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पलायन का परिणाम भी है जोशीमठ आपदा

Thu, 19 Jan 2023 01:52 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Thu, 19 Jan 2023 01:52 PM IST
सार

चमोली के जिला मुख्यालय गोपेश्वर के हल्दापानी क्षेत्र में भू-धंसाव के कारण कम से कम 15 मकानों में अब तक दरारें आ चुकी हैं। ऐसी ही सूचना ब्लॉक मुख्यालय पोखरी और गैरसैंण से भी है। इसी तरह टिहरी गढ़वाल के नरेन्द्र नगर तहसील क्षेत्र के अटाली गांव भू-धंसाव की चपेट में है।

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राज्य सरकार ने स्वयं 465 गावों को पहले ही संवेदनशील घोषित किया है - फोटो : जयसिंह रावत

विस्तार

हिमालयी राज्य उत्तराखण्ड में पलायन की समस्या अब जोशीमठ की जैसी आपदा के रूप में सामने आने लगी है। पलायन के कारण हो रहे जनसंख्या असंतुलन और दबाव के चलते मसूरी और नैनीताल सहित लगभग सभी पहाड़ी नगरों की बहनीय क्षमता या तो समाप्त हो चुकी है या समाप्त होने जा रही है। इन बोझिल नगरों पर भारी मानवीय दबाव का असर दरारों और जमीन के धंसने के रूप में सामने आने रहा है। जोशीमठ के अलावा कम से कम आधा दर्जन छोटे बड़े नगरों में जमीन पर दरारें आ गई हैं।

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इनमें कुछ सड़क, रेल और बिजली परियोजनाओं से तो कुछ अपने ही बोझ से धंस रहे हैं। राज्य सरकार ने स्वयं 465 गावों को पहले ही संवेदनशील घोषित किया है, जबकि परियोजनाओं के कारण कई अन्य रिहायशी इलाके संवेदनशील घोषित हो गए हैं। अंग्रेजों द्वारा 1840 के दशक में बसाए गए भारत के मशहूर पर्यटन नगर नैनीताल में 1880 तक तीन भूस्खलन आ चुके थे। 1880 के भूस्खलन में तो वहां 151 लोग मारे गए थे जबकि उस समय वहां की जनसंख्या मात्र 6,576 थी, जबकि 2011 में वहां की जनसंख्या 41,377 हो चुकी थी।

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सेकड़ों गांव-दर्जनों नगर खतरे में

धार्मिक और सामरिक दृष्टि से देश के महत्वपूर्ण नगर जोशीमठ के साथ ही इस समय उसी चारधाम मार्ग पर अलकनन्दा और पिण्डर नदियों के संगम पर स्थित कर्णप्रयाग नगर भी धंस रहा है। उत्तराखण्ड के पंच प्रयोगों में से एक यह नगर महाभारत के महायोद्धा दानवीर कर्ण के नाम से बसा हुआ है और यहीं पर कर्ण का मंदिर भी है। लोक मान्यता है कि इसी संगम पर श्रीकृष्ण ने स्वयं कर्ण का अंतिम संस्कार किया था। इस नगर की बहुगुणा कालोनी में कम से कम 50 मकानों पर दरारें आ चुकी हैं।

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चमोली के जिला मुख्यालय गोपेश्वर के हल्दापानी क्षेत्र में भू-धंसाव के कारण कम से कम 15 मकानों में अब तक दरारें आ चुकी हैं। ऐसी ही सूचना ब्लॉक मुख्यालय पोखरी और गैरसैंण से भी है। इसी तरह टिहरी गढ़वाल के नरेन्द्र नगर तहसील क्षेत्र के अटाली गांव भू-धंसाव की चपेट में है। इसी जिले के गुलर, व्यासी, कोड़ियाला, और मलेथा गावों के मकानों पर भी दरारें आ गई है। श्रीनगर गढ़वाल की हाइडेल कालोनी, आशीष विहार और नर्सरी रोड पर मकानों में दरारें आ रही है।

