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मैं उस तीसरे गांव में रहता था जिनकी कहानियां अलग थीं और जो अलग होकर भी एक थे

Mon, 08 Apr 2019 12:58 PM IST
राजीव रंजन राजीव रंजन
राजीव रंजन Published by: राजीव रंजन Updated Mon, 08 Apr 2019 12:58 PM IST
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मैं उस तीसरे गांव का आदमी हूं जो सबसे अलग है। - फोटो : shutterstock

जेठ-बैशाख की नीम दुपहरिया में मेरा गांव गपिया रहा है। खटिया पर उठकर, सुर्ती मलते हुए, खैनी से भरे हुए लार वाले मुंह को आगे कर पिच्च से थूकते हुए या फिर ताश के पत्ते फेंटते हुए मेरा गांव गपिया रहा है। गांव के पूरब पुरनका पोखरा के भीटे पर, लाला जी के बैठका में, पंडी जी के दुआर पर, बाबा के बरगद के नीचे या दक्खिन टोला की नीम के तले जगह-जगह, जहां भी ढरकने की, बिलमने की, घड़ी-आध घड़ी टेक लेने की जगह है, वहां टिककर मेरा गांव गपिया रहा है। कोई ताश फेंट रहा है, कोई ताश बांट रहा है, कोई बाजी समेट कर उत्साह से सीना चौड़ा कर रहा है और कोई केवल और केवल गपिया रहा है। किसी के पास कहकहे हैं तो किसी के पास अपने रोजमर्रा की बातें, किसी के पास बेटे बहू की कहानियां तो किसी के कूल्हे या घुटने के दर्द और किसी के पास डांड़-मेढ़, गोतिया-दायाद और भाई-बंधु। सबके पास वक्ता हैं, सबके पास श्रोता हैं और सबके पास अपनी-अपनी कहानियां हैं। सब उसे कहने और सुनने में मशगूल हैं।

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इस गपियाते हुए गांव के पीछे भी एक गांव है। वह दरवाजे के पल्ले भिड़ाकर घर में उठंघा हुआ है। वह दो पहरों की आपाधापी के बाद अब थोड़ा सुस्ता लेना चाहता है। घर-बासन, चूल्हा-चौका और लड़के-बच्चे के बाद अपने लिए थोड़ा-सा समय निकाल लेना चाहता है। गप्प उसे भी पसंद है। वह भी गपियाना चाहता है, लेकिन इस चिपचिपाती हुई दोपहर में सोए हुए बच्चे को भला कैसे जागा सकता है ? उसके पंखा झलते हुए हाथों में दर्द होने लगा है, लेकिन बच्चा! पंखे के रुकते ही कुनमुना उठता है। फुसफुसा कर बतियाते हुए भी उसके जगने का डर उसे बोलने नहीं देता। थकान से आंखें झपक रही हैं लेकिन बच्चे की कुनमुनाहट उसे फिर सचेष्ट कर देती है और वह नींद की शिथिलता में हाथ से छूटे पंखे को फिर संभालकर और तेजी से झलने लगता है।

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गांव की स्मृतियां उनकीसमस्याओं के साथ आज भी जीवंत हैं। - फोटो : फाइल फोटो

इन दोनों से अलग एक तीसरा गांव भी है। उस गांव के पांव दुपहरिया से बहुत पहले ही गांव की चौहद्दी और सिवान को पारकर सड़क पर जा टिकते हैं। किसी चाय की दुकान के जलते टप्पर या छान के नीचे धूनी रमाए वह अनंत ज्ञान साधना में लीन हैं। वह दुनिया-जहां की हर बात जानता है, हर क्षेत्र में दखल रखता है। वह अपना दुक्खम-सुक्खम नहीं बतियाता। गांव-जवार की तो उसे फुरसत ही नहीं। वह राष्ट्रनीति का व्याख्याता है, विदेशनीति का परम आचार्य है और ज्ञान-विज्ञान की नाना शाखाओं का प्रकांड पंडित। जो उसकी जद में नहीं है, वह ज्ञान-विज्ञान की किसी दूसरी शाखा-प्रशाखा में भी नहीं है। वह महाअवधूत है। श्मशान-सी सुनसान सड़क के किनारे बैठ पूरी दुपहरिया ज्ञान-साधना करता है। दुपहरिया ही क्यों तिझरिया और शाम, बल्की देर रात; जब तक कि कालभैरव का महाप्रसाद पा स्वयं महाभैरव न हो जाय और उसके मुंह से मोहन,उच्चाटन और मारण के मंत्रों का भैरव नाद न होने लगे, तब तक निरंतर यह मसान उससे सेवित ही रहता है। 

