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कश्मीर अनुच्छेद 370ः समय की स्लेट पर लिखी इबारत पढ़े पाकिस्तान

Mon, 05 Aug 2019 07:33 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Mon, 05 Aug 2019 07:33 PM IST
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jammu and kashmir article 370 and 35A india pakistan bjp pm modi amit shah
पाकिस्तान को कश्मीर पर सवाल उठाने से पहले बलूचिस्तान को देखना होगा। - फोटो : ANI

पाकिस्तानी प्रधानमंत्री कहते हैं कि कश्मीरियों को संयुक्तराष्ट्र सुरक्षा परिषद् के समझौतों के तहत भाग्य चुनने का अधिकार मिलना चाहिए। ठीक कहते हैं इमरान। कश्मीरियों ने तो अपना भाग्य 1947 में ही चुन लिया था। वे अपने निर्णय पर प्रसन्न भी थे। यह तो पाकिस्तान ही था, जिसने प्रसन्न कश्मीरियों पर हमला किया और 13000 वर्ग किलोमीटर कश्मीरी क्षेत्र हड़प लिया।

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उस क्षेत्र को पाकिस्तान आज़ाद कश्मीर कहता है ,लेकिन वहां तो कश्मीरियों की एक एक सांस का पाकिस्तान ने अपहरण कर लिया है। उनके बारे में हर निर्णय इस्लामाबाद में होता है। अपने क़ब्ज़े वाले कश्मीरी बाशिंदों को भी क़िस्मत का फ़ैसला करने का हक़ दीजिए इमरान साहब। उनका एक इलाक़ा तो आप पहले ही चीन को उपहार में दे चुके हैं। उस समय आपको कश्मीरियों का हक़ याद नहीं आया ? 
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पाकिस्तान अगर भारत में कश्मीरियों के आत्मनिर्णय की बात करता है तो पहले उसे आत्मनिर्णय के वोट की पर्चियां  पख़्तूनिस्तान में क्यों नहीं बांटनी चाहिए ? पठान तो 1947 से ही आत्मनिर्णय की मांग करते रहे हैं। सीमान्त गांधी ने भी यही मुद्दा उठाया था। श्रीमान क़ायदेआज़म ने उसे ठुकरा दिया था।
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ऐसी ही आत्मनिर्णय के वोट की पर्ची सिंध में भी क्यों नहीं बांटनी चाहिए? दशकों से वहां के लाखों बाशिंदे पाकिस्तान से अलग होने की मांग कर रहे हैं। उनकेआत्मनिर्णय की आवाज़ पर इमरान ख़ान के कान बहरे क्यों हो जाते हैं। क्या पाकिस्तानी नहीं जानते कि हज़ारों सिंधी आत्मनिर्णय की मांग करते हुए रहस्यमय ढंग से ग़ायब हो चुके हैं। पाकिस्तानी फौज उन्हें वहां भेज चुकी है, जहां से लौटकर कोई नहीं आता। इमरान एक बार अपने मुल्क़ की कहानी पढ़ लें।

 

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जम्मू-कश्मीर से अलग हुआ लद्दाख - फोटो : अमर उजाला

शायद आत्मनिर्णय के बारे में नजरिया कुछ साफ़ हो जाए। आत्मनिर्णय और मानवअधिकार की वक़ालत कर रहे पाकिस्तान के प्रधानमंत्री बलूचिस्तान को क्यों भूल रहे हैं? वहां 1947 के बाद से ही आत्मनिर्णय के आधार पर बलोच अपने देश की वापसी मांग रहे हैं।

बलूचिस्तान तो पाकिस्तान का हिस्सा 1947 में भी नहीं था। पाकिस्तान ने बलोच नवाब को धमकाकर उस स्वतंत्र देश पर क़ब्ज़ा किया था। यह सब तो इतिहास के पन्नों की प्रामाणिक जानकारी है। आत्मनिर्णय की मांग कर रहे बलूचियों पर पाकिस्तानी सेना ने टैंको से हमले कराए हैं, हवाई हमले किए हैं और मुठभेड़ों में आत्मनिर्णय की मांग कर रहे वहां के निवासियों को मौत के घात उतारा है। अच्छा हो कश्मीर पर बात करने से पहले इमरान अपने इन तीन राज्यों का अतीत भी जान लें। 




इस्लाम के अनुयायी इमरान ख़ान के पास इस बात का कोई उत्तर है कि उनके देश के ही शिया मुसलमानों, सूफ़ियों मुहाजिरों और अहमदियाओं को कितनी आज़ादी है। उनके अधिकारों की बात तो दूर, उन्हें बुनियादी हक़ भी नहीं हैं? कितने शिया मुसलमान जबरन ग़ायब कर दिए गए। कोई नहीं जानता कि वे कहां हैं सिवाय पाकिस्तानी फौज के। अहमदियाओं के सारे नागरिक अधिकार छीनकर पाकिस्तान कौन से मानव अधिकारों और आत्मनिर्णय की बात कर सकता है? हिन्दुओं, सिखों, ईसाईयों और बौद्धों पर अत्याचारों की कौन बात करे? 

राष्ट्रीय सुरक्षा समिति की रविवार को बैठक के बाद पाकिस्तानी प्रधानमंत्री भारत को मानवीय क़ानूनों और  1983 की पारंपरिक हथियारों पर कन्वेंशन की याद दिला रहे हैं। वे शायद भूल गए कि हिन्दुस्तान भी पाकिस्तान को ऐसे अनेक समझौतों की याद दिला सकता है।

वे शिमला संधि क्यों याद नहीं करना चाहते? उस संधि पर कोई बन्दूक की नोक पर भुट्टो से हस्ताक्षर नहीं कराए गए थे। उसमें सारे विवाद द्विपक्षीय बातचीत से निपटारे की बात कही गई थी। उसे भूलकर कारगिल जंग के बाद नवाज़ शरीफ़ अमेरिका भागे गए थे और इमरान ख़ान भी अमेरिका जाकर ट्रंप से मध्यस्थता की भीख़ मांगने गए। अपने समझौते ही पाकिस्तान के हुक्मरान याद नहीं रखना चाहते तो इसमें भारत का क्या दोष है?

भारत के धैर्य और संयम की सीमा का नाजायज़ लाभ उठाने की आदत पाकिस्तान को छोड़ देनी चाहिए। हिन्दुस्तान यदि ख़ामोश है तो उसका बड़ा कारण हज़ार साल की साझा विरासत है। हिन्दुस्तान के लाखों परिवारों की रिश्तेदारियां पाकिस्तान में हैं। पाकिस्तान भले ही आदम गुफाओं में रहते हुए बर्बरता दिखाए ,भारत अपनी संस्कृति से विचलित नहीं होगा। लेकिन याद रखना होगा कि यदि भारत एक बार पाकिस्तान की बर्बर राह पर चल पड़ा तो उसका अस्तित्व बचाना कठिन हो जाएगा। वक़्त की मांग है कि पाकिस्तान एक बार अपने लिए सहज - स्वाभाविक देश बने। एंटी इंडियन देश के रूप में उसका कोई वजूद नहीं है।
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।            

   

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