उत्तरकाशी का गंगोत्री मार्ग स्थित भटवाड़ी कस्बा कुछ सालों से धंस रहा है। मस्तड़ी सहित कुल 26 गांव भूस्खलन के खतरे की जद में पाए गए हैं। उत्तरकाशी का नौगांव नगर भू-धंसाव की चपेट में है। बागेश्वर के खरबगड़ और कपकोट के मकानों पर भी दरारें देखी जा रही हैं। पिण्डर घाटी में देवाल ब्लॉक का अंतिम गावं झलिया और बागेश्वर जिले का क्वांरी गांव कभी भी जमींदोज हो सकते हैं। रुद्रप्रयाग के मरोड़ा गांव में कुछ मकान गिर भी चुके हैं। पिथौरागढ़ जिले की दारमा घाटी का सीमान्त गांव दार भी गंभीर खतरे में है। मुन्स्यारी और धारचुला तहसीलों के लगभग 200 गांव संवेदनशील बताए जा रहे हैं। चमोली के सारी गांव में भू-धंसाव के कारण दो भवन गिर चुके हैं। इस प्रकार राज्य सरकार 465 गावों को पहले ही संवेदनशील घोषित कर चुकी है।  

तेजी से बढ़ते शहरीकरण के बोझ से दब रहे शहर

सन् 2011 की जनगणना में राज्य की नगरीय आबादी 30 प्रतिशत पार कर चुकी थी। इस पहाड़ी राज्य के लोग पहले आजीविका के लिए दिल्ली, मुम्बई और चण्डीगढ़ जैसे महानगरों में जाते थे। लेकिन नवम्बर 2000 में नए राज्य के गठन के बाद अधिकतर पलायन राज्य के अन्दर के नगरों में हो रहा है। लोग गांव छोड़ कर शिक्षा, रोजगार, स्वास्थ्य आदि बेहतर सुविधाओं के लिए ब्लॉक, तहसील और जिला और राज्य मुख्यालय की ओर आकर्षित हो रहे हैं।

राज्य पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के अन्य क्षेत्रों की तरह उत्तराखण्ड में बहुत तेजी से शहरीकरण हो रहा है। देश में 2011 में शहरीकरण की दर 31.1 थी जो कि उत्तराखण्ड में 30.2 प्रतिशत दर्ज हुई थी। लेकिन पहाड़ी राज्य उत्तराखण्ड में शहरीकरण की यह दर भी अत्यधिक है। क्योंकि विशिष्ट भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां शहरों के विस्तार की गुंजाइश बहुत सीमित है। इसलिए यहां बहुत सीमित स्थानों पर ही जनसंख्या का भारी दबाव बढ़़ रहा है। पहाड़ी ढलानों पर बसे इन नगरों का दबाव वहां की अस्थिर जमीन सहन नहीं कर पा रही है। शहरीकरण की वार्षिक वृद्धि दर भी 2011 में 4 प्रतिशत तक पहुंच गई थी।

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अनुमान लगाया जा सकता है कि बिना मास्टर प्लान के ये पहाड़ी नगर किस प्रकार अपने ही बोझ तले दबे जा रहे हैं। - फोटो : जयसिंह रावत

71 प्रतिशत प्रवासी गांव छोड़ नजदीकी नगरों में आ बसे

राज्य पलायन आयोग की रिपोर्ट के अनुसार उत्तराखण्ड में अब तक 28.72 प्रतिशत प्रवासियों ने राज्य से बाहर, 35.69 प्रतिशत ने एक जिले से दूसरे जिले में, 15.46 प्रतिशत ने जिला मुख्यालय में और 19.46 प्रतिशत ने नजदीक के कस्बों में पलायन किया है। इस तरह देखा जाए तो 71.28 लोगों ने राज्य के अन्दर ही पलायन किया है।

इनमें से कुछ ने राजधानी देहरादून में किया तो 34.92 प्रतिशत लोगों ने एक ही जिले में या तो जिला मुख्यालय या फिर ब्लॉक और तहसील मुख्यालय या फिर व्यवसाय के लिए अनुकूल यात्रा मार्ग पर बसे श्रीनगर-कर्णप्रयाग और जोशीमठ जैसे नगरों में पलायन किया। नैनीताल और उत्तरकाशी जिले के लगभग 40-40 प्रतिशत लोगों ने गांव छोड़ कर नजदीकी कस्बों या नगरों में नया ठिकाना बनाया।

