भारत-चीन सीमा विवाद: राफेल का मतलब युद्ध का बिगुल बजाना नहीं है
हाल ही में हमारे पास राफेल के 5 फाइटर जेट प्लेन आ चुके हैं, जबकि चीन के पास इसकी जोड़ का दूर-दूर तक पता नहीं है। अगले साल के अंत तक फ्रांस से हमें 31 राफेल और मिलना है, जिसके बाद हम दुनिया की चुनिंदा सक्षम वायु सेना बन चुके होंगे। वैसे बेल्फर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स इन हॉर्वर्ड कैनेडी स्कूल के अनुसार भारतीय वायु सेना चीन के मुकाबले बेहतर है।
विस्तार
भारत के वायु सेना बेड़े में 5 राफेल फाइटर जेट के शरीक हो जाने के बाद से आम देशवासी को लग रहा है कि हम चीन को निपटा देंगे और पाकिस्तान की बारह बजा डालेंगे। यह महज ख्याली पुलाव है और क्षणिक भावुकता। यह बड़ी सामरिक उपलब्धि तो है, लेकिन कोई सामरिक संसाधन ऐसे नहीं होते,जिसके बूते एकतरफा जंग जीती जा सके या ये केवल युद्ध के लिए ही नहीं होते।
जैसे शेर,कुत्ता या बिल्ली तक के पंजे बेहद नुकीले होते हैं। ये अपने शिकार की चीर-फाड़ इन घातक पंजों के सहारे ही करते हैं, दांतों से तो केवल शिकार को दबोचे रखते हैं और उसे निपटा देने के बाद चबाकर खाने के काम आते हैं।
बाकी समय इन्हीं पंजों से अपने बच्चों को खिलाते हैं और दांतों से पकडक़र शिशुओं को एक से से दूसरी जगह ले जाते हैं। ऐसे ही होते हैं युद्धक संसाधन। शांतिकाल में ये सेना के खेलने के काम आते हैं, लेकिन जब बात संघर्ष की आती है तो इनसे दुश्मन का कलेजा चीर कर रख देते हैं।
बहरहाल, पहले तो ये जान लें कि भारत और चीन दोनों ही युद्ध के मूड में नहीं होंगे। ये दुनिया की बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था हैं और दुनिया को जंग से नहीं आयात-निर्यात से जीतना चाहते हैं। जो काम बाजारवाद को पोषित कर हो सकता है, उसके लिए खून बहाने की क्या जरूरत?
मौजूदा हालात में चीन हमसे कई गुना आगे है। युद्ध के संसाधनों के लिहाज से भी और अर्थव्यवस्था के हिसाब से भी। इसका यह मतलब नहीं कि हम कमतर हैं या चीन बेहद भारी है।
इतिहास गवाह है कि ज्यादातर जंग का फैसला रणनीति से होता है,संख्या बल या हथियारों की तादाद से नहीं। इतिहास गवाह है कि युद्ध जीतते-जीतते एक राजा इसलिए हारे कि राजा हाथी के हौदे से उतरकर मैदान में मारकाट मचा रहे थे, लेकिन सेना समझी कि राजा मारे गए तो सैनिक भागने लगे और बाजी पलट गई।
ईस्ट इंडिया कंपनी के कर्नल रॉबर्ट क्लाइव ने 1757 में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला के 50 हजार सैनिकों की तुलना में महज 3 हजार सैनिकों के भरोसे युद्ध जीत लिया था, क्योंकि उसकी रणनीति नायब थी। नवाब से उनका सेनापति मीर जफर गद्दारी नहीं करता तो संभव था कि मुगलों के बाद हमें अंग्रेजों की गुलामी नहीं करना पड़ती।
तो आइए पहले यह देख लें कि भारत और चीन की सामरिक शक्ति कितनी है। मोटे तौर पर यह जान लें कि भारत केवल सैन्य बल में अधिक है, बाकी सब में कम है। उसके पास 34 लाख सैनिक हैं तो चीन के पास 27 लाख। भारत का रक्षा बजट 71.1 बिलियन डॉलर है तो चीन का 261 बिलियन डॉलर। तीन गुना से अधिक।
भारतीय वायु सेना चीन के मुकाबले बेहतर है...
