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जगजीत सिंह पुण्यतिथि विशेष: एक आवाज जो जीवन के हर रंग और उदासी में साथ रही

Thu, 10 Oct 2019 12:41 PM IST
Viplove Gupte विप्लव गुप्ते
Updated Thu, 10 Oct 2019 12:41 PM IST
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jagjit singh life story in hindi and memory
हम जगजीत सिंह को गजलजीत सिंह कहकर याद करते रहे - फोटो : फाइल फोटो

हर शुभ काम से पहले हम कोई न कोई टोटका तो ज़रूर करते हैं। परीक्षा से पहले या घर से बाहर निकलने से पहले दही शक्कर। मम्मी का धूपबत्ती की भभूति लगाना या मंदिर के सिन्दूर/ चन्दन से टीका लगा के घर से बाहर भेजना। घर में कोई भी नया काम शुरू करने से पहले पूजा।

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शादी हो गई तो पहले सत्यनारायण की पूजा फिर कोई काम दूजा। लोगों की बुरी नज़र न लग जाए इसलिए कोई गंडा- तावीज़ बंधवाना। हर परीक्षा से पहले एक तय शुदा मंदिर पर मत्था टेकना। हमेशा राइट पैर का मोज़ा और जूता पहले पहनना। इंटरव्यू के लिए एक लकी रूमाल या शर्ट। एग्जाम में लकी पेन से शुरुआत करना। लकी कंपास बॉक्स लेकर जाना और भी बहुत कुछ।  
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कॉलेज आने तक मुझे टोटके नहीं आते थे। छोटे मोटे यानी लकी पेन या पेंसिल, या फिर लकी शर्ट तक ही सीमित रहे। पिताजी ने कभी किसी और के सहारे टिकने को मना किया था। जो किया है वो भुगतोगे. जो होगा देखा जाएगा। कंचे, क्रिकेट, कॉमिक्स के आगे कभी कुछ सूझा भी नहीं, जो समय बचा वो पढ़ाई में लगा दिया और कभी टोटका करने का मौका ही नहीं पड़ा।  
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ये वो समय था जब हम लोग जग्गू भाई को डिस्कवर कर रहे थे। जग्गू भाई याने जगजीत सिंह या जैसे उनके फैन कहते हैं - ग़ज़लजीत सिंह। मेरे फुफेरे भाई आशीष रोहतगी के घर सोनीपत में समवन समवेयर नाम का एल्बम बज रहा था। जगजीत सिंह ग़ज़ल गाता है। ग़ज़ल कठिन होती है। भारी उर्दू। तबला पेटी और सारंगी पर म्यूजिक थोड़ी बनता है।

भला हो मेरे भाई का कि उसने ज़बरदस्ती वो एल्बम सुना सुनाकर मुझे जगजीत स्कूल ऑफ़ ग़ज़ल्स एंड सिंगिंग से परिचय कराया। ये तो वॉइलिन है, गिटार है। संतूर, कीबोर्ड। अरे ये क्या कर रहा है।  जगजीत की ग़ज़ल सुनना और साथ में गा पाना तो बड़ा आसान है। बिना बात की मुकरी नहीं है।  इतना डिफिकल्ट नहीं है। बेटे विवेक की असामयिक मृत्यु की पीड़ा और आदमी आदमी को क्या देगा...मेरा क़ातिल ही मेरा मुंसिफ है, क्या मेरे हक़ में फैसला देगा।

jagjit singh life story in hindi and memory
चित्रा और जगजीत - फोटो : फाइल फोटो

उसके बाद इंदौर वापस लौटा और कॉलेज में दोस्त आसिम रिज़वी के साथ बैठ बैठकर उसके कलेक्शन को डबल कैसेट डेक पर कॉपी करवाकर, पूरा कलेक्शन इकठ्ठा करने की कवायद शुरू हुई। नैनो, संजू, अर्पिता, पोरू, बल्लू, और अनुपमा जैसे संगीत के शौकीनों का साथ। 

जगजीत का एक अजीब फैन संतोष बामल, जिसकी दीदी से हमने जग्गू पर बड़ी चर्चा की, और तब शुरू हुआ जग्गू को समझने का सिलसिला.,सुन सुनकर लिरिक्स लिखे जाने लगे। 

डबल कैसेट में मिर्ज़ा ग़ालिब। कहकशां का डबल कैसेट, इन सर्च, क्राय फॉर क्राय, लव इस ब्लाइंड, बियॉन्ड टाइम, इकोस , एनकॉर और न जाने कितने जिनकी कैसेट अभी भी संभल के रखी हैं। 

