इरफान! आप हमारी मुहब्बत हैं इसलिए जाने दिया, जिद होते तो इसी दुनिया में होते
90 के दशक में पैदा हुए हम जैसे युवाओं का बचपन चंद्रकांता जैसे तिलस्मी धारावाहिक देखते बीता है। चंद्रकांता, देवकीनंदन खत्री के उपन्यास पर नीरजा गुलेरी निर्देशित वह धारावाहिक, जो उस वक्त बच्चों को एक अलग ही दुनिया में लिए चला जाता था। घर में टेलिविजन था नहीं, सो समय से पहले होमवर्क निबटा कर मुहल्ले में ही दूसरे के घर जाना पड़ता था। चंद्रकांता के लीड किरदारों से इतर मोटी, बड़ी आंखों वाला वह किरदार बहुत आकर्षित करता था।
राजा शिवदत्त का ऐय्यार बद्रीनाथ। अपने दोनों हाथों को कंधों पर रखा और पीछे से कोई बारुदी आइटम निकाल कर सामने दुश्मनों की ओर फेंकते ही बूम की आवाज के साथ विस्फोट का वह दृश्य बहुत ही प्रभावित करता था। धारावाहिक देखकर लौटते या फिर जब कभी याद आता तो भाई के साथ उस दृश्य की एक्टिंग करते। ब्लैक एंड व्हाइट ही सही, लेकिन क्या शानदार दौर था वह भी।
फिल्मों को देखने की समझ बढ़ी और हासिल, मकबूल जैसी फिल्में देखी तो इरफान के अभिनय का कायल होता चला गया। अच्छा लगा कि बचपन वाला बद्रीनाथ जीवन में फिर से लौट आया है।दरअसल इरफान का अभिनय, उनकी अदायगी ऐसे तिलस्मी पानी की तरह है, जिसे आप जितना पीते हैं, प्यास बढ़ती जाती है।
कोई कार्यक्रम या धारावाहिक देखते समय दर्शकों को अक्सर ब्रेक से चिढ़ होती है, लेकिन जब 'हच का छोटा रिचार्ज, केवल 10 रुपए में' कहते हुए इरफान आते थे, तो रिमोट हाथ में होते हुए भी चैनल बदलने का मन नहीं करता था। सीधी-सपाट बात, जो कहना है, कह दो और निकल लो। एड यानी विज्ञापन फिल्मों में भी उनका अंदाज जुदा रहा।
फिल्म इंडस्ट्री में तीन खान अक्सर चर्चा में रहते हैं, लेकिन इन तीनों खान से अलग इरफान की अपनी एक अलग पहचान रही है। तुलना नहीं कर रहा, लेकिन गौर करने वाली बात तो है ही। खान उपनाम वाले इरफान ने तीनों खानों की तरह खुद को कभी स्टार नहीं माना, बल्कि सिर्फ एक कलाकार माना। इंडस्ट्री के अंदर या बाहर उनकी यही सहजता, सरलता और सादगी उन्हें एक बेहतर इंसान साबित करती है।
पान सिंह तोमर में लीड रोल हो या फिर मीरा नायर की सलाम बॉम्बे में छोटी सी भूमिका, इरफान जितनी भी देर स्क्रीन पर होते हैं, हिलना संभव नहीं होता। दरअसल, अच्छा दिखना मुश्किल नहीं है, मुश्किल होता है अलग दिखना और यही आपको भीड़ से अलग करता है। इरफान कभी किसी होड़ में शामिल नहीं हुए। औरों से अलग अपने अंदाज में काम किया और अपनी जगह बनाई।
टीवी सीरियलों से लेकर बॉलीवुड और हॉलीवुड तक, बस अपना काम करते रहे और अभिनय की बदौलत ही साबित हुए। हालांकि वे दिलीप कुमार से प्रभावित थे, लेकिन न उनके न ही किसी और के 'टाइप' बने, बल्कि अपना इकलौता 'टाइप' स्थापित किया।
इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर बनी फिल्म 'हासिल' ने मेरे जैसे लाखों युवाओं का उनके प्रति आकर्षण और बढ़ाया। और फिर मैक्बेथ उपन्यास पर विशाल भारद्वाज की फिल्म मकबूल में इरफान के अभिनय ने दिल में इस कदर जगह बनाई कि उनके जाने के बाद भी वो जगह खाली नहीं हो पाएगी। न ही कोई और उनकी जगह ले पाएगा। न दिल में, न इंडस्ट्री में और न ही इस दुनिया में।
बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते
आंखों से अभिनय करने वाला, गहरी बातें कहने वाला ऐसा कलाकार शायद ही कोई दूसरा हो। चाणक्य और चंद्रकांता जैसे धारावाहिक हो, प्रथा और 'एक डॉक्टर की मौत' जैसी समानांतर फिल्में हों, क्रेजी-4 और दिल कबड्डी जैसी फिल्मों में कॉमिक रोल हो, मकबूल और मदारी जैसी फिल्मों में केंद्रीय भूमिका हो, रुमानियत से भर देनेवाली लंचबॉक्स और करीब-करीब सिंगल जैसी फिल्में हो या फिर इंडियन समर और लाइफ ऑफ पाई जैसी अंतरराष्ट्रीय फिल्में हों, टेलीवुड और बॉलीवुड से लेकर हॉलीवुड तक उन्होंने दुनिया में अपने अभिनय की छाप छोड़ी है।
साल 2005 में आई उनकी फिल्म रोग बहुत चर्चा में नहीं रही, लेकिन उस फिल्म में उनका परिचय दृश्य और उनकी अदायगी आजीवन याद रह जाने वाली है। इरफान के डायलॉग से फिल्म शुरू होती है। सामने मनोचिकित्सक और इरफान बोलना शुरू करते हैं-
पिछले गुरुवार को फिर मैंने अपनी जान लेने की कोशिश की। कोई खास वजह नहीं है, कोई तनाव भी नहीं है। मन ऊब गया है। वही शोर, आवाजें। घर-थाना, थाना-घर, घर-थाना। #$@#@$# लाशें। ....अजीब सा एहसास है मन में...अजीब। जैसे रोज नया दिन निकलता है, मैं वही पुराना हूं, दुनिया वही पुरानी है, वैसे ही चली जा रही है। मुझे लगा भाई, ये जो जिंदगी की गाड़ी चल रही है, इसकी मैं चेन खींचता हूं और मैं उतर जाता हूं।
डॉक्टर पूछता है- तो फिर मरे क्यों नहीं? इरफान कहते हैं-
फिर वो मोमेंट चला गया, टूट गया। उसके बाद मेरा मरने का दिल नहीं किया।
काश फिल्म की ही तरह वास्तव में भी आपकी मौत का वो मोमेंट चला जाता और मरने का आपका दिल नहीं करता तो कितना अच्छा होता। लेकिन नहीं, जिंदगी की इस गाड़ी की आपने चेन खींची और उतर गए। साकिब लखनवी के शब्दों में,
बड़े शौक से सुन रहा था जमाना, तुम्हीं सो गए दास्तां कहते-कहते।
किस्मत की मार देखिए कि कलाकार तो यह दुर्लभ था ही, बीमारी भी मिली तो वह भी दुर्लभ। इरफान की तरह उनकी बीमारी भी औरों से जुदा थी। वे अलग किस्म के ब्रेन कैंसर से जूझ रहे थे। साल 2018 में न्यूरो इंडोक्राइम ट्यूमर का इलाज कराने लंदन गए इरफान की जीजिविषा ऐसी कि इलाज के बाद फिर से काम पर लौट कर उन्होंने हमें अंग्रेजी मीडियम जैसी शानदार फिल्में दी। किसे पता था कि यह उनकी आखिरी फिल्म साबित होगी। बीमारी के दौरान उनका जीवन के प्रति, प्रकृति के प्रति नजरिया बदल गया। बीमारी से जूझने के दौरान सोशल मीडिया पर उनकी ये लाइनें खूब वायरल हुई।
मुझे पता था कि टिकट कट चुका है, बस वेटिंग में हूं और नंबर कंफर्म होना बाकी है। निकल ही लेना होगा, आज नहीं तो कल…चिंता दरकिनार हुई और मेरे दिमाग से जीने-मरने का हिसाब निकल गया तो !
इलाज के दौरान उनका लिखा पत्र भी उनके जाने के बाद लोगों को भावुक कर रहा है। अगर आपने जज्बा फिल्म देखी होगी, तो अंत में सबकुछ ठीक होने के बाद का एक दृश्य जरूर याद होगा, जब एश्वर्या राय जा रही होती है और उसे रोकने के लिए साथी के टोकने पर इरफान कहते हैं,
अबे मुहब्बत थी, इसलिए तो जाने दिया, जिद होती तो बाहों में होती।
इरफान, हम प्रशंसक भी आपसे वैसी ही मुहब्बत करते हैं और हां, आप हमारी मुहब्बत थे, इसलिए तो जन्नत जाने दिया, जिद होते तो हमारी इसी दुनिया में होते।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।