेमा से कोई साम्य नहीं रखता है और मराठी सिनेमा तमिल या तेलगू सिनेमा नहीं है। मणिपुरी सिनेमा और असमी सिनेमा एक-दूसरे से बहुत भिन्न है जबकि अक्सर उन्हें नॉर्थ-ईस्ट के खाते में एक साथ डाल दिया जाता है।
शुरुआती सिनेमा कई मंजिलें पार कर चुका है, मूक फ़िल्म सवाक हुई और तकनीकि के विकास के साथ इसके तकनीकि पक्ष में अनेकानेक परिवर्तन हुए हैं। इस विकास से, भिन्न देशों में सिनेमा किन स्थितियों से गुजर कर आज कहां पहुँचा है, यही सब हम आगे देखने वाले हैं।
विश्व सिनेमा की सैर जारी रहेगी-अगली कड़ी-क्रमश:
डॉ. विजय शर्मा, PHD समालोचक, सिनेमा विशेषज्ञ और विश्व सिनेमा की गहरी अध्येता हैं. विश्व सिनेमा/साहित्य और अनुवाद को केंद्र में रखकर उन्होंने तकरीबन 26 पुस्तकें लिखी हैं. पिछले 11 वर्षों से वे साहित्य, सिनेमा की कला संस्था ‘सृजन संवाद’ का संचालन कर रही हैं. वे 5वें चलचित्रम् नेशनल फ़िल्म फ़ेस्टिवल जूरी और न्यूयॉर्क इंडियन फिल्म फेस्टिवल की जूरी में शामिल रही हैं.
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