पहला गांव मेरे बचपन के साथ विदा हो गया और दूसरा बंद किवाड़ों के भीतर बंद। कभी-कभी उससे उठती सिसकियां, गाली-गलौज के स्वर या कभी-कभार मंगलगान की मधुर आवाजों से अधिक उस गांव की परिधि में प्रवेश की अनुमति घर के बाहरी आदमी को नहीं है। वह तो दरवाजे पर खड़ा होकर आवाज दे सकता है। उस आवाज का जवाब भी पहले या तीसरे गांव का आदमी ही देगा, दूसरे गाँव ने तो सनातन चुप्पी साध रखी है; ऐसा लगता है गोया वह जबान हिलाना ही नहीं जानता। वह जन्मजात गूंगा और बहरा है। या फिर, उसकी जबान पहले या तीसरे के पास गिरवी है और उसीके कर्ज की रोटी खा कर सूद में पहले या दूसरे गांव की पौध तैयार कर रही है। हां, कभी-कभी भूलवश किसी ‘खेझरा’धान का बीज इस्तेमाल कर लेने से नर्सरी में दूसरे गांव की पौध भी तैयार हो जाती है। समझदार किसान उसे रोपाई से पहले ही छांट देता है। जब ऐसा नहीं होता तो समझदारी इसी में है कि उसे समय से पहले काट-पीट कर गोदाम में रख दो, नहीं तो झरंगा की तरह वह जल्दी पककर झड़ जाएगी और किसान हाथ मलता रहा जाएगा खेत और किसान का हर्जा करेगा सो अलग।

बहरहाल, मैं तीसरे गांव का आदमी हूं। इसलिए उसी की बात करूंगा। मेरी ये बहकी-बहकी बातें सुनकर आप पूछ सकते हैं मेरे इस गांव का नाम क्या है ? गांव ! कोई भी हो सकता है। मेरा, आपका, इनका, उनका। किसी का भी। अजी, छोड़िए भी क्या फर्क पड़ता है ? किसी का हो। कहीं का हो। पते की जरूरत डाक पहुंचने तक है। जब यह डाक आप तक पहुंच ही जाएगी तो पते की भला क्या जरूरत। लिफाफे और मजमून तो खिलंदड़ों के भांपने के लिए होते हैं। अपन को न खिलंदड़ी आती है और न खिलंदड़ों से वास्ता ठहरा। अपन तो ठहरे ठेठ गंवई आदमी। जैसा मेरा गांव वैसा आपका। वैसा ही इनका और उनका भी।

सुबह उठाकर दिशा-फरागत, खैनी-गुटखा और सांझा को ठर्रा। बीच का दौर झक्क उज्जर नील-टिनोपाल पड़े कुर्ते, चाय की चुस्कियों और आग के गोलों की तरह उछलती बहसों का। भला जेठ की दुपहरिया की धूप में वह ताप कहाँ जो इन आग के गोलों में है। अमेरिका की बड़ी-बड़ी मिसाइलें हों या चीन और रूस के आणविक हथियार सब उसके ताप में गलकर तरल और कभी-कभी हवा भी हो जा रहे हैं। बीच-बीच में पान की पिच्च और ताम्बूल रंजीत ठहाकों के कहने ही क्या ? वे तो संक्रामक रोग की तरह गांव के एक ताश अड्डे से दूसरे ताश अड्डे और एक नुक्कड़ से दूसरे नुक्कड़ तक हवा में तैर रहे हैं। यह बात अलग है कि इस घोर दुपहरिया में हवा भी पेड़ों की छांव में दुबक जाती है, अन्यथा यह बीमारी डेंगू चिकनगुनिया आदि-आदि से अधिक तेजी से पूरी दुनिया में फैल गई होती।



 

यह तीसरा गांव पहले और दूसरे से अधिक पढ़ा लिखा और हुशियार है। अखबार बांच सकता है, देश जहान की बातें कर सकता है, बात-बात में देश की राजनीति, विदेशनीति और युद्ध-नीति पर बहसें कर सकता है,चौराहे पर बैठा-बैठा चाय की चुस्की लेते हुए सीरिया-लेबनान तक टहल कर आ सकता है, (कभी-कभार मंगल और चंद्रमा तक भी उड़ाने भर सकता है, लेकिन उसके लिए एनर्जी ज्यादा लगती है), गांव-घर की मरनी-जियानी से लेकर दुनिया जहां की बातें कर सकता है। और तो और, सामने वाले से कमतर महसूस होते ही दूसरी सूचनाओं की जगह अपनी डिगरियां गिनाकर सामने वाले पर धौंस दिखा सकता है। लब्बोलुआब यह, वह दुनिया में कोई भी करणीय और अकरणीय काम कर सकता है; सिवाय एक काम, घर में दो जून की रोटी के इंतज़ाम के। सानी-पानी, फावड़ा-कुदाल चलाना कौन कहे ? खेत की डाँड-मेढ़ तक उसके लिए अछूत हैं। 

