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दानिश सिद्दीकी की हत्या: तालिबान को लेकर कितनी अलर्ट है भारत सरकार? बिगड़ सकते हैं अफगानिस्तान के हालात 

Sat, 17 Jul 2021 11:18 AM IST
Atul sinha अतुल सिन्हा
Updated Sat, 17 Jul 2021 11:18 AM IST
सार

जब से अमेरिकी फौजों की वापसी हुई है, अफगानिस्तान में स्थितियां लगातार बिगड़ी हैं। तालिबानी लड़ाकों ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने और वहां की सत्ता हथियाने की हिंसक कोशिशें तेज कर दी हैं। हर दिन नए-नए इलाकों पर तालिबानी कब्जा कर रहे हैं और हिंसा बदस्तूर जारी है।

ऐसे में जो भी अफगानिस्तान का समर्थन कर रहा है और तालिबानियों की कार्रवाइयों का विरोध कर रहा है, वह उसके निशाने पर होता है।

दानिश सिद्दीकी की मौत उसी की एक मिसाल है।

जिस तरह शंघाई सहयोग संगठन से जुड़े देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अफगानिस्तान का मुद्दा छाया रहा और तालिबानियों के जिहादी तेवर और हमलों की चौतरफा निंदा होती रही, उससे साफ है कि आने वाले दिन और खतरनाक होने वाले हैं।

खासकर शांति की तमाम कोशिशें नाकाम होने और सीजफायर के लगातार उल्लंघन को लेकर पाकिस्तान को छोड़कर तमाम देश खासकर तालिबान को चेतावनी दे रहे हैं।

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indian journalist danish siddiqui killed in afghanistan by taliban know the agenda of taliban and reality of afghanistan
दानिश ने साझा की थी 15 घंटे के ऑपरेशन के बाद ब्रेक की तस्वीर - फोटो : Twitter/dansiddiqui

विस्तार

अगर आप तालिबानी हमले के शिकार पुलित्जर पुरस्कार से सम्मानित भारत के युवा पत्रकार दानिश सिद्दीकी के इंस्टाग्राम पर उनकी आखिरी तस्वीरें देखेंगे तो आपको कंधार समेत आसपास के इलाकों में तालिबान के दहशत की एक झलक मिल जाएगी।

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दानिश लगातार उन खतरनाक इलाकों से गुज़र रहे हैं और उनकी कार के शीशे पर बुलेट्स टकरा रही हैं। हर तरफ से हो रही गोलीबारी के बीच जिस तरह अफगान सुरक्षाबलों की ये गाड़ी उड़ा दी गई और दानिश समेत उसमें सवार तमाम अफगान सैनिक मारे गए, उससे तालिबान के इरादों का पता चलता है।
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दानिश की हत्या और तालिबान के मंसूबे 
दरअसल, जब से अमेरिकी फौजों की वापसी हुई है अफगानिस्तान में स्थितियां लगातार बिगड़ी हैं। तालिबानी लड़ाकों ने अफगानिस्तान पर कब्जा करने और वहां की सत्ता हथियाने की हिंसक कोशिशें तेज कर दी हैं। हर दिन नए-नए इलाकों पर तालिबानी कब्जा कर रहे हैं और हिंसा बदस्तूर जारी है। ऐसे में जो भी अफगानिस्तान का समर्थन कर रहा है और तालिबानियों की कार्रवाइयों का विरोध कर रहा है, वह उसके निशाने पर होता है। दानिश सिद्दीकी की मौत उसी की एक मिसाल है।

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जिस तरह शंघाई सहयोग संगठन से जुड़े देशों के विदेश मंत्रियों की बैठक में अफगानिस्तान का मुद्दा छाया रहा और तालिबानियों के जिहादी तेवर और हमलों की चौतरफा निंदा होती रही, उससे साफ है कि आने वाले दिन और खतरनाक होने वाले हैं। खासकर शांति की तमाम कोशिशें नाकाम होने और सीजफायर के लगातार उल्लंघन को लेकर पाकिस्तान को छोड़कर तमाम देश खासकर तालिबान को चेतावनी दे रहे हैं।


भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने भी तालिबान को हिंसा का रास्ता छोड़ने की सख्त चेतावनी दी है। हालांकि पिछले दो दशकों में जब से अमेरिकी फौजें अफगानिस्तान में बनी रहीं, तालिबान ने अपनी ताकत लगातार मजबूत की है। अपने लड़ाकों को आधुनिक से आधुनिकतम हथियारों की ट्रेनिंग दी है।