हमारे परमाणु हथियार 150 हैं तो चीन के 320। हेलिकॉप्टर 692 तो उनके 1004 हैं। टैंक 4184 हैं तो उनके 13050। सैन्य वाहन 2815 हैं तो उनके 40 हजार।
क्या तुलना है दोनों की? हमारे पास सबमरीन 16 हैं तो उनके पास 76। हमारे पास सुखोई, मिराज 200 युद्ध विमान हैं तो उनके पास जे-10, जे-11 और एसयू-27। वैसे हमारे फाइटर प्लेन हर मौसम में उड़ान भरने लायक हैं, जबकि चीन के पास केवल जे-10 ही वैसा है।
हाल ही में हमारे पास राफेल के 5 फाइटर जेट प्लेन आ चुके हैं, जबकि चीन के पास इसकी जोड़ का दूर-दूर तक पता नहीं है। अगले साल के अंत तक फ्रांस से हमें 31 राफेल और मिलना है, जिसके बाद हम दुनिया की चुनिंदा सक्षम वायु सेना बन चुके होंगे। वैसे बेल्फर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स इन हॉर्वर्ड कैनेडी स्कूल के अनुसार भारतीय वायु सेना चीन के मुकाबले बेहतर है।
यानी 1962 से लेकर आज तक वायु सेना में हम चीन से आगे ही हैं और तब यदि नेहरूजी ने भारतीय वायु सेना को युद्ध में उतरने की इजाजत दे दी होती तो वह युद्ध हम जीत सकते थे, ऐसा माना जाता रहा है। तब चीन के पास वायु सेना बल न्यूनतम था।
पिछले कुछ समय से भारत-चीन के बीच संबंध सामान्य नहीं हैं। सामान्य तो वैसे भी रस्मी तौर पर ही थे। व्यापारिक तकाजों की वजह से संवाद, सौजन्य बना रहता है। भारत 1962 के जख्मों को नहीं भूला है और चीन की विश्वासघाती प्रवृत्ति के चलते उस पर यकीन करने का कोई कारण भी नहीं है। इसलिए गलवान घाटी में जब चीन ने हरकत की तो उसे मुंहतोड़ जवाब देकर औकात तो दिखा दी गई है।
हमारे जो डेढ़ दर्जन सैनिक शहीद हुए हैं, उनमें से ज्यादातर वाहन के घाटी में गिरने की वजह से हुए हैं, चीनी आक्रमण के कारण नहीं। रक्षा विशेषज्ञ बताते हैं कि आज भी भारतीय सेना विश्व में अपेक्षाकृत दमदार है। उसकी वजह है पूरे समय विपरित हालात में रहना। वह सियाचीन की खून जमा देने वाले मौसम में भी रहती है तो जैसलमेर के मरुस्थल में तपा देने वाली गर्मी में भी। वह लद्दाख के माइनस तापमान में भी रहती है तो कच्छ के रण में भी, जहां पेयजल तक के लाले पड़ जाते थे।
भारत की एक और बड़ी ताकत यह है कि वह अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस के साथ...
ऐसा माना जाता है कि बहादुरी में भारतीय सैनिक बेमिसाल हैं। संपन्न देशों के जवानों से तुलना करें तो वे साधनों के सहारे बहादुरी दिखाते हैं, जबकि हमारे जवान शारीरिक सुदृढ़ता में बेजोड़ हैं। हाल ही गलवान घाटी में एक नौजवान सिख जवान ने घायल होकर भी करीब एक दर्जन चीनी सैनिकों को बगल में दबोचकर तो घाटी से उठाकर नीचे खाई मे फेंककर निपटा डाला था।
वह पीठ में छुरा घोंपने से शहीद हुआ वरना तो चीनियों के लिए साक्षात काल बना हुआ था। 1967 में हमारे महज 40 सैनिकों ने चीन के 200 सैनिकों को मार कर लद्दाख की एक चौकी बचाई थी।
यूं भी भारतीय सेना आजादी के बाद से ही सांस नहीं ले पाई है। 1948 में उसे पाकिस्तानी कबीलों से लड़ना पड़ा तो सीमा पर उससे झड़पें चलती ही रहती हैं।
1962 में एक बार तो 1967 में चीन से दोबारा सीमित युद्ध करना पड़ा। 1965 और 1971 में पाकिस्तान से लड़ना पड़ा। 1999 में एक बार फिर करगिल में पाकिस्तान से युद्ध ही हुआ । हर बार पाकिस्तान हारा, लेकिन बाज नहीं आता है।
फिर, 1989 से कश्मीर घाटी में आतंकवाद फैलने के साथ ही सेना लगातार युद्ध लड़ रही है। श्रीलंका जाकर लिट्टे से वह लड़ी। इसके विपरीत चीन 1962 में हमसे लड़ने के बाद 1979 में वियतनाम से लड़ा, उसके बाद उसने कोई युद्ध का मैदान नहीं देखा। यानी उसकी सेना को जंग लगी हुई है, जो हमारे साथ जंग के मैदान में उतरी तो पूरी संभावना है कि वह हर क्षेत्र में मुंह की खाए।
इसमें दो राय नहीं कि चीन का रक्षा बजट हमसे कहीं अधिक है और वह लगातार अपनी सैन्य क्षमता बढ़ाता जा रहा है, फिर भी यह सोचना भूल होगी कि भारत हाथ धरे बैठा है। भारत की एक और बड़ी ताकत यह है कि वह अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस के साथ युद्धाभ्यास करता रहता है, जबकि चीन किसी के साथ नहीं करता।
यहां पाकिस्तान का जिक्र इसलिए नहीं कर रहा हूं कि अब उसकी औकात सीधे युद्ध की नहीं रही। वह तो हमने 1971 के एक लाख युद्ध बंदी नहीं छोड़े होते तो उसके सेना में वहां के लोग भर्ती होना ही छोड़ देते। उसका तो पूरा जोर आतंकवाद पर है। उसकी फितरत में ही पीठ पर वार है। इस बार जब भी वह प्रत्यक्ष युद्ध की हिमाकत करेगा तो उसेक अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो सकता है।
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