Joe Biden Inauguration: जो बाइडन को बड़ी खतरनाक दुनिया सौंप गए हैं ट्रंप
अमेरिका के निवर्तमान राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने अपने विदाई भाषण में इस बात का संकेत दे दिया कि वे अपने उत्तराधिकारी जो बाइडन के लिए कैसी चुनौतियां छोड़ कर जा रहे हैं। उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में कहा- ‘कोई राष्ट्र अगर अपने उसूलों, इतिहास और नायकों में भरोसा खो दे, तो वह फल-फूल नहीं सकता।’ यहां अनेक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप वैसा ही अमेरिका छोड़कर गए हैं, जिसने खुद में भरोसा खो दिया है।
ट्रंप के कार्यकाल में इस भरोसे में सेंध लगती रही, जो पिछले छह जनवरी को अपने चरम पर पहुंच गई, जब ट्रंप समर्थक उग्रवादियों ने कैपिटॉल हिल (संसद भवन) पर धावा बोल दिया। इससे जाहिर हुआ कि ट्रंप के दौर में अमेरिकी समाज न सिर्फ बंट गया, बल्कि यहां राजनीतिक हिंसा का खतरा भी सिर उठा चुका है। चार साल पहले ऐसे हालात के बारे में कल्पना करना भी मुश्किल था।
खुद अमेरिकी मीडिया में छपे विश्लेषणों में कहा गया है कि ट्रंप अपने उत्तराधिकारी को चार साल पहले की तुलना में अधिक खतरनाक दुनिया सौंप कर गए हैं। ट्रंप की जिन नीतियों के कारण सबसे अधिक खतरा बढ़ा है, उनमें उनकी परमाणु हथियार नीति सबसे ऊपर है। ट्रंप ने 2018 में ईरान परमाणु डील से अमेरिका को हटा लिया, जिसे पूरा करना बराक ओबामा प्रशासन की एक बड़ी उपलब्धि के रूप में देखा गया था। इस समझौते के तहत ईरान ने यूरेनियम संवर्धन को सीमित करने का वादा किया था। लेकिन अमेरिका के समझौते से हटने के बाद उसने फिर से संवर्धन शुरू कर दिया। आज उसके बाद 2.4 टन संवर्धित यूरेनियम है, जो कि परमाणु डील में तय सीमा से 12 गुना ज्यादा है।
परमाणु समझौते से हट कर ट्रंप ने ईरान पर ‘अधिकतम दबाव’ डालने की नीति अपनाई। लेकिन इससे ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उलटे ईरान के आम लोगों की मुसीबत बढ़ी और अमेरिका दुनिया में आलोचना का पात्र बना। अब रणनीतिक जानकारों का मानना है कि फिर से उस डील के प्रावधानों को लागू करवा पाना जो बाइडन प्रशासन के लिए डेढ़ी खीर साबित होगा। थिंक टैंक इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के पश्चिम एशिया प्रोग्राम के निदेशक जूस्ट हिल्टरमान ने टीवी चैनल सीएनएन से कहा- ट्रंप की ईरान नीति से पश्चिम एशिया में हिंसा बढ़ी है।
ट्रंप प्रशासन ने पिछले नवंबर में ओपन स्काई संधि से भी अमेरिका को निकाल लिया...
परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के लिहाज से ट्रंप की नीति सिर्फ ईरान मामले में ही फेल नहीं रही। बल्कि ऐसा ही उत्तर कोरिया के मामले में हुआ। हाल में अपनी पार्टी के महाधिवेशन में उत्तर कोरिया के नेता किम जोंग उन ने उन परमाणु हथियारों और मिसाइलों की लिस्ट गिनाई, जिन्हें उनका देश तैयार कर रहा है। जबकि इन्हीं हथियारों पर नियंत्रण के लिए ट्रंप ने अमेरिकी की लंबे समय से चली आ रही नीति को छोड़ कर किम से मुलाकात की थी। इसे उत्तर कोरिया की कूटनीतिक जीत माना गया, क्योंकि इसके पहले सभी अमेरिकी राष्ट्रपति उत्तर कोरियाई नेता से मिलने से इनकार करते रहे थे।
ट्रंप से मुलाकात के दौरान किम मिसाइल परीक्षण रोकने पर सहमत हुए थे। लेकिन आगे चल कर जब वार्ता टूट गई, तो उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु हथियारों के भंडार को बढ़ाना शुरू कर दिया। परमाणु हथियारों पर नजर रखने वाली संस्था स्टॉकहोम पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (सिपरी) के मुताबिक उत्तर कोरिया के पास 2016 में 10 परमाणु हथियार थे। आज इनकी संख्या 30 से 40 के बीच है। जानकारों का मानना है कि ट्रंप की नीतियों की कारण आज अमेरिका के दो सहयोगी देशों- दक्षिण कोरिया और जापान के लिए उत्तर कोरियाई से खतरा काफी बढ़ चुका है।
ट्रंप ने रूस के साथ मौजूद परमाणु हथियार नियंत्रण संधियों को भी बेअसर कर दिया है। शीत युद्ध के दिनों में हुई ये संधियां अभी हाल तक लागू थीं। लेकिन ट्रंप प्रशासन ने इंटरमीडिएट रेंज न्यूक्लीयर फोर्सेज ट्रीटी से अमेरिका को हटा लिया। इस संधि के तहत 500 से 5500 किलोमीटर तक मार करने वाली बैलिस्टिक और क्रूज मिसाइलों के परीक्षण पर रोक थी। लेकिन अमेरिका के संधि से हटने के बाद रूस ने एक ऐसी मिसाइल का परीक्षण किया, जो ढाई हजार किलोमीटर तक निशाना साध सकती है।
ट्रंप प्रशासन ने पिछले नवंबर में ओपन स्काई संधि से भी अमेरिका को निकाल लिया। 1992 में हुई इस संधि में 34 देश शामिल हैं। इसके तहत इन देशों को एक दूसरे के ऊपर निगरानी उड़ान भरने की इजाजत मिली हुई थी। पिछले हफ्ते रूस ने भी इस संधि से खुद हटाने की घोषणा की।
विश्लेषकों में आम राय है कि ट्रंप एक ऐसी दुनिया बाइडन को सौंप कर गए हैं, जिसमें गलत सूचनाओं का प्रचार और साइबर हमले का खतरा बढ़ा हुआ है। साथ ही अमेरिका की क्षमताओं को लेकर शक गहराया हुआ है। बाइडन प्रशासन के लिए इन स्थितियों से निपटना आसान नहीं होगा। लेकिन अगर वह ऐसा करने में नाकाम रहा, तो बतौर महाशक्ति अमेरिका के अस्तित्व पर सवाल उठ जाएंगे।
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