भाजपा में जाने की चर्चाओं को लेकर आखिर क्यों चुप हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया?
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मप्र की सियासत में इस समय ज्योतिरादित्य सिंधिया चर्चा का केंद्रीय विषय बने हुए हैं क्योंकि उन्हें लेकर पिछले एक सप्ताह से सोशल मीडिया पर खबरें वायरल हो रही हैं कि वे बीजेपी में जा रहे हैं और उनकी मुलाकात बीजेपी अध्यक्ष और गृहमंत्री अमित शाह से हो चुकी है।
खास बात यह है कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की तरफ से इस खबर का कोई खंडन नहीं किया जा रहा है जबकि सिंधिया सोशल मीडिया पर लगातार एक्टिव रहते हैं और उनकी पत्नी प्रियदर्शिनी राजे और येल यूनिवर्सिटी से पास पुत्र महाआर्यमन भी लगातार सोशल मीडिया पर लोगों से संवाद करते रहते हैं।
इधर सिंधिया भी फेसबुक पेज से अक्सर लाइव आते रहते हैं। लेक़िन लगातार चल रही इन खबरों का प्रतिकार किसी फोरम से नहीं हो रहा है। यही नहीं उनके किसी समर्थक मंत्री द्वारा भी इन खबरों का खंडन नहीं किया जा रहा। इस बीच राजधानी भोपाल में भी इस आशय की खबरें छप रहीं हैं।
क्या वाकई भाजपा में शामिल हो सकते हैं सिंधिया?
क्या वाकई ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी में जा सकते हैं? मप्र के मौजूदा राजनीतिक हालात बताते हैं कि 15 साल बाद सत्ता में आई कांग्रेस गुटबाजी औऱ कबीलाई कल्चर से बाहर नहीं आ पाई है और सिंधिया इस समय खुद के सत्ता साकेत में हाशिए पर हैं। उनकी गुना से हुई पराजय ने व्यक्तिगत रूप से उन्हें कमजोर कर दिया है।
कमलनाथ अभी मप्र कांग्रेस के अध्यक्ष भी हैं। सिंधिया समर्थक चाहते थे कि यह पद सिंधिया को मिले ताकि मप्र में सिंधिया का हस्तक्षेप बना रहे, लेकिन कमलनाथ इसके लिए राजी नहीं हैं क्योंकि वे सत्ता का कोई दूसरा केंद्र विकसित नहीं होने देना चाहते हैं।
इधर, लोकसभा में पार्टी की हार के बाद कमलनाथ ने इस पद से इस्तीफा दे दिया लेकिन अब वे इस पद पर आदिवासी कार्ड खेलकर सिंधिया को रोकने में लगे हैं और अपने खास समर्थक गृहमंत्री बाला बच्चन या ओमकार मरकाम को पीसीसी चीफ बनाना चाहते हैं। इस मिशन में उन्हें दिग्विजयसिंह का साथ है जो परम्परागत् रूप से सिंधिया राजघराने के विरोधी हैं। समझा जा सकता है कि मप्र की सत्ता से बाहर किए गए सिंधिया को संगठन में भी यहां आसानी से कोई जगह नहीं मिलने वाली है।
आखिर क्यों लगातार निशाने पर हैं सिंधिया?
उधर दिल्ली की कांग्रेस तस्वीर में भी सिंधिया की प्रभावी भूमिका सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने से धूमिल हुई है। कभी उनका नाम नए अध्यक्ष के रूप में चलाया गया था। कार्यसमिति की बैठक में त्रिपुरा की इकाई ने उनके नाम का प्रस्ताव भी रखा था लेकिन सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने से साफ हो गया कि अब पार्टी में बुजुर्ग नेताओं की ही चलने वाली है। जाहिर है कांग्रेस में सिंधिया के लिए अनुकूलता न मप्र में नजर आ रही है न दिल्ली में। ऐसे में उनके सामने भविष्य की राह फिलहाल तो चुनौतीपूर्ण ही है।
मप्र की कमलनाथ सरकार को जिस तरीके से बीजेपी के दो विधायकों ने अपना समर्थन दिया है उससे सिंधिया की वजनदारी मप्र के सत्ता संतुलन में कम हुई है। इस पूरे मामले से भी कमलनाथ ने सिंधिया को दूर रखा जबकि मैहर के पाला बदलने वाले बीजेपी विधायक नारायण त्रिपाठी मूलतः सिंधिया से जुड़े रहे हैं। 2013 में सिंधिया के कहने पर ही त्रिपाठी को कांग्रेस का टिकट दिया गया था।
लोकसभा चुनाव में भी उनकी इच्छा के विपरीत जाकर भिंड से देवाशीष जरारिया और ग्वालियर से अशोक सिंह यादव को टिकट दिए। दोनों चुनाव हार गए। सिंधिया ने इनके लिए प्रचार भी नहीं किया। लोकसभा चुनाव में उन्होंने अपने क्षेत्र गुना में वोटिंग के बाद विदेश जाना पसंद किया जबकि 12 मई को मप्र में 8 सीटों पर चुनाव शेष था जिनमें इंदौर और मालवा की सीटें शामिल थीं।
प्रशासनिक मामलों में भी सिंधिया को उनके कद के अनुरूप तवज्जो नहीं मिल रही है। ग्वालियर में उनकी मर्जी के विरुद्ध कलेक्टर बनाए गए। कुछ यही हाल उनके गुना शिवपुरी संसदीय इलाके के कलेक्टर्स, एसपी की नियुक्ति को लेकर है जहां से वे सवा लाख वोटों से इस बार चुनाव हार गए है।
मप्र में उनकी सरकार के रहते चुनाव हारना सिंधिया के लिए असहनीय सदमे से कम नहीं है जबकि वे लगातार 15 साल मप्र में बीजेपी सरकार के रहते एक तरफा जीतते रहे हैं।
2014 में तो वे बीजेपी के हैवीवेट कैंडिडेट जयभान सिंह को तब हराकर जीते थे जब खुद मोदी उनके खिलाफ सभा करने आए थे और शिवराज सिंह ने करीब 20 सभाएं की। लेकिन इस बार वे अपनी ही सरकार और प्रशासन होने के बावजूद बुरी तरह हार गए वह भी बीजेपी के वॉकओवर जैसे सबसे कमजोर कैंडिडेट से जो कभी उन्हीं का चेला हुआ करता था।
क्यों कांग्रेस छोड़ सकते हैं सिंधिया?
