योग दिवस विशेष: जीवन दर्शन है योग, दुनियाभर में मिल रही ख्याति पर चिराग तले अंधेरा
भारतीय परंपरा में योग एक जीवन दर्शन है। इसका उद्देश्य मात्र शारीरिक सौष्ठव और व्यायाम न होकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास है। उपनिषदों की परंपरा में योग वह उच्च अवस्था है, जहां मन की वृत्तियां रुक जाती हैं। मन के स्थिर होकर से ध्यानस्थ हो जाता है।
विस्तार
श्रीमद्भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने योग की उत्पत्ति के बारे में अर्जुन से कहा-
इमं विवस्वते योगं प्रोक्तवानहमव्ययम्। विवस्वान्मवे प्राह मनुरिक्ष्वाकवेsब्रवीत्।।१।।
एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदु:। स कालेनेह महता योगो नष्ट: परन्तप ।।२।।
भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं कि मैंने इस अविनाशी योग को सूर्य से कहा था, सूर्य ने अपने पुत्र वैवस्वत मनु से कहा और मनु ने अपने पुत्र राजा इक्ष्वाकु से कहा। हे परन्तप अर्जुन! परम्परा से प्राप्त इस योग को राजर्षियों ने जाना; किन्तु उसके बाद वह योग बहुत काल से इस पृथ्वीलोक में लुप्त हो गया था।
योग की ऐतिहासिकता के बारे में ये दोनों श्लोक गीता के चौथे अध्याय से उद्धरित किया गया है। गीता में में योग से सम्बंधित तीन परिभाषाएं प्राप्त होती हैं। गीता के दूसरे अध्याय के ५०वें श्लोक में योग की परिभाषा करते हुए कहा गया है कि -
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।तस्माद्योगाय युज्यस्व योग: कर्मसु कौशलम्।५०।।
अर्थात् समबुद्धियुक्त पुरुष पुण्य और पाप दोनों को इस संसार में ही त्याग देता है। मतलब यह कि उनसे मुक्त हो जाता है। इस लिए तुम समत्वयोग में लग जा; यह समत्वयोग ही कर्मों में कुशलता है। अर्थात् कर्म बन्धन से छुटकारे का यहीं उपाय है।
गीता में योग का मिलता है जिक्र
गीता में योग की दूसरी परिभाषा के बारे में कहा गया कि- हे धनंजय! तू आसक्ति को त्यागकर सिद्धि असिद्ध में समान बुद्धि वाला होकर योग में स्थित हुआ कर्मों को करो, ऐसा समत्व भाव ही योग कहलाता है( समत्वम् योग उच्चते) 2.48
इसके अलावा गीता के छठवें अध्याय के 23वें श्लोक में योग को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि -
तं विद्याद् दुःखसंयोगवियोगं योग संज्ञितम्। अर्थात् यह योग दुःखरूपी संसार के संयोग से रहित है। उस योग को जानना चाहिए। उस योग को बिना उकताये धैर्य के साथ उत्साहयुक्त चित्त और प्रसन्न मन से करना कर्तव्य है।
योग के बारे में संक्षेप में यह कहा जा सकता है कि- भारतीय परंपरा में योग एक जीवन दर्शन है। इसका उद्देश्य मात्र शारीरिक सौष्ठव और व्यायाम न होकर सम्पूर्ण व्यक्तित्व का विकास है। उपनिषदों की परंपरा में योग वह उच्च अवस्था है, जहां मन की वृत्तियां रुक जाती हैं। मन के स्थिर होकर से ध्यानस्थ हो जाता है।
इस प्रकार योग मन और शरीर के समरस होने की प्रक्रिया है -जिसे महर्षि पतंजलि ने 'योग: चित्तवृत्ति निरोध:'। 'तदा द्रष्टु: स्वरूपे अवस्थानम्' कहा है।
