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Information Warfare: पोस्ट ट्रुथ का युग और इंफोर्मेशन वॉर, युद्ध के इस बदलते परिदृश्य में कहां खड़ा है भारत

Thu, 06 Oct 2022 11:40 AM IST
Sankalp Singh संकल्प सिंह
Updated Thu, 06 Oct 2022 11:40 AM IST
सार

इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि हर एक बड़ी खोज के साथ नई जंग की शुरुआत हुई। कांस्य युग ने हमें कुल्हाड़ी और तलवार दिया, लौह युग ने हमेें तोप और बंदूखें दीं। वहीं अब इंफोर्मेेशन के इस युग ने एक बेहद ही नए किस्म के हथियारों को जन्म दिया है। गौरतलब बात है कि इंफोर्मेशन को तलवार, तोप और बंदूख की तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। इंफोर्मेशन का संसार बहुत बड़ा है।

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Information Warfare in The Age of Post Truth
डाटा और इंफोर्मेशन को डिस्टॉर्ट करके बड़े-बड़े युद्धों की दिशा को बदला जा रहा है। - फोटो : Istock

विस्तार

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान हिटलर ने कहा था - "Demoralize The Enemy From Within By Surprise, Terror, Sabotage, Assassination. This is The War of The Future". - "दुश्मनों को मानसिक रूप से हतोत्साहित कर देना ही भविष्य का युद्ध है।"  आज के दौर में जब दुनिया चौथी ओद्योगिक क्रांति में प्रवेश कर चुकी है। ऐसे में दुश्मन देशों को हतोत्साहित करने से लेकर उनको कई अहम मोर्चों पर पीछे करने के लिए इंफोर्मेशन एक बड़ा हथियार बन चुका है। 

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ये सूचना क्रांति का दौर है। सूचना क्रांति ने पूरे विश्व की रूपरेखा बदलने में एक बड़ी भूमिका निभाई है। इसके आने के बाद दुनिया अब दुनिया न होकर एक वैश्विक गांव में तब्दील हो चुकी है। वैश्वीकरण के इस दौर में डाटा ने पूरी दुनिया को एक सूत्र में बांधने का काम किया है। ऐसे में इस दौर को इंफोर्मेशन बूम की संज्ञा देना गलत नहीं होगा। क्लाइव हंबी के शब्दों में कहें, तो आज के समय डाटा न्यू ऑयल है।
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वर्तमान समय में डाटा और इंफोर्मेशन का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर ट्रेंड्स और पैटर्न्स को समझने से लेकर किसी घटना के क्या परिणाम हो सकते हैं उसको रेंडर करने में किया जा रहा है। यही नहीं डाटा और इंफोर्मेशन को डिस्टॉर्ट करके बड़े-बड़े युद्धों की दिशा को बदला जा रहा है।
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आज के इस युग में जहां सेनाएं, सरकारें और अर्थव्यवस्थाएं एक पेंचीदा ग्लोबल इंफोर्मेशन सिस्टम पर निर्भर हैं। उसमें किसी महाशक्ति को बिना किसी हथियार और बम बारूद के केवल इंफोर्मेशन के दम पर हराया जा सकता है। आज इंफोर्मेशन एक हथियार बन चुका है। इस हथियार के सहारे किसी भी सुपरपावर के किले को पल भर में ढहाया जा सकता है।

वर्तमान समय में अमेरिका, ब्रिटेन, चीन या किसी दूसरी महाशक्ति को चलाने में हाई स्पीड डिजिटल कम्यूनिकेशन सिस्टम एक बड़ी भूमिका निभा रहा है। सोचिए जरा, अगर कोई देश साइबर अटैक के जरिए इन देशों के हाई स्पीड डिजिटल कम्यूनिकेशन सिस्टम में सेंध लगा दे तो क्या होगा?