फिर तो ये शुरू हो गया कि पुराने एल्बम ढूंढो। संतोष से बहुत माल मिला। सब मित्रों ने कसम खा ली थी कि एल्बम ढूंढेंगे। कॉलेज की पॉकेट मनी लगाकर। मुझे जगजीत  के लाइव कॉन्सर्ट में मज़ा आता था। कभी-कभी चित्राजी और जाती तो कितना मज़ा आता ये सोचता था। 

खैर बाद में जब इंटरनेट आया और नैपस्टर से परिचय हुआ तो दे दनादन डाउनलोड किए गए। रेडियो स्टेशन की नौकरी की तो वहां की लाइब्रेरी से बड़े एल्बम पाए, और इंदौर में जगजीत के शौकीनों के लिए शुरू किया संडे रात का 3 घंटे का प्रोग्राम- रात बाकी (ये रंग दे बसंती रिलीज़ होने से पहले की बात है)।

हर घंटे 10 में से 8 ग़ज़लें, जगजीत की होती थी। मुझे याद है एक रविवार आखिरी ग़ज़ल की अनाउंसमेंट की तो स्टूडियो में एक फ़ोन आया और इत्तेफ़ाक़ से मैंने उठाया। रात के पौने बारह बज रहे थे। सामने वाले ने कहा- प्राजी, आखिरी ड्रिंक चल रहा है, एक होर ग़ज़ल लगा दो। असी ज़िन्दगी भर गुलामी करांगे। वो "मैं नशे में हूं", वो चला दो। ये पागलपन सिर्फ जगजीत के लिए हो सकता था। 

खैर, कॉलेज में इस बात की शर्तें लगने लगी की हर ग़ज़ल के पूरे लिरिक्स बमय सुर याद हैं या नहीं। हमारे ग्रुप में कुछ कानसेन थे, कुछ कोरस वाले साथी थे, और कुछ बढ़िया गाते थे.  मगर तुर्रा ये रहा कि जग्गू तो सब के सब गाएंगे।  कैसे ग्रुप ग़ज़ल गायन होता था ये सोचता हूं तो हंस हंसकर लोट पोट हो जाता हूं।

एक बात लेकिन ये तय रही कि सुदर्शन फ़ाकिर हो, वसीम बरेलवी हो, गुलज़ार हो या निदा फ़ाज़ली, बेचारे ग़ज़ल लिखने वालों के साथ चौतरफा नाइंसाफी की गई। ग़ज़ल याने जग्गू की। ये वाली चित्राजी की आवाज़ में ही जमती है। ग़ज़लकारों को हम भूल ही गए। किस तरह गाना गाने वाला अपनी रूह से गाता है कि लिखने वाले से ज़्यादा शब्द गाने वाले के अपने हो जाते हैं।  



 

jagjit singh life story in hindi and memory
जगजीत को याद करना यानी एक समय को याद करना। - फोटो : फाइल फोटो

इस दौरान इंदौर में जगजीत का एक कॉन्सर्ट रखा गया। छोटा नेहरू स्टेडियम। पहला कॉन्सर्ट और जगजीत को देखना सुनना, और क्या चाहिए, मगर दीवानगी तब भी फुलफॉर्म में नहीं थी। कुछ समय बाद लता मंगेशकर और जगजीत का एक ट्विन कैसेट एल्बम आया "सजदा" उसकी सबसे मक़बूल ग़ज़ल थी "धुंआ बना के फ़ज़ां में क्यों उड़ा दिया मुझको"। 

मुंबई में इसका प्रमोशनल कॉन्सर्ट था और लता जी नहीं थी, सिर्फ जगजीत थे। ये वाली ग़ज़ल जगजीत ने गानी शुरू की। पहले मैं थोड़ा अटपटा फील कर रहा था और चुपचाप रुमाल से नाक साफ़ करने के बहाने अपने चश्मे को साफ़ करता, आंसू पोछता और सोचता कि किसी ने देखा तो नहीं, फिर जब गला भर गया तो नज़र इधर-उधर की और देखा तो हाल मिल गया तुम्हारा अपने हाल से, और पूरा हॉल रुमाल से चश्मा साफ़ कर रहा है, नाक साफ़ कर रहा है। फिर जब जग्गू ने "मिट्टी दा बावा" गाया तो पूरा हॉल दहाड़ें मार के रोने लगा। 

दूसरा कॉन्सर्ट सोनीपत में था, एल्बम था "लव इस ब्लाइंड" ब्लाइंड एसोसिएशन के सहायतार्थ। 

