HAPPY DIWALI 2019: दिवाली का दीयों के साथ-साथ फूलों से भी है अटूट रिश्ता
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दीपावली का त्योहार ही ऐसा है कि इसमें दीयों और फूलों का अटूट साथ है। जितना दीयों का इसमें महत्व है उससे कहीं अधिक फूलों का है। किसी घर में यह कल्पना करना ही प्रिय नहीं लगता है कि वहां फूलों के वंदनवार न लगें हों, दरवाजे पर आम पत्तों की बेल न सजी हो और घर में स्थापित देवताओं के गले में फूलों के हार न लटके हों और जहां तक संभव हो फूलों की लड़ियां न लटकती हों। इन्हीं हार-फूलों के बीच उन्हीं की तरह हंसते व खिलखिलाते दीयों की रोशनी न जगमगा रही हो। यह सारे प्रयास इसलिए होते हैं कि अंधेरों की गहन कालिमा को चुनौती दी जा सके।
यहीं त्योहार ऐसा है जो समाज में आखिरी पंक्ति में खड़े व्यक्ति और उसके परिवार तक पहुंचता है। इसमें हर वर्ग भागीदार होता है। पिछले दिनों जब लगातार बारिश आयी थी और सूरज की धूप रूठी हुई थी तब सुना थी कि दीये बनाने वाले और उन्हें बेचने वाले दोनों परेशान थे। उनके बनाए दीये सूखेंगे ही नहीं तो बेचने वाले उसे बेचेंगे कैसे? यह दोनों वह हैं जो समाज की अंतिम पंक्ति में खड़े हैं। जिन्हें सालभर इस त्योहार का इंतजार रहता है। किसी अन्य त्योहार में क्या इस तरह अंतिम व्यक्ति की भागीदारी होती है? बारिश रुकी है तो उनके चेहरे पर मुस्कान आ गई है।
उनके घरों में भले ही पांच दीये मनाकर दिवाली मना ली जाएगी पर उनकी मेहनत और दो पैसे कमाने की आस लिए बनाए गए दीये कितने ही अन्य वर्गों के परिवारों के घरों पर पंक्ति से सजाए जाकर अपने मद्धम पर आकर्षक प्रकाश से जगमगाएंगे और अंधेरे की दुनिया को मिटाने की एक नन्हीं सी कोशिश करेंगे। अभी दो-तीन महीने पहले एक समाचार पढ़ने को मिला कि एशिया के सबसे बड़े स्लम धारावी में दीये बनाने का काम इस स्लम के कई परिवारों को रातों-रात पता नहीं कितने लाखों का व्यापार करवा देता है।
दीपावली से पहले से ही वहां तरह-तरह के आकार के सुंदर व आकर्षक दीयों को बनाने का काम लगभग वहां रहने वाले हर परिवार में शुरू हो जाता है। कहते हैं कि इसे युद्ध स्तर पर किया जाता है। इनके बनाए दीये देश भर में जाते हैं। धारावी का स्लम एरिया बहुत अभिशप्त है। कल्पना भी नहीं की जा सकती है कि कोई मनुष्य ऐसे भी रह सकता है और अपना जीवन जी सकता है। हम धारावी को मिटा नहीं सकते और न ही उसे बुलडोजर चलाकर उसे नष्ट कर वहां नए सिरे से साफ-सुथरी बस्ती बसा सकते हैं। पर, उनके बनाए गए दीये ज्यादा से ज्यादा संख्या में खरीदकर उन तक वह धन पहुंचा सकते हैं। जिससे कि वह शायद थोड़ी बेहतर स्थिति में रह पाएं।
दीयों की बात की है तो फूलों की बात कैसे पीछे रह सकती है। हमारे भगवानों को और देवी-देवताओं को तो फूलों से बहुत प्यार है। जब तक उनके गले में फूलों के हार न डले हों तथा फूलों से उनका श्रंगार न किया गया हो तब तक लगता है वह न तो सज पाए हैं और न हीं खुश हैं। उनकी सारी पूजा-अर्चना फूलों से संपन्न होती है। दिवाली में तो जैसे फूलों के तरह-तरह के हार बनाने की बाढ़ आ जाती है। आजकल तो किसानों ने परंपरागत तरीके से केवल अनाज की फसल उगाने के स्थान पर फूलों की खेती भी शुरू कर दी है।
हम तो चाहते ही हैं कि हमारा किसान संपन्न हो, उसे उसकी मेहनत का भरपूर लाभ मिले। उसके घर में भी श्री लक्ष्मी जी व गणपति बिराजें। उसे आत्महत्या न करनी पड़े। इसलिए उस तक इन फूलों की उपज का अधिक से अधिक लाभ पहुंचाने के लिए बहुत फूल खरीदें, बनें हुए हार खरीदें। कृत्रिम वस्तुओं से घर को सजाने के स्थान पर फूलों से घर सजाएं। घऱ का एक-एक कोना महकाएं।दीपावली सबके लिए देश के लिए शुभ हो और प्रत्येक वर्ग के प्रत्येक घर तक इसका जगमग प्रकाश पहुंचे। किसी के भी घर में अंधेरा झांक भी न पाए।