इसी प्रकार चमोली में 19.72, रुद्रप्रयाग में 19.34, पौड़ी 19.61 और टिहरी जिले में 17.73 प्रतिशत लोगों ने गांव छोड़ कर नजदीकी कस्बों में घर बनाए। पिथौरागढ़ जैसे सीमान्त जिले में 33.07 प्रतिशत और  बागेश्वर में 22 प्रतिशत लोग गांव छोड़ कर जिला मुख्यालय में बस गए। राज्य में कोई ऐसा जिला नहीं है जहां लोग गांव छोड़ कर नजदीकी जिला या ब्लॉक मुख्यालय में आ कर न बसे हों। पलायन की इस प्रवृत्ति के चलते लगभग सभी पहाड़ी नगरों की कैरीइंग कैपेसिटी समाप्त हो चुकी है। जिस कारण प्रदेश की लाखों की आबादी खतरे की जद में है।

जोशीमठ की तरह ज्यादातर गांव भूस्खलनों पर बसे हैं

जोशीमठ की ही तरह उत्तराखण्ड के अधिकांश गांव और नगर पुराने भूस्खलनों पर बसे हुए हैं। कालान्तर में ऊपर पहाड़ियो से खिसक कर आए भूस्खलनों ने पहाड़ी ढालों को समतल भी बनाया और ऊपर से ये उपजाऊ मिट्टी भी लाए जिससे इन भूस्खलनों पर पहले सम्पन्न गांव और बाद में इनमें से ही कई विख्यात नगर भी उग आए। लेकिन उन स्थानों की वहनीय क्षमता देखे परखे बिना जनसंख्या का दबाव बढ़ता गया और ये नगर जोशीमठ की तरह अपने ही बोझ तले दबते ही चले गए। 

बढ़ती आबादी ने समाप्त कर दी नगरों की धारण क्षमता

आदि गुरू शंकराचार्य ने सदियों पहले जब जोशीमठ में भारत की चैथी सर्वोच्च पीठ ज्योतिपीठ स्थापित की थी उस समय वहां अधिकतम् सौ दो सौ की आबादी रही होगी। सन् 1901 में जोशीमठ की जनसंख्या कुल 650 के आसपास थी। सन् 60 के दशक में बदरीनाथ तक मोटर रोड बनी तो चारधाम यात्रा और पर्यटन आदि से रोजगार संभावनाएं बढ़ने से 1971 में वहां की जनसंख्या बढ़ कर 5,852 वर्ष 1981 में 8,616, वर्ष 1991 में 11488 और 2001 में 13204 हो गई।

इस नगर की 1981 से लेकर 1991 तक दशकीय जनसंख्या वृद्धि दर 37 प्रतिशत और 2001 तक 37.7 प्रतिशत हो गई। इस नगर की जनसंख्या 2011 में 16709 थी।  मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी द्वारा गृहमंत्री अमित शाह को दिए गए आंकड़ों के अनुसार वहां की आबादी अब 25 हजार तक पहुंच गई है। वहां केवल नगरपालिका क्षेत्र में 2011 में 3,898 मकान पंजीकृत थे जो कि आज 4,500 तक पहुंच गए। इनमें सेना और आइटीबीपी के विशाल भवन शामिल नहीं हैं। गए।

अब अनुमान लगाया जा सकता है कि बिना मास्टर प्लान के ये पहाड़ी नगर किस प्रकार अपने ही बोझ तले दबे जा रहे हैं। यही कहानी नैनीताल, मसूरी, गोपेश्वर, उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग, बागेश्वर, चम्पावत और पिथौरागढ़ नगरों की भी है। राज्य सरकार जोशमठ आपदा के बाद अब कुल 65 नगरों की कैरीइंग कपैसिटी का आंकलन कराने के बाद इनका मास्टर प्लान बनाने की सोच रही है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं।

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