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996 से 2001 तक के पांच साल अफगानिस्तान के लोगों के लिए सबसे खतरनाक और भयानक थे, जब तालिबानियों ने वहां अपना शासन चलाया - फोटो : पीटीआई

तालिबान का इतिहास और अफगानिस्तान 
अगर पीछे लौटें तो 1996 से 2001 तक के पांच साल अफगानिस्तान के लोगों के लिए सबसे खतरनाक और भयानक थे, जब तालिबानियों ने वहां अपना शासन चलाया और दुनिया को ये बताने की कोशिश की इस्लामिक सरकारें कैसे चलती हैं। वहां की महिलाओं के लिए खासकर ये दौर सबसे बुरा था और पूरी दुनिया में तालिबानी सरकार की आततायी नीतियों और क्रूर कानूनों की खुलकर आलोचना हुई, मानवाधिकार संगठन सामने आए और तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर ये मुद्दा छाया रहा।

आखिरकार अमेरिका ने शांति की पहल की अपने हजारों सैनिक भेजे और 2001 से अबतक यानी 20 सालों तक अफगानिस्तान में लोकतंत्र बहाली में मदद की। तालिबान के साथ शांति वार्ताएं होती रहीं, सीजफायर लागू हुआ, लेकिन तालिबान भीतर ही भीतर अपनी तैयारियां करता रहा। उसका मिशन तब भी अफगानिस्तान पर शासन करना था और अब भी है। अमेरिकी दखल का लगातार विरोध करते हुए तालिबान लगातार अमेरिका को अपना सबसे बड़ा दुश्मन मानने लगा।

अस्सी के दशक के अंत में और नब्बे के दशक में अल कायदा का उदय हुआ और ओसामा बिन लादेन दुनिया का सबसे बड़ा आतंकी माना गया। लादेन की अपनी दुनिया थी, लेकिन तालिबान उसे लगातार मदद देता रहा। अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पेशावर से ओसामा अपनी गतिविधियां चलाता और तमाम आतंकी संगठनों की मदद करता, अपने सबसे बड़े दुश्मन अमेरिका पर हमले को लेकर रणनीतियां बनाता।

9/11 के नाम से मशहूर हो गए वर्ल्ड ट्रेड टावर और पेंटागन पर हुए हमले आज भी अमेरिका समेत पूरी दुनिया के लिए एक भयानक सपने की तरह हैं। लेकिन अमेरिका ने बीस सालों तक अफगानिस्तान में अपनी फौज रखी और शांति की कोशिशें जारी रहीं, लेकिन अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनॉल्ड ट्रंप ने जाते-जाते ये ऐलान कर दिया कि अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज जनवरी 2021 तक वापस आ जाएगी।

दरअसल,उनका तर्क था कि आखिर कबतक अमेरिका अपनी फौज को अफगानिस्तान में रख सकता है। अब अफगानिस्तान को अपनी समस्या खुद हल करनी चाहिए, वैसे अमेरिका बाहर से उसका समर्थन करता रहेगा।

बहरहाल जनवरी की टाइमलाइन निकल गई और बाइडन के राष्ट्रपति बनने के 6 महीने बाद आखिरकार अमेरिकी सैनिक वापस आ गए।

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यूएस आर्मी के अफगानिस्तान से लौटने के बाद हालात बिगड़ते जा रहे हैं। - फोटो : US Department of Defense

अमेरिकी फौज की वापसी और अफगानिस्तान के हालात 
उधर जब से अमेरिकी फौज की वापसी शुरू हुई तो अप्रैल से ही अफगानिस्तान में तालिबान ने तेजी से अपने पांव पसारना शुरू कर दिया। खबर है कि तालिबान अफगास्तिान पर करीब 80 हजार लड़ाकों की मदद से सत्ता कब्जाना चाहता है। पिछले चार महीने के दौरान उसने जंग छेड़ रखी है और 1100 से ज्यादा अफगानी सैनिकों और करीब चार हजार आम लोग इसके शिकार हो चुके हैं।