आज जो मशीनें (Internet, GPS, Social Media, Digital Transaction, Airspace etc) हमें कनेक्ट रख रही हैं। वो एक सिक्रोनाइज्ड टाइम जोन पर निर्भर हैं। ये मशीनें इंटरनेट टाइम सर्विस के जरिए ही एक दूसरे के साथ जुड़ी हैं। इन्हीं के माध्यम से इलेक्ट्रिक पावर ग्रिड, टेलीकम्यूनिकेशन नेटवर्क, फाइनेंशियल ट्रांजैक्शन और ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम को नियंत्रित किया जा रहा है।

अगर इंटरनेशनल टाइम सर्विस में ही छेड़-छाड़ कर दी जाए तो...? इससे पूरी दुनिया की स्थिरता संकट में आ सकती है। एयरस्पेश, जीपीएस, सैटेलाइट पोजिशनिंग सिस्टम, इंटरनेट से लेकर पूरे देश का इंफ्रास्ट्रक्चर तक ढह सकता है। 

Information Warfare in The Age of Post Truth
सत्य हमारे विचारों से स्वतंत्र है। इसका अस्तित्व हमेशा हमारे बीच रहेगा भले ही इस पर किसी को विश्वास न हो। - फोटो : Istock

इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि हर एक बड़ी खोज के साथ एक नई जंग की शुरुआत हुई। कांस्य युग ने हमें कुल्हाड़ी और तलवार दिया, लौह युग ने हमेें तोप और बंदूखें दीं। वहीं अब इंफोर्मेेशन के इस युग ने एक बेहद ही नए किस्म के हथियारों को जन्म दिया है। गौरतलब बात है कि इंफोर्मेशन को तलवार, तोप और बंदूख की तरह नियंत्रित नहीं किया जा सकता है। इंफोर्मेशन का संसार बहुत बड़ा है।

महान युनानी दार्शनिक प्लेटो ने कहा था - "सत्य हमारे विचारों से स्वतंत्र है। इसका अस्तित्व हमेशा हमारे बीच रहेगा भले ही इस पर किसी को विश्वास न हो।"

आज हम एक पोस्ट ट्रुथ युग में जी रहे हैं। साल 2016 में ऑक्सफॉर्ड डिक्शनरी ने इस शब्द को वर्ड ऑफ द ईयर बताया। पोस्ट ट्रुथ सच और झूठ दोनों के बीच का एक ऐसा क्षेत्र है, जहां तथ्यात्मक जानकारी की बजाए भावनाओं और विश्वास से लोगों को प्रभावित किया जा रहा है।

आज के समय इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट, इंटरनेट , न्यू मीडिया का इस्तेमाल करके लोगों के विश्वास और भावनाओं को मेनुप्लेट किया जा रहा है। लोगों के बीच सच का एक भ्रामक रूप परोसा जा रहा है। राजनीतिक हित साधने से लेकर युद्धों की दिशा बदलने में डाटा और इंफोर्मेशन एक बड़ी भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में ये कहना गलत नहीं होगा कि पोस्ट ट्रुथ इंफोर्मेंशन वॉर का एक हिस्सा बन चुका है। इसका जीता जागता उदाहरण रूस-युक्रेन युद्ध है। 

रूस और वेस्टर्न ब्लॉक की मीडिया अपने-अपने हितों को देखते हुए युद्ध को लेकर नैरेटिव चला रही हैं। एक तरफ यूक्रेन के मुताबिक रूस के 60 हजार से ज्यादा सैनिक इस युद्ध में मारे जा चुके हैं। वहीं रूस का दावा है कि यूक्रेन के साथ युद्ध में उसके केवल कुछ ही सैनिक मारे गए हैं।

युक्रेन का दावा है कि उसने रूस के 2300 से ज्यादा जंगी टैंकों को ध्वस्त कर दिया है। वहीं रूस के दावे की तस्वीर इससे बिल्कुल भिन्न है। ऐसे न जाने कितने आंकड़ें और युद्ध से जुड़ी तस्वीरें हैं, जिन्हें ये देश अपने-अपने सच का मुल्लमा चढ़ाकर दुनिया के समक्ष प्रस्तुत कर रहे हैं।    

दोनों ही देश मैदान में युद्ध लड़ने के अलावा एक युद्ध और लड़ रहे हैं। ये युद्ध इंफोर्मेशन के स्तर पर लड़ा जा रहा है। सच कहूं, तो रूस और युक्रेन के बीच चल रही इंफोर्मेशन वॉरफेयर ज्यादा प्रभावशाली है बजाए मैदान में चल रहे युद्ध से। क्योंकि युद्ध का ये स्वरूप सीधे दुश्मन देश के मनोबल पर हमला करता है।

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सूचना के इस दौर में जहां डाटा एक बड़ा हथियार बन चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारा भारत इस दिशा में कहां खड़ा है। - फोटो : Istock