देश-दुनिया में अस्पृश्यता भले कम हुई हो, उसे क्या ? उसके लिए तो ये सब सनातन अस्पृश्य चीजें हैं। भला, सारी पढ़ाई-लिखाई या कलम घिसाई इसी की खातिर की थी! नहीं न ! फिर ! खेती रही होगी बाप दादों के लिए उत्तम चीज, पर उसके लिए वह अपमानजनक है। खेतिहर भी क्या कोई मनुष्य होता है; दिनभर खेत में घिसाई और रात को मौसम की चिंता में उनींदी आंखें। सो खेती से उसका भावह-भसुर का रिश्ता है। कभी गाहे-बगाहे कुछ कर-करा भी दिया तो पूरा गांव-गिरांव जान जाएगा कि आज फलाने बाबू रोपनी के खेत की मेंड़ पर खड़े बनिहारिन ताड़ रहे थे या अलाने बाबू खलिहान में ओसावन करने वाले बनिहार के आगे बोरे का मुंह खोल कर खड़े थे और चार बोरे के बाद पांचवें में ऑस्ट्रेलिया-भारत का मैच देखने चले गए थे। पर, गाँव की खबरनवीसों को इस तरह की सुर्खियां बनाने का मौका कम ही मिलता था, अक्सर सुर्खियों में हमारे दूसरे कारनामे ही होते,जिनके नाम तो बदल जाते पर प्रकृति वही रहती।

इन सुर्खियों को बनाने वाले, बांचने वाले और फिर इसपर गलचौर करने वाले भी हमारे ही गांव के वासी थे। हमारे यानी तीसरे गांव के। पहले गांव ने हमें पहले ही बहिष्कृत कर रखा था। सच तो यह है कि हमीं उन्हें अपने स्तर का नहीं मानते। इसलिए सबेरे-सबेरे ही सविनय अवज्ञा के साथ चौराहे पर निकाल आते। उनसे तो अपना साबका तभी पड़ता जब कोई किसान-क्रेडिट कार्ड या सरकारी लोन की वसूली-तसूली के लिए दरवाजे पर बैन का आदमी आ पहुंचता और पहले गांव का आदमी लाठी टेकते-टेकते हमारे तीसरे गांव में आ धमकता। वह आदमी भी हममें से किसी एक का रिश्तेदार होता। उसे दूर से देखते है उसका संबंधी दिशा मैदान या बहस मुसाहिबा के लिए कहीं निकाल लेता और तक दुबारा दर्शन नहीं देता जब तक वे लोग राह ताकते-ताकते निकाल न जाते।

रही बात दूसरे गांव की तो वह दिन भर हमारे भूगोल से ही बाहर होता है। हां कभी-कभी इतिहास या साहित्य का हिस्सा जरूर बन जाता, वह भी रीमा भारती और वेद प्रकाश के उपन्यासों का लिबास पहने क्योंकि दिन के उजाले और लिबास में उसे देखने की हमें आदत ही नहीं रह गई है। हां कभी-कभी कुछ नवाछिटिया मेम्बर चाइना मोबाइल और बहुराष्ट्रीय कंपनियों की कृपा से रात्रिकालीन सेवा का दिवस-संस्करण स्क्रीन पर जरूर उतार लाते, लेकिन उसके बाद ही वे पांत बहिष्कृत हो कोई और बाट पकड़ लेते। इसलिए दूसरे गांव के समाचार माध्यमों तक तक हमारी खबरें या तो पहुंचती नहीं या पहुंचती भी तो पहले गांव के आदमी के पुराने लाज-लिहाज से फिल्टर होकर। सो अपनी यह धूनी पूरी तरह सेफ थी। और उस दूसरे गांव की जगह इस तीसरे गांव की चौहद्दी में बहुत थी भी नहीं। सो दोनों ने एक अघोषित समझौता सा कर लिया था।

 

(लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्विद्यालय में भाषा विज्ञान में सहायक प्रोफेसर हैं)
 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण) : यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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