महिला दिवस 2025: शिक्षा की रौशनी से ही संवरेगा महिलाओं का जीवन
सोशल मीडिया में वायरल हुई ऐसी अनेक घटनाएं इस बात की तसदीक करती हैं। जो वैश्विक हैं, हर समाज से संबंधित हैं, उन्हें देख ऐसा लगता है यकीनन समाज बदलाव को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। जीवन इतना सरल और सहज हो सकता है निश्चित तौर पर पूर्व में काल्पनिक बात रही होगी।
सोशल मीडिया में वायरल हुई ऐसी अनेक घटनाएं इस बात की तसदीक करती हैं। जो वैश्विक हैं, हर समाज से संबंधित हैं, उन्हें देख ऐसा लगता है यकीनन समाज बदलाव को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। जीवन इतना सरल और सहज हो सकता है निश्चित तौर पर पूर्व में काल्पनिक बात रही होगी।
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8 मार्च का जश्न यह बखूबी दर्शाता है कि शिक्षा का जादू समाज में असर डाल रहा है। बदलता हुआ समाज, टूटते हुए रिवाज इसका सबसे बड़े उदाहरण है। महिलाओं की शिक्षा से न केवल उनका व्यक्तिगत विकास हुआ है बल्कि समाज और राष्ट्र की तरक्की के लिए सहायक सिद्ध हो रहा है।शिक्षा से सामाजिक परिवर्तन की राह सरल हुई है। सोशल मीडिया में वायरल हुई ऐसी अनेक घटनाएं इस बात की तसदीक करती हैं, जो वैश्विक हैं, हर समाज से संबंधित हैं, उन्हें देख ऐसा लगता है यकीनन समाज बदलाव को अपनाने के लिए पूरी तरह तैयार है। जीवन इतना सरल और सहज हो सकता है निश्चित तौर पर पूर्व में काल्पनिक बात रही होगी।
शिक्षा ने महिलाओं को बनाया आत्मनिर्भर
पाकिस्तान की महिला अजीमा अहसान का तलाक होने पर नाचते गाते हुए जश्न मनाने वाला वीडियो उस सामाजिक दौर से उलट है, जहां तलाक और तलाक के बाद का मुश्किल सफर डरावने ख्वाब की तरह महिलाओं की रातों की नींद खत्म कर देता था। शिक्षा के माध्यम से महिलाएं न सिर्फ आत्मनिर्भर बनने में कामयाब हो रही बल्कि समाज में अपनी पहचान की रचनाकार बन रही हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए शिक्षा से बड़ा उपहार कोई और नहीं हो सकता। शिक्षा समाज बदलती है समाज राष्ट्र और राष्ट्र विश्व को बदलने में रोल मॉडल बन सकते हैं। महिलाओं के श्रम लगभग प्रत्येक क्षेत्र में रहे हैं । यद्यपि इतिहास गवाह है जो परिस्थितियों से नहीं हरा, परिस्थितियां उससे हारी हैं। आज भी संघर्ष की ऐसी अनेक मिसालें हैं जिन्होंने शिक्षा की पगडंडियों को रोशन कर सूरज से नजरे मिलाई हैं।
प्रतीक्षा का स्वीपर से SBI की एजीएम बनने का सफर
ऐसी ही बहादुर महिला हैं पुणे की प्रतीक्षा टोंडवालकर हैं, जिनका शिक्षा के प्रति जुनून देखकर लगता है जैसे ईश्वर भी यकीनन उनके प्रयासों का फल देते हुए बहुत खुश हुआ होगा।
90 के दशक में जब लड़कियों को केवल खत लिखने और पढ़ने की शिक्षा देकर, "हाथ पीले करना" जैसी बड़ी जिम्मेदारी से ज्यादा न समझा जाता था। प्रतीक्षा को महज 7वी तक पढ़ने का मौका मिला और ससुराल से संसार के अनेक रूपों का सामना करना पड़ा। विवाह के बाद कुछ ही दिनों में पति की मृत्यु, नन्हें बेटे की परवरिश, समाज के ताने, आर्थिक तंगी जैसे अनेक रुकावटों और जरूरतों से जूझ एसबीआई में स्वीपर की नौकरी से एसबीआई में एजीएम (Assistant General Manager) की पोस्ट तक पहुंचना और पहुंचकर दुनिया को यह बताना कि मेहनत ही किस्मत के दरवाजे की चाबी है। सपनों में जान डाली जा सकती है, दुनिया में हर चीज संभव है, उन्होंने यह कर दिखाया है। न पैसे, न सपोर्ट, न ही कामयाबी की कोई गारंटी, न कोचिंग,न ही किताबें। उन्हें अपने सपने पूरे करने के लिए पुरानी किताबें भी मयस्सर नहीं थी। रद्दी वाले से किताबों का बंदोबस्त करने वाली प्रतीक्षा टोंडवालकर ने शिक्षा के जरिए एक दिन SBI के AGM की कुर्सी पर बैठने का सपना पूरा किया। उनके संघर्ष को शब्दों में दर्ज कर पाना बहुत मुश्किल है।
मोमबत्ती से पढ़कर आईपीएस इलमा अफरोज ने पाई कामयाबी
ऐसी अनगिनत महिलाओं की प्रेरणादायक कहानियां हमें मालूम ही नहीं जिन्होंने शिक्षा की डोर थामे रखने के लिए अपनी हथेलियों को लहूलुहान किया है लेकिन हार नहीं मानी। उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले की रहने वाली आईपीएस इलमा अफरोज छोटे से शहर से दिल्ली और उच्च शिक्षा के लिए विलायत तक का सफर तय करने वाली भारत की बहादुर बेटी, 14 साल की उम्र में पिता का साया उठ जाने के बाद देश और दुनिया के लिए मिसाल बनी।
मोमबत्ती से पढ़ कर कामयाबी को कायम रखने वाली बेटियों की फेहरिस्त को इलमा और बड़ा करती है। उनका कहना है कि हर महिला, हर बच्ची, हर बेटी दमदार है, कड़क है, भारत की बेटी मजबूत है। उनका यह यकीन शिक्षा को हासिल करने के जुनून के साथ मजबूत और मजबूत होते देखा जा सकता है। इलमा ने इल्म से अनेक लड़कियों के लिए आगे बढ़ते रहने की राह बनाई है।
वर्तमान दौर में शायद ही कोई ऐसा क्षेत्र अछूता रहा है जहां महिलाओं का परचम न लहराया हो। होम मेकर से उद्योग मेकर तक महिला शक्ति सरकारी और गैर सरकारी संस्थाओं के साथ जुड़ कर अपनी भूमिका को दर्ज करा रही हैं। साथ ही हर रोज नए उदाहरणों के साथ चुनौतियों से निपटने में सक्षम हुए हैं। बेटियां केवल जिम्मेदारी नहीं होती, वक्त पड़ने पर मजबूत कंधा भी होती, ठंडी छांव भी होती हैं, कड़क धूप भी होती हैं। 8 मार्च का जश्न यह दिखाता है कि महिलाओं के प्रति समाज का सकारात्मक व्यवहार, बदलाव का यह दौर शिक्षा से ही संभव है।
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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।