इंफोर्मेशन वॉर कोई नई टर्म नहीं है और न ही ये हाल फिलहाल में शुरू हुई है। दूसरे विश्व युद्ध के समय हिटलर की नाजी सेना बेहद ही अलग ढंग से इंफोर्मेशन वॉरफेयर का इस्तेमाल करती थी। इस दौरान जब अमेरिकी सेना धीरे-धीरे जर्मनी की ओर कूंच कर रही थी। उस दौरान उन्हें रास्तों पर नाजी सेना द्वारा फेके गए पत्र मिला करते थे। इन पत्रों पर सैनिकों को उनके परिवार और बेहतर जिंदगी के नाम पर वापस अमेरिका लौट जाने की बात लिखी होती थी। 

इसके अलावा जो अफ्रीकन अमेरिकन, अमेरिका की तरफ से लड़ाई लड़ रहे थे। उनको नस्लवाद के नाम पर युद्ध से पीछे हट जाने की बात कही गई होती थी। नाजी सेना इस तरह के कई माइंड गेम से दुश्मन देश के सैनिकों के हतोत्साहित करने का काम करती थी। वहीं आज के इंफोर्मेशन युग में जहां सूचना ही सब कुछ है।

ऐसे में डाटा के बल पर ही युद्ध लड़ा जा रहा है। अमेरिका का डिपार्टमेंट ऑप डीफेंस पेंटागन में अमेरिका के हर एक कदम और उससे संभावित परिणामों को पहले रेंडर किया जाता है। उसके बाद ही कोई निर्णय लिया जाता है। 

सूचना के इस दौर में जहां डाटा एक बड़ा हथियार बन चुका है। ऐसे में सवाल उठता है कि हमारा भारत इस दिशा में कहां खड़ा है। हाल ही में पिछले साल भारत और चीनी सैनिकों के बीच मुझभेड़ हुई थी। रूस और अमेरिकन मीडिया रिपोर्ट्स ने ऑन रिकॉर्ड बताया था कि इस मुठभेड़ में चीन के 40 से ज्यादा सैनिक मारे गए। 

वहीं दूसरी तरफ चीन ने इन सभी रिपोर्ट्स को नकारते हुए केवल चार सैनिक मारे जाने का दावा किया। इसके अलावा उसने सोशल मीडिया पर ऐसे वीडियो और तस्वीरें जारी की, जिनमें मारे गए चारों सैनिकों को श्रद्धांजली देते हुए दिखाया गया। इनमें से कुछ वीडियो ऐसे थे, जिनमें चीनी सैनिक मजबूत स्थिति में दिख रहे थे। गौरतलब बात है कि ये वीडियो काफी हाई क्वालिटी और राष्ट्रवादी भावना को ओतप्रोत करने वाले म्यूजिक के साथ जारी किए गए थे।

वहीं दूसरी तरफ इस मुठभेड़ में मजबूत पक्ष होने के बाद भी इंफोर्मेशन के स्तर हमने कोई ऐसा वीडियो जारी नहीं किया, जिनमें हमारे सैनिक मजबूती के साथ लड़ते हुए दिखाई दे रहे हों। एक वाक्य में कहें, तो इंफोर्मेशन के स्तर पर युद्ध लड़ने के मामले मेें हम अभी भी बाकी देशों की अपेक्षा काफी पीछे हैं। चीन ने वास्तविक युद्ध न करके भारत पर मानसिक दबाव बनाने के लिए डोकलाम विवाद क्षेणा। इस पूरे घटनाक्रम में भारत का बिलियंस ऑफ डॉलर का घाटा सैन्य लॉजिस्टिक सप्लाई चेन को इधर से उधर करने में हुआ।   

ऐसे में हमारे आज केे भारत को युद्ध के इस बदलते स्वरूप को समझने की जरूरत है। अब युद्ध अपनेे पारंपरिक स्वरूप से काफी आगे आ चुका है। मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ युद्ध ने भी अपना विकास किया है। अब हम पांचवी वॉर जनरेशन में कदम रखने जा रहे हैं, जहां साइबर अटैक केे जरिए युद्धों को लड़ा जाएगा। भारत को इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की जरूरत है, क्योंकि युद्ध के इस स्वरूप में बिना कुछ गवाए काफी कुछ पाने की संभावना है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदाई नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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