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किसानों की समस्या विश्वव्यापी: जरूरत है वैश्विक किसान संगठन की

Wed, 15 Dec 2021 02:12 PM IST
Gautam Chaudhary गौतम चौधरी
Updated Wed, 15 Dec 2021 02:12 PM IST
सार

कृषि समस्याओं को लेकर पूरी दुनिया के किसानों को एक मंच पर आने की भी जरूरत है क्योंकि यह संकट केवल एक राजनीतिक या प्रशासनिक क्षेत्रीय इकाई की नहीं है अपितु पूरी दुनिया के अन्नदाता के अस्तित्व की चुनौतियों से जुड़ा हुआ है।

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International farmers organization the need of this organization is important for raising the issue of farmer's problem globally
कृषि समस्याओं को लेकर पूरी दुनिया के किसानों को एक मंच पर आने की भी जरूरत है - फोटो : Istock

विस्तार

विगत दिनों एकाएक भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक सार्वजनिक मंच से कृषि सेक्टर से संबद्ध उन तीनों कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर दी, जिससे पूरे देश भर में बवाल मचा हुआ था।

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संसद के चालू शीतकालीन सत्र में ध्वनिमत से कृषि कानून को वापस लेने का प्रस्ताव भी परित कर दिया गया है। लेकिन ऐसा क्यों हुआ, अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे किसानों को आतंकवादी, चरमपंथी, देशद्रोही एवं विकास विरोधी बताने वाले एकदम से पीछे क्यों झांकने लगे?
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ऐसा क्या हुआ कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और उनके साथ खड़ा समूह बिना किसी शोर के रातों-रात आन्दोलनरत किसानों का हिमायती बन गया?

दरअसल, इन प्रश्नों पर अलग से विमर्श की जरूरत है लेकिन फिलहाल भारत में मिली किसानों को इस सफलता को वैश्विक रूप देने की जरूरत है। मसलन यह केवल भारत के किसानों की जीत नहीं है अपितु दुनिया के अन्नदाताओं की जीत है और इस जीत का जश्न पूरी दुनिया में मनाया जाना चाहिए, ऐसा प्रचार करने की जरूरत है।
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कृषि समस्याओं को लेकर पूरी दुनिया के किसानों को एक मंच पर आने की भी जरूरत है क्योंकि यह संकट केवल एक राजनीतिक या प्रशासनिक क्षेत्रीय इकाई की नहीं है अपितु पूरी दुनिया के अन्नदाता के अस्तित्व की चुनौतियों से जुड़ा हुआ है। विगत् कुछ वर्षों में पाकिस्तान, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया, लैटीन अमेरिकी देश, चीन, तुर्की, मिस्र, म्यामार, अफ्रीका के अन्य देशों में व्यापक किसान आन्दोलन देखने को मिले हैं।


भारत सहित तमाम देशों में किसानों के साथ एक जैसी समस्या ने उन्हें आन्दोलन के लिए प्रेरित किया। इसलिए अब एक ऐसे मंच की आवश्यकता महसूस हो रही है, जो विश्वव्यापी किसान समस्याओं को लेकर चिंतन, मंथन और आंदोलन की रूपरेखा तैयार करे, साथ ही किसानों की समस्याओं को हल करने में अपनी भूमिका भी सुनिश्चित करे।

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भारत में 80 करोड़ लोगों को सरकार के द्वारा भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। दुनिया के सभी देशों में इस प्रकार की व्यवस्था खड़ी की गई है। - फोटो : Istock

दुनियाभर के किसानों की हालत समझना होगा 

सच पूछिए तो विश्वव्यापी किसान समस्याओं के लिए विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोश जैसी वैश्विक वित्तीय संस्थाएं जिम्मेदार है, जो कथित रूप से दुनिया में कल्याणकारी योजनाएं बनाती हैं और उसके माध्यम से खाद्यान्नों का उपयोग हथियार के रूप में कर रही हैं।