आधुनिक समय में योग की बढ़ती लोकप्रियता का एक बहुत बड़ा कारण है ,जीवन में बढ़ते तनावपूर्ण जिंदगी से छुटकारा। चिकित्सा विज्ञान में तमाम तरह के तनावों का कोई स्थायी निदान नहीं है। अब हर तरह के रोगों में योगाभ्यास से बिना किसी 'साईड इफेक्ट' के 'योग करें निरोग ' अभियान को गति मिल रही है। हालांकि सम्पूर्ण रोगों का निदान केवल योग से भी सम्भव नहीं है।
भारत ने 21जून को हर साल योग को एक खास थीम पर अंतर्राष्ट्रीय दिवस के रूप में आयोजित करने का निर्णय सन् 2019 से किया। आज दुनिया के लगभग 200 देशों में योग दिवस का अयोजन किया जाता है। इस साल ग्यारहवें अन्तर्राष्ट्रीय योग दिवस का थीम है - "एक पृथ्वी एक स्वास्थ्य के लिए योग"।
योग साधना की इन तमाम उपादेयता, ऐतिहासिकता और अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि के बावजूद भारत के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के क्लर्क स्तर के बाबुओं की योग के विषय में अपनी अलग परिभाषा है। पूरी दुनिया भारत की इस प्राचीन विधा योग को मान्यता प्रदान कर रही हैं। लेकिन दुनिया की सबसे प्राचीन नगरी काशी में ऐसा लग रहा है जैसे योग को लेकर दीपक तले अंधेरा छाया हुआ है। वह भी तब जब काशी का राजनीतिक प्रतिनिधित्व देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं।
भारत रत्न महामना मदनमोहन मोहन मालवीय के अपने विश्वविद्यालय में योग तकनीकी और गैर तकनीकी झमेले में फंसकर अन्तिम सांसे गिन रहा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग भी तय नहीं कर पा रहा कि योग को किस कैटेगरी रखा जाए। एक योग विशेषज्ञ को तकनीकी रूप से स्किल्ड कैटेगरी रखा जाए अथवा नॉन स्किल्ड कैटेगरी में।
योग और तमाम चुनौतियां
इस संदर्भ में एक मौजू यह सवाल यह है कि केन्द्रीय विश्वविद्यालय में बारह घंटे सप्ताह में छ: दिन बिना अवकाश के किसी पी. एच. डी. डिग्रीधारक योग प्रक्षिशक का वेतन चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी के वेतन से भी कम होनी चाहिए?
अगर इसका उत्तर हां में है ,तो फिर शासन-प्रशासन के बड़े ओहदेदारों से किसी न्याय की उम्मीद छोड़ देना चाहिए। पर यह अनोखा अन्याय काशी हिन्दू विश्वविद्यालय स्थित मालवीय योग साधना केन्द्र में सरेआम हो रहा रहा है। वह भी तब जब यह योग साधना केन्द्र अपने स्थापना का स्वर्ण जयंती समारोह मना रहा है। इस योग साधना केन्द्र की स्थापना 16 फरवरी सन् 1975 वसन्त पंचमी के पावन पर्व पर उस आवास में हुई- जहां महामना मदनमोहन मालवीय जी महाराज का मृत्यु पर्यन्त निवास स्थान रहा।
चिकित्सा विभाग बी. एच. यू. के निदेशक रहे के. एन. उडुप्पा और बी. एच. यू. के ही रेक्टर रहे टी. आर. रमण के द्वारा। इस योग साधना केन्द्र में पिछले 24 साल से अस्थायी योग इंस्ट्रक्टर के रूप में डॉक्टर योगेश भट्ट और 15 साल से डॉ राधेश्याम तिवारी मात्र 28,890/ रूपये वेतन पर सुबह पांच बजे से शाम से छ : तक बजे तक अहर्निश अपनी सेवाएं अर्पित कर रहे हैं।
इस योग साधना केन्द्र से प्रशिक्षण प्राप्त सैकड़ों छात्र हर साल देश -विदेश में अपनी योग्यता से नौकरी प्राप्त कर रहे हैं। पर उन छात्रों को हुनरमंद बनाने वाले योग प्रशिक्षकों का कोई पुरसाहाल नहीं।