तालिबान के प्रमुख मौलवी हैबतुल्लाह अंखुजादा के नेतृत्व में तालिबान कांधार से लेकर काबुल तक हमले कर रहा है। तालिबान ये भी दावा कर रहा है कि उसने अफगानिस्तान के तकरीबन 85 फीसदी जमीन पर कब्जा कर लिया है। तालिबानी प्रवक्ता ये भी कह रहे हैं कि अफगानिस्तान के 421 में साढ़े तीन सौ जिले तालिबान के पास आ चुके हैं। जमीनी हकीकत क्या है, ये साफ तौर पर नहीं कहा जा सकता। हालांकि युद्ध में ऐसे तमाम दावे होते हैं। फिर भी इसमें संदेह नहीं कि अफगानिस्तान के लिए इस वक्त बहुत ही मुश्किल वक्त है।

तालिबान के उभरने से क्या होगी भारत स्थिति 
भारत के लिए यह दुविधा का वक्त है। खासकर जिस तरह पिछले दो दशकों से अफगानिस्तान के साथ भारत के मजबूत व्यापारिक संबंध रहे हैं और तमाम प्रोजेक्ट वहां चल रहे हैं, खासकर गैस पाइपलाइन का एक बड़ा प्रोजेक्ट बीच में फंसा है. ऐसे में मुश्किल ये है कि अगर तालिबान ने अफगानिस्तान पर पूरी तरह कब्जा कर लिया तब रिश्तों की नई इबारत कैसे लिखी जाएगी।

भारत ने अभी तक तालिबानी नेताओं से कभी बातचीत नहीं की और न ही इसका समर्थन किया, दूसरी तरफ पाकिस्तान ने सबसे पहले तालिबानी सरकार को मान्यता दे रखी है और अगर शुक्रवार को ताशकंद में चल रहे सेंट्रल साउथ एशिया कांफ्रेंस के दौरान पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान के बयान को देखें तो साफ हो जाता है कि उनका रुख लगातार तालिबान के पक्ष में रहा है।

इमरान ने भारत के साथ रिश्ते सुधरने और बातचीत का रास्ता खुलने के रास्ते में आरएसएस विचारधारा को एक बड़ी बाधा बताते हुए कहा है कि हम तो लगातार शांति और दोस्ती चाहते हैं, लेकिन आरएसएस की विचारधारा बाधा बन रही है। ये बात भी कई बार सामने आ चुकी है कि तालिबान के तमाम सैन्य कमांडरों और कई शीर्ष नेताओं को पाकिस्तान से मदद मिलती है। इसलिए इमरान खान अफगानिस्तान के मसले पर अभी खामोश रहना पसंद करते हैं और बातचीत का रुख भारत की ओर मोड़ देते हैं।

अभी तक भारत के अफगानिस्तान के साथ बेहद दोस्ताना रिश्ते रहे हैं। भारत ने अफगानिस्तान के पुनर्निर्माण में बहुत मदद भी की है। लगातार तमाम मंचों से ये संदेश दिया गया है कि अफगानिस्तान के लोग एक आजाद और शांत लोकतांत्रिक देश चाहते हैं। जो भी मसले हैं उन्हें राजनीतिक तौर पर बातचीत के जरिये हल किया जाना चाहिए, लेकिन तालिबानी नेताओं और वहां के आतंकी संगठनों से क्या ये उम्मीद की जा सकती है कि वो शांति का रास्ता अपना सकते हैं या ऐसी अपीलों का उनपर कोई असर पड़ेगा।

इधर, जो लगातार जिहाद की बात करते हैं और अपनी मंजिल पाने के लिए कुछ भी कर सकने पर आमादा हैं उनपर इन शांति अपीलों का भला क्या असर हो सकता है। लेकिन दुनिया भर के देश इन अपीलों के अलावा और कर भी क्या सकते हैं। अब ये तो तालिबान को तय करना है कि वह अंतर्राष्ट्रीय कानूनों और समझौतों को कितना मानता है और अफगानिस्तान पर हुकूमत करने का उसका सपना क्या इन हिंसक और युद्ध के रास्ते से ही निकल सकता है।

किसी भी मुल्क पर हुकूमत करने के लिए आपको वहां के लोगों का भरोसा जीतना पड़ता है, तो क्या तालिबान वह भरोसा कभी जीत पाएगा। जाहिर है पूरी दुनिया की निगाह इसपर लगी है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। आप भी अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

 

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