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OTT या अपशब्द की पाठशाला? शब्दों के संस्कार खत्म करता ओटीटी प्लेटफॉर्म

Wed, 28 Sep 2022 05:13 PM IST
Namrata Kacholia नम्रता कचोलिया
Updated Wed, 28 Sep 2022 05:13 PM IST
सार

वैसे जो हमारे समाज में वर्षों पहले मर्यादा थी कि स्त्री पुरुष के सामने अपशब्द बोलना तो दूर सुनने का भी परहेज रखती थी, अब तो साथ बैठकर वही सब देखा जा रहा है, जो उपलब्ध भी है और जनता के हिसाब से मनोरंजक भी।

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impact of ott platforms on youth
आप निर्माताओं को नहीं रोक सकते और ना ही एक समुदाय बना कर उनके खिलाफ कोई मुहिम छेड़ सकते हो - फोटो : istock

विस्तार

कल ही टीवी पर एक सीरीज देखने के लिए रिमोट हाथ में लिया तो ऑप्शन तो बहुत थे, इतने सारे डिजिटल प्लेटफॉर्म जो हैं, पर ऐसा लग रहा था मानो घर आए थके हारे व्यक्ति ने बस खाना शब्द मुंह से निकाला ही कि छप्पन भोग लगी थाली सामने आ गई।

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उस थाली को देखकर पहले तो क्या खाए उसका असमंजस्य, उसके बाद हर डिश का स्वाद तो अलग है पर उसमें भी जब भी नमकीन खाने जाओ तो हर बार नमक तेज बस यही OTT का हाल है।

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नमकीन अर्थात् 18 वर्ष से ऊपर की जनता के लिए बनाए जा रही मनोरंजन की चीजें। थोड़ा मीठा तो छप्पन भोग में भी होता ही है पर वो मीठा तो यहां बस थाली पूरी दिखे सिर्फ इसलिए मौजूद है। मीठा अर्थात् बच्चों के लिए मौजूद सामग्री, जो बस रखना जरूरी था तो