नृत्य यात्रा ओडिसी: गीत गोविंद के भावों व केलुचरण महापात्र की साधना का संगम, चैतन्य महाप्रभु से मिली संजीवनी
भारतीय शास्त्रीय नृत्यों के बारे में चर्चा की इस श्रृंखला में बात आज ओडिसी नृत्य की। इससे पहले हम आपको कथक और कुचिपुड़ी नृत्यों के अतीत और वर्तमान के बारे में जानकारी दे चुके हैं। इस बार की कड़ी में हमने ओडिसी नृत्यांगना पद्मश्री रंजना गौहर से भी खास बात की है।
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ओडिसी नृत्य की पहचान भारत के उड़ीसा प्रांत से है। यूं तो ठीक से कह पाना कि नृत्य शैली कितनी पुरानी है, संभव नहीं है पर देखा जा सकता है कि तंजौर के पुराने मंदिरों में जो नृत्य कलाकृतियां हैं, उनमें जो भंगिमाएं हैं, वे ओडिसी नृत्य का ही हिस्सा है।
ओडिसी नृत्य का जन्म
शास्त्रीय नृत्यों में पुरुषों का आधिपत्य रहा है। स्त्रियों में नृत्य का प्रचलन काफी समय बाद शुरू हुआ पर ओडिसी नृत्य का जन्म स्त्रियों द्वारा ही हुआ, इसलिए यह नृत्य माहरी के नाम से भी प्रचलन में आया। माहरी मतलब महान नारी। यह नृत्य देवदासियों द्वारा मंदिर प्रांगण में शुद्ध भाव से होता आया। वे प्रभु को नृत्य समर्पित करने के लिए ही इसे करती थीं क्योंकि उनका विवाह देवताओं से हो जाता था। 16वीं शताब्दी के आसपास जब महमूद गजनवी ने उड़ीसा के मंदिरों को तोड़ा तो माहारिओं के दुर्व्यवहार बढ़ा और इसके चलते यह नृत्य एवं माहारियां दोनों ही हाशिये पर होती चली गईं।
कालांतर में चैतन्य महाप्रभु ने नृत्य को पल्लवित किया। चैतन्य महाप्रभु के आगमन के साथ माहरी नृत्य फिर जीवित हो उठा उन्होंने माहारी एवं नृत्य आचार्य के माध्यम से छोटी उम्र के लड़कों को नृत्य सिखाया जिनकी आयु 15 वर्ष से अधिक न हो, उन्हें गोटीपुआ कहा जाने लगा। लड़कियों की वेशभूषा में ये छोटे लड़के मंदिर प्रांगण में नृत्य करते थे जोकि दीयो की रोशनी में होता था जिसमें गीत गोविंद और नाट्य शास्त्रों के अंग समाहित होते थे।
ओडिसी एक उच्च शैली का नृत्य है और नाट्य शास्त्र व अभिनय दर्पण पर आधारित है। इसने जदुनाथ सिन्हा रचित अभिनय दर्पण प्रकाश, राजमणि पात्र रचित अभिनय चंद्रिका और महेश्वर महापात्रा की अभिनय चंद्रिका से बहुत कुछ प्राप्त किया है।
भारत के अन्य भागों की तरह रचनात्मक साहित्य ने ओडिसी नर्तकियों को भी प्रेरित किया और नृत्य के लिए विषय प्रदान किए। यह विशेष रूप से जयदेव रचित 12वीं शताब्दी के गीत गोविंदा से भी प्रेरणा लेता रहा है। नायक नायिका भाव के एक उल्लेखनीय उदाहरण के चलते ये अपनी काव्यात्मक और शैलीगत सामग्री में अन्य कविताओं से आगे है। कृष्ण के लिए कवि की भक्ति कार्य के माध्यम से व्याप्त है। ओडिसी नाट्य शास्त्र द्वारा निर्धारित सिद्धांतों का बारीकी से पालन इसमें होता है।