वर्षों से योग का प्रशिक्षण दे रहे डॉक्टर योगेश भट्ट और डॉ राधेश्याम तिवारी वेतन समाधान सम्बन्धी मामला विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और बी .एच. यू. 'ग्रीवांसकमेटी' के पास भी गया है।पर कहीं भी इनकी सुनवाई नहीं हुई। ये दोनों सज्जन पुरुष शासन -प्रशासन के हर तरह के उपेक्षात्मक रवैये के बवजूद शायद योग साधना के अभ्यासी होने के नाते अब तक निराश नहीं हैं। उन्हें ईश्वरीय न्याय पर ही अब भरोसा है।
ऐसा नहीं कि इनके मामले पर विचार नहीं हुआ है। लेकिन वाह रे! भारत के बाबुओं की मेधा। उनके सामने तो भगवान श्रीकृष्ण की कूटनीतिक बुद्धि भी दंडवत होने के लिए विवश हो जाएगी। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के पूर्व वाइसचांसलर सुधीर जैन ने 11.12. 2024 को एक नोटिस के माध्यम से विश्वविद्यालय के सभी संविदा पर कार्यरत कर्मचारियों के मासिक वेतन पर विचार करते हुए एक आदेश जारी किया।
इस आदेश में स्पष्ट लिखा है कि संविदा के आधार पर असिस्टेंट प्रोफेसर का वेतन 63,000/ टीचिंग असिस्टेंट को 57,000/और डिमांस्ट्रेटरऔर इंस्ट्रक्टर को 54,000/रूपये मासिक वेतन तथा अन्य सुविधाएं प्राप्त होगी। इसके पहले भी बी. एच. यू. में योग इंस्ट्रक्टर का वेतनमान सन् 2018में 40,000/ रूपये स्वीकृत किया गया था। तब से योग इंस्ट्रक्टर का मामला तकनीकी -गैर तकनीकी पेंच में फंसकर अब तक त्रिशंकु की तरह झूल रहा है।
इसके बाद बी. एच. यू. के पूर्व छात्र रहे बलिया (उत्तरप्रदेश) के सांसद वीरेंद्र सिंह 'मस्त' ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को 18 जनवरी 2024 को एक पत्र लिखकर मालवीय योग साधना केन्द्र को महामना मदनमोहन मोहन मालवीय योग संस्थान के रूप में विकसित करने और इस योग संस्थान को सुचारू रूप से चलाने के लिए स्थायी प्रशिक्षकों की नियुक्त करने का आग्रह किया था। प्रधानमंत्री कार्यालय को यह पत्र 24जनवरी 2024 को प्राप्त हुआ।
विश्वस्त सूत्रों से प्राप्त जानकारी के मुताबिक तब विश्वविद्यालय प्रशासन में इस बाबत एक मीटिंग भी हुई।इस मीटिंग इस मामले समेत विश्वविद्यालय में योग का एक पूर्ण फैकल्टी बनाने पर भी चर्चा हुई ।उसके बाद आज तक यह मामला वैसे से ठप पड़ा है। अगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के हवाले से कहें, तो अफसरशाही और विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस मामले को लटकाने , भटकाने और अब ऐसा लग रहा है कि इस मामले को भूल जाने के लिए कोई कोर कसर नहीं छोड़ा है। पर उन्हें यह भ्रम नहीं पालना चाहिए।
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से पढ़ा हर छात्र देश-दुनिया के चाहे जिस किसी कोने में हों, अपने विश्वविद्यालय के संस्थापक भारत रत्न महामना मदनमोहन मालवीय का ऋणी है। उनके प्रागंण में इस तरह के अन्याय को कभी बर्दाश्त नहीं कर सकता।
काशी की यह परंपरा रही है कि अपने अलमस्ती में भले कुछ मामले को कुछ समय के लिए भूल जाए। यह भी सम्भव है कि कुछ समय के लिए भ्रमित हो जाए।पर समय-समय पर सबका हिसाब चुकता करता रहा है बाबा भोलेनाथ की यह नगरी। अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर महामना मदन मोहन मालवीय की बगिया में हो रहे इस घोर अन्याय और शोषण को यहां का कोई अन्तेवासी भला कैसे भूल सकता है?
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