केवल भारत में 80 करोड़ लोगों को सरकार के द्वारा भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। दुनिया के सभी देशों में इस प्रकार की व्यवस्था खड़ी की गई है। सरकार अपने स्तर पर लोगों को अन्न उपलब्ध करा रही है। यह ऐसे ही नहीं हो रहा है। इसके पीछे दुनियाभर में काम करने वाली वित्तीय संस्थाएं योजनाबद्ध तरीके से लगी हुई हैं।

किसी भी सरकार को अपने नागरिकों को भोजन उपलब्ध कराने के लिए सस्ते अनाज की जरूरत पड़ती है। यही कारण है कि सरकार अनाजों का समर्थन मूल्य जारी करती है। यहां तक तो बहुत अच्छा लगता है लेकिन इसके पीछे का जो खेल है वह बहुत खतरनाक है। दुनिया की सरकारें और सरकार समर्थित मीडिया कृषि उत्पाद में लागत मूल्य की तुलना समर्थन मूल्य से नहीं करना चाहती हैं।

हां, उत्पाद बढ़ाने की दिशा में जबरदस्त प्रचार किया जाता है। यदि रासायनिक खाद, बीज, पानी, जुताई, कृषि श्रम, कीटनाशक आदि का कुल योग किया जाए तो किसानों को समर्थन मूल्य के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं होता है। उसी स्थान पर जैसे ही कृर्षि उत्पाद बाजार या फिर कारखानों के माध्यम से उपभोक्ता तक पहुंचता है तो उसका मूल्य खेत उत्पाद मूल्य की तुलना में तीन गुणा तक बढ़ जाता है। सरकारें नहीं चाहती हैं कि कृषि उत्पाद की कीमत बढ़े लेकिन औद्योगिक उत्पाद पर सरकार का कोई नियंत्रण ही नहीं होता है।

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अपने आप को सम्पन्न बताने वाले देश, किसान और कृषि मजदूरों के कल्याण के मामले में उतने ही पिछड़े हैं, जितने अन्य गरीब देश। - फोटो : Istock

इसके लिए किसानों को कुर्बान किया जा रहा है क्योंकि विश्व बैंक की अघोषित रणनीति है कि दुनिया के किसी भी भाग में आम लोगों को यदि खाना नहीं मिलेगा तो वहां अशांति होगी और वह अशांति अंततोगत्वा विश्व पूंजी के लिए खतरा पैदा करेगा। फिर विश्व स्तर पर जो शोषण के साम्राज्य विकसित हो रखे हैं उसकी दुकानदारी बंद हो जाएगी और इसके लिए अन्नदाताओं को बली का बकरा बनाया जा रहा है।

याद रखिए साम्राज्यवादी शक्तियां किसानों के शोषण पर ही आधारित होती रही हैं। यह ढ़हता भी तब है जब साम्राज्यवाद के खिलाफ किसान लामबंद हो जाते हैं। इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं। खासकर भारत में तो इसके उदाहरण हैं ही। मुगल और अंग्रजों को धूल चटाने में किसानों ने बड़ी भूमिका निभाई है।  

दुनिया के मानव विकास पर आधारित आंकड़ों की सकारात्मक व्याख्या से एक बात साफ हो गई है कि अपने आप को सम्पन्न बताने वाले देश, किसान और कृषि मजदूरों के कल्याण के मामले में उतने ही पिछड़े हैं, जितने अन्य गरीब देश। चाहे वे गरीब देश हों या अमीर, वहां के किसान और खेतिहर मजदूरों की स्थिति लगभग एक जैसी है। यानी भारत-पाकिस्तान के कपास उत्पादक किसानों की तुलना में बहुत बेहतर स्थिति संयुक्त राज्य अमेरिका के सचमुच के कपास उत्पादकों की भी नहीं है।

कृषि और कृषक समस्याओं को लेकर आए दिन वहां भी आन्दोलन होते रहते हैं। मतलब साफ है कि किसानों की समस्या विश्वव्यापी है। यह समस्या साम्राज्यवादी ताकतों के द्वारा अपने हितों के लिए खड़ी की गई है। इसके समाधान के लिए किसानों का एक वैश्विक मंच होना चाहिए, जो बिना किसी पूर्वाग्रह के दुनिया के किसानों के कल्याण की चिंता करे।


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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