ओडिसी में लास्य अंगों के साथ-साथ भाव पक्ष भी अत्यधिक सुंदर होता है जिसका श्रेय गुरु केलुचरण महापात्र को जाता है, जिस तरह से उनकी अद्भुत भाव भंगिमा देखकर साक्षात नटवर का रूप दिखाई देता था और ओडिसी का भाव पक्ष काफी मजबूत होने के कारण और भी शास्त्रीय नृत्य को आकर्षित करता है।
पद्म विभूषण डॉ.सोनल मानसिंह ने भी ओडिसी को अपना पूर्ण जीवन देकर सुंदर रूप दिया है। ओड़िसी गुप्त रूप से नाट्यशास्त्र के सिद्धांतों का अनुसरण करता है। चेहरे के भाव, हस्त–मुद्राएं और शरीर की गतिविधियों का उपयोग एक निश्चित अनुभूति, एक भावना या नवरसों में से किसी एक के संकेत के लिए किया जाता है। इसकी गतिविधि की तकनीक दो आधारभूत मुद्राओं चौक और त्रिभंग के आसपास निर्मित होती हैं। चौक शरीर के भार के समान संतुलन के साथ एक पुरुषोचित मुद्रा है। त्रिभंग एक बहुत स्त्रीयोचित मुद्रा है जिसमें नर्तकी का शरीर गले, धड़ और घुटने पर मुड़ा होता है।
धड़ संचालन ओडिसी शैली का एक बहुत महत्वपूर्ण और एक विशिष्ट लक्षण है। इसमें शरीर का निचला हिस्सा स्थिर रहता है और शरीर के ऊपरी हिस्से के केन्द्र द्वारा धड़ धुरी के समानांतर एक ओर से दूसरी ओर गति करता हैं। इसके संतुलन के लिए विशिष्ट प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है इसमें कंधों या नितम्बों की किसी गतिविधि से बचा जाता है।
यहां समतल पांव, पदांगुली या एड़ी के मेल के साथ निश्चित पद-संचालन हैं। यह जटिल संयोजनों की एक विविधता में उपयोग की जाती है। यहां पैरों की गतिविधियों की बहुसंख्यक संभावनाएं भी हैं। अधिकतर पैरों की गतिविधियां धरती पर या अंतराल में पेचदार या वृत्ताकार होती हैं।
पैरों की गतिविधियों के अतिरिक्त ओडिसी में छलांग या चक्कर के लिए चाल की एक विविधता है और निश्चित मुद्राएं मूर्तिकला द्वारा प्रेरित हैं। यह एक निश्चित मुद्रा में गतिविधि की समाप्ति के वास्तविक संयोग है। हस्तमुद्राएं नृत्त एवं नृत्य दोनों में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं।
नृत्त में इनका उपयोग केवल सजावटी अलंकरणों के रूप में किया जाता है और नृत्य में इनका उपयोग सम्प्रेषण में किया जाता है। ओड़िसी का नियमनिष्ठ रंगपटल प्रस्तुतीकरण का एक निश्चित क्रम है, जहां ‘रास’ की कल्पना की रचना के लिए प्रत्येक क्रमिक एकक का निर्माण साथ ही साथ व्यवस्थित रूप से किया जाता है ।
ओडिसी में मंगलाचरण आरम्भिक एकक है, जहॉं नर्तकी हाथों में फूल लिए धीरे-धीरे मंच पर प्रवेश करती है और धरती माता को अर्पित करती है। इसके बाद नर्तकी अपने इष्टदेव को प्रणाम करती है। एक नृत्त क्रम के साथ एकक का अंत इष्टदेव, गुरू और दर्शकों को अभिवादन के साथ होता है। अगले एकक को बटु कहा जाता है, जहां चौक और त्रिभंगी की आधारभूत भंगिमा द्वारा पुरुषोचित और स्त्रीयोचित द्वयात्मकता में से ओड़िसी नृत्त तकनीक के मूल विचार को प्रकाश में लाया जाता है। इसके साथ बजाया जाने वाला संगीत बहुत सरल है और नृत्य पाठ्यक्रम का सिर्फ एक स्थायी है।
