पक्षियों का इंजीनियर बुनकर, बया पक्षी
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हल्के पीले रंग का बया या बुनकर प्रजाति का यह नन्हा सा पक्षी, घास के छोटे-छोटे तिनको और पत्तियों को बुनकर लालटेन की तरह लटकता बेहद ही खुबसूरत घोंसले का निर्माण करता है इसलिए इसे बुनकर पक्षी और ट्रेलर बर्ड भी कहा जाता है, इसी कुशलता के कारण इन्हें पक्षियों का इंजीनियर कहा जाना तनिक भी गलत न होगा। बया प्रजाति के पक्षी पूरे भारतीय उपमहादीप और दक्षिण पूर्वी एशिया में देखने को मिलते है।
बया प्रजाति के पक्षी अधिकतर अपना घोंसला नहर,नदी और नालो के किनारों के आसपास पाई जाने वाली कंटीली झाड़ियो और पेड़ो में तैयार करते हैं।, इन झाड़ियो में एक साथ कई उल्टे लटकते सुंदर घोंसले देखने को मिलते है।
बया प्रजाति में आशियाना नर पक्षी के द्वारा तैयार किया जाता है और मादा बया इसका निरीक्षण कर इसे पसंद करती है यदि यह घोंसला उसे पसंद नहीं आता है तो नर पक्षी के द्वारा फिर से नए घोंसले का निर्माण करना होता है।
बया अपना घोंसला इस तरह से तैयार करती है जिससे कि वह अपने अन्डो और बच्चो को शत्रुओं, परभक्षियोों और मौसमी प्रभावों से सुरक्षित रख सके घोसलों में तिनको की एक महीन परत सुरक्षा के लिए तैयार करती है।
ऐसा कहा जाता है की जब एक पक्षी भोजन या अन्य कार्य के लिए बाहर जाता है तो दूसरा पक्षी वही पास में बैठकर चौकीदार की तरह घर की सुरक्षा की जिम्मेदारी सम्हालता है,यदि कोई खतरे का आभास होता है तो यह ची-ची की आवाज करके सभी पक्षियों को सचेत कर देता है।
बया पक्षी के घोसलो में दो कक्ष होते हैं जिसमे एक अंडा और दूसरा शयन कक्ष होता है, घोंसले का दरवाजा नीचे की तरफ खुलता है जिसमे एक अथवा कभी-कभी दो दरवाजे भी होते हैंं।
सामाजिक पक्षी होने के कारण इस प्रजाति में अनेको घोंसले एक साथ पेड और कंटीली झाड़ियो पर देखने को मिलेगे।
बया पक्षी अकेला अपना घोसला नहीं बनाते अपितु एक साथ अनेको घोसलों का निर्माण समूह में करते है और एक बस्ती की तरह रहने के स्थान को आबाद करते है।
बया पक्षी को अपना घोंसला तैयार करने में 28 दिन का समय लगता है। बया पक्षी द्वारा घोंसला छोड़ने के पश्चात अन्य पक्षियों द्वारा इनके घोसलों को उपयोग में ले लिया जाता है।
यह एक सामाजिक परिंदा है जो गोरैया और इन्सान की बस्तियों की तरह अपने घरो का निर्माण बड़ी ही कुशलता से करते है।
यह पक्षी कीट पतंगों और मोटे अनाजो को खाता है और झुण्ड में हमें यह खेत,नहर नदी नालो के आसपास दिखाई देते है, यदि हम नहर के आसपास लगे कंटीली झाड़ियो पर नजर डालते तो हमें कई सुंदर घोंसले और इन नन्हे परिंदों की ची-ची करती आवाज हमें रुकने के लिए मजबूर करती है। बया का प्रजनन काल मानसून का समय होता है इसी समय नर बया पक्षी के द्वारा घोसलों का निर्माण किया जाता है और मादा बया पक्षी द्वारा इनका चयन किया जाता है, मधुर आवाज निकालकर और पंखो को हिलाकर नर पक्षी द्वारा मादा को आकर्षित और रिझाने का कार्य किया जाता है।
एक समय था जब इन पक्षियों की चहचाहट बहुत अधिक सुनाई देती थी और इनके दीदार खेत खलिहानों और नदी नालो के पास आसानी से हो जाते थे लेकिन अब बहुत ही कम देखने को मिलते है, आज यह पक्षी संकट की घड़ी से गुजर रहा है क्योकि इन्हें रहने के लिए अब सुरक्षित स्थानों की कमी हो गई है और इनके घोंसले सिर्फ सुन्दरता के लिए घरो में लटकाए जा रहे है।
आलेख: आनंद पटेल. विगत 15 वर्षो से पर्यावरण और जैवविविधता संरक्षण में संलग्न. शिक्षा: स्नातकोतर (पर्यावरण विज्ञान). पूर्व में कार्यरत विश्व प्रकृति निधि भारत-मध्यप्रदेश, एप्को भोपाल.
यह श्रंखला 'नेचर कन्ज़र्वेशन फाउंडेशन (NCF)' द्वारा चालित 'नेचर कम्युनिकेशन्स' कार्यक्रम की एक पहल है। इस का उद्देश्य भारतीय भाषाओं में प्रकृति से सम्बंधित लेखन को प्रोत्साहित करना है। यदि आप प्रकृति या पक्षियों के बारे में लिखने में रुचि रखते हैं तो ncf-india से संपर्क करें।