सवाल यह है कि क्या वाकई सिंधिया कांग्रेस छोड़ सकते हैं? मप्र औऱ राष्ट्रीय परिदृश्य के हिसाब से आंकलन किया जाए तो यह स्पष्ट है कि आज सिंधिया के लिए कांग्रेस में उनके कद के लिहाज से कोई भविष्य नजर नहीं आ रहा है। वे जिस पृष्ठभूमि से आते हैं उसके अनुरूप आने वाला समय उनकी जमीनी सियासत के लिए लगातार कठिनतर होने वाला है।
लोकसभा जाने के लिए उनके सामने गुना औऱ ग्वालियर दो ही विकल्प हैं लेकिन गुना से अप्रत्याशित हार ने उनके परिवार के अपराजेय होने के मिथक को तोड़ दिया है। जाहिर है ऐसे में अब बीजेपी भी आगे इस मानसिकता से नहीं लड़ेगी की सिंधिया कभी नहीं हारते हैं।
दरअसल, देशव्यापी माहौल जिस तरह से कांग्रेस के विरुद्ध निर्मित हो रहा है वह भविष्य में सिंधिया की राह को औऱ भी मुश्किल बनाएगा क्योंकि उनके साथ कोई जातिगत बैक नहीं है।
मोदी शाह की नई बीजेपी जिस रास्ते औऱ दर्शन को लेकर आगे बढ़ रही है वह फिलहाल विपक्षी नेताओं के लिए अस्तित्व के सवाल खड़े कर रही है। लगातार दूसरी ऐतिहासिक पराजय के बावजूद कांग्रेस के राजनीतिक दर्शन में कोई बुनियादी बदलाव आता हुआ नजर नहीं आ रहा है। खासकर राष्ट्रवाद और हिंदुत्व को लेकर पार्टी की सोच ने कम से कम हिंदी बैल्ट में तो वोटर्स को फिलहाल अपने से काफी दूर कर लिया है।
370 पर सिंधिया का स्टैंड
मप्र का ग्वालियर चंबल से लेकर मालवा तक का इलाका आरम्भ से ही हिन्दू सेंटिमेंट वाला रहा है। कश्मीर और अनुच्छेद 370 पर संसद और संसद के बाहर कांग्रेस पार्टी के स्टैंड ने सिंधिया जैसे नेताओं को परेशान कर रखा है। इस मामले पर पार्टी की अधिकृत लाइन से परे जाकर जिस तरह सिंधिया मोदी सरकार के पक्ष में खड़े दिखाई दिए हैं तो इसके सियासी निहितार्थ सिंधिया की भविष्य की राजनीति से जुड़े भी हो सकते हैं।
370 पर देश का मानस पढ़ने में जो भूल कांग्रेस ने की है उसका अहसास चुनाव हारे सिंधिया जैसे नेताओं को बखूबी है और वे समझ रहे हैं कि आने वाला समय उनकी चुनावी राजनीति के लिए कितना चुनौती भरा होने वाला है, तब जबकि बीजेपी से ज्यादा चुनौती उन्हें कांग्रेस में ही मिलनी है।
जाहिर है मप्र की सियासत का यह ग्लैमरस फेस मोदी शाह की नई बीजेपी में अपनी भूमिका के बारे में सोचता है तो कोई राजनीतिक अजूबा नहीं होना चाहिए, क्योंकि उनके पिता ने भी अपनी सियासत का ककहरा जनसंघ की अंगुली पकड़कर इसी गुना शिवपुरी से सीखा था, लेकिन तब मुख्यधारा की राजनीति और क्षेत्रीय विकास के नाम पर वे जनसंघ को छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे।
उनकी दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया तो बीजेपी की संस्थापक औऱ लंबे समय तक फाइनेंसर रही हैं। राजस्थान की सीएम वसुंधरा राजे औऱ मप्र में यशोधरा राजे पहले से ही बीजेपी में प्रभावी पोजिशन पर हैं।
अब अगर वे वाकई मोदी शाह की बीजेपी में जाने का मन बना रहे है तो मप्र की सियासत में बड़ा घटनाक्रम ही होगा। वैसे दावा किया जा रहा है कि मप्र में वे सीएम भी हो सकते हैं लेकिन विजय बहुगुणा, (उत्तराखंड) हिमंता शर्मा, (आसाम)सुखराम,(हिमाचल)एसएम कृष्णा,(कर्नाटक)चौधरी वीरेन्द्र सिंह(हरियाणा) जैसे कई उदाहरण भी इन 6 साल में बीजेपी में हमारे सामने हैं। लेकिन रघुवर दास,योगी आदित्यनाथ, मनोहर लाल खट्टर भी मोदी शाह बीजेपी के ही उदाहरण हैं।
बहरहाल सिंधिया से जुड़ी इन खबरों ने मप्र का सियासी पारा इन दिनों ऊपर कर रखा है। 370 पर मोदी के साथ खड़े होकर सिंधिया ने एक तार्किकता को तो गढ़ ही लिया है अगर वे बीजेपी में आते हैं।
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