बटु में नृत्त की बहुत आधारभूत व्याख्या के बाद पल्लवी में गतिविधियों और संगीत के साज-सामान तथा पुष्पण का नंबर आता है। एक निश्चित राग में एक संगीतात्मक संयोजन का दृश्यात्मक प्रदर्शन नर्तकी द्वारा मद्धम और यथोचित गतिविधियों के साथ किया जाता है। ताल संरचना के अंदर जटिल नमूनों की विशिष्ट लयात्मक रूपांतरण में संरचना की जाती है। अभिनय की प्रस्तुति के द्वारा इसका अनुसरण किया जाता है।
उड़ीसा में जयदेव द्वारा रचित बारहवीं सदी के गीत गोविन्द के अष्टपदों के नृत्य की सतत परम्परा है। इस कविता का प्रगीत्व (लयात्मकता) विशेषत: ओड़िसी शैली के लिए उपयुक्त है। गीत गोविन्द के अतिरिक्त उपेन्द्र भंज, बालदेव रथ, बनमाली और गोपाल कृष्ण जैसे अन्य ओड़िसी कवियों की रचनाओं का भी उपयोग किया जाता है। रंगपटल का आखिरी एकक, जो शायद एक से ज्यादा पल्लवी और अभिनय पर आधारित एककों का सम्मिश्रण है, को मोक्ष कहा जाता है । पखावज पर अक्षरों का वर्णन होता है और नर्तकी धीरे-धीरे घूमती हुई तीव्रता से चरमोत्कर्ष पर पहुंचती है। तब नर्तकी आखिरी प्रणाम करती है ।
ओड़िसी वादक मण्डल में मूलत: एक पखावज वादक (जो कि आमतौर पर स्वयं गुरु होता है ), एक गायक, एक बांसुरी वादक, एक सितार या वीणा वादक और एक मंजीरा वादक होता है। नर्तकी अलंकृत चांदी के ओड़िसी आभूषणों का श्रृंगार करती है और इसमें एक विशेष केश-सज्जा होती है।
आजकल आमतौर पर साड़ी सिली हुई होती है और विशिष्ट शैली में पहनी जाती है। 1950 में संगीत नाटक अकादमी द्वारा इसे भारतीय शास्त्रीय नृत्य की सूची में स्थान मिला। प्रत्येक प्रस्तुति में यहां तक कि एक आधुनिक ओडिसी नर्तकी भी देवदासियों या महरिज की धार्मिक निष्ठा में विश्वास रखती है, जहां वह नृत्य के माध्यम से मोक्ष या मुक्ति को खोजती है।
ओडिसी कलाकार पद्मश्री रंजना गौहर के विचार
रंजना गौहर कला जगत के लिए एक जाना माना नाम है उन्होंने अपनी ओडिसी की शिक्षा -दीक्षा 20 साल की उम्र में शुरू की। पूरा जीवन ओडिसी को समर्पित किया और भक्ति साधना के मार्ग में अपने आप को स्थापित किया। वह एक ऐसे परिवार से आती हैं जहां नृत्य संगीत को करने वाला कोई नहीं था। परिवार उन्हें डॉक्टर या आईएएस बनते देखना चाहता था पर उन्होंने कला का मार्ग चुना। जिस तरह से उनके नृत्य को देखकर अद्भुत लावण्य की छवि मिलती है उसे देखकर यकीनन कहा जा सकता है कि वह ईश्वर की कृपा और साधना के बिना संभव नहीं है।
वह कहती हैं कि जो युवा शास्त्रीय नृत्य शैली को सीखना जानना चाहते हैं, उन्हें अपने आपको इसे समर्पित करना चाहिए एवं संपूर्ण मन से योगाभ्यास करना चाहिए। वह गुरु शिष्य परंपरा का जीता जागता पर्याय है।
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