प्रोग्राम शुरू होना था 8.30 पर, साहब गला तर कर रहे थे, तो आते-आते पौने 9 बजे और साज सजाते सजाते, 9.05. देरी से आने के लिए माफ़ी चाहता हूं। गला गीला कर रहा था। बस, माहौल बदल गया। उस शख्स से 2 घंटे के प्रोग्राम को 3.45 घंटे के प्रोग्राम में कब बदल दिया। कब पंजाबी टप्पे बजने लगे, कब हम रोने लगे, कब बीच ग़ज़ल में लतीफों से हंसने लगे, कब सुर से सुर मिला कर साथ गाने लगे, तो जब उन्होंने कहा कि आखिरी ग़ज़ल है, तब जा के तन्द्रा टूटी और फिर से लगा कि अरे यार...थोड़ा और सुना देते। बस चलता तो पूरी रात, अगला पूरा दिन, और पूरी रात, और फिर अगले कई दिन, कई रातें भी काम पड़ती। 

jagjit singh life story in hindi and memory
अपने 70वें साल में वो साल में 70 वे कॉन्सर्ट की तयारी कर रहे थे। - फोटो : फाइल फोटो

अपने 70वें साल में वो साल में 70 वे कॉन्सर्ट की तयारी कर रहे थे। इस दौरान उनसे मुलाक़ात हुई तो उन्होंने कहा, माशा अल्लाह आपका नाम बड़ा ज़बरदस्त है- विप्लव। विप्लव करते हो या सिर्फ नाम है। मैं भी हंस पड़ा। मैंने कहा आपके साथ काम करुंगा तो आप तौबा कर लेंगे।

उन्होंने ने भरी पूरी नज़र डाली और कहा- बातों से शरारती लगते हो। मैंने भी चौका जड़ दिया - आपकी संगत है न प्रभु, बच्चे तो शरारत ही करेंगे। गाते-गाते रुला देते हैं तो अभी तो मस्ती करने दीजिये, फिर उनके कॉन्सर्ट के प्रमोशन पर आधा घंटा बात होती रही। 

बिल्लू बादशाह नाम की फिल्म के गाने "जवां जवां" पर हम बहुत देर तक हंसते रहे। मैंने भी उनको उनकी दो-चार पुरानी ग़ज़लें याद दिला दीं जैसे - आंख को जाम समझ बैठा था अनजाने में। वो भी सोच में पड़ गए तो मैंने दो लाइन गाने की गुस्ताखी भी कर दी। वो बोले - यार तुम तो बहुत छोटे लगते हो, ये कहां सुन ली। मैंने कहा मेरी पैदाइश से पहले की है मगर आपकी है। कलेक्शन में होती है न। इसके पहले और बात होती दुर्गा जसराज और प्यारेलाल जी का आना हुआ और बात रह गई। जब वो जा रहे थे तो बोले-यार वो कॉन्सर्ट के प्रमोशन का देख लेना। 

मैंने कहा आपने कह दिया बस काम हो गया। ये आखिरी मुलाक़ात रही। 

बिना जगजीत के घर, कभी घर लगता नहीं है। एक टीवी चैनल ने उन्हें श्रद्धांजलि का कार्यक्रम ब्रॉडकास्ट किया। हर बार उनकी ग़ज़ल कोई और गा रहा था। सब जाने माने सिंगर थे, मगर अपने को तो तुमको देखा तो ये ख्याल आया/ नज़रे करम फरमाओ/ आरिज़ ओ लब सादा रहने दो...ये सब जगजीत की बैरीटोन वाली आवाज़ में सुनाने की आदत है। मन में आया कि चित्राजी कह दें और अंदर से जगजीत गला गीलाकर के आ जाएं। कोई टोटका किया जाए। 

मेरे एक अनन्य मित्र (नाम नहीं लिखूंगा) और मेरा एक टोटका बड़ा ही अजीब सा था। परीक्षा देने जा रहे हैं तो उसके पहले 3-4 बार एक गाना सुनना ज़रूरी था। जावेद अख्तर का लिखा जग्गू -चित्रा का गाया और जग्गू का कम्पोजीशन। फिल्म साथ साथ और गाना था - ये तेरा घर ये मेरा घर, किसी को देखना हो गर।

मंथली टेस्ट हो, सेमेस्टर की परीक्षा हो, एनुअल एग्जाम हो...हर पेपर देने से पहले, ये गाना सुनना ज़रूरी है। लूप पर, इस चक्कर में ग्रेजुएशन में अर्थ-साथ साथ की ट्विन एल्बम वाली एचएमवी की कैसेट की 3 बार कुर्बानी दी गई थी, मगर ये गाना एंथम बना रहा, टोटका बना रहा। अब परीक्षा तो नहीं देते, मगर ज़िन्दगी के इम्तिहान में जग्गू भाई याद ज़रूर आ जाते हैं, मगर जग्गू भाई होते नहीं हैं। 

जावेद अख्तर ने ही एक और बेहतरीन गीत लिखा है, जिसे आवाज़ दी है जगजीत सिंह ने- अब अगर आओ तो जाने के लिए मत आना, सिर्फ एहसान जताने के लिए मत आना! 

याद रखना जग्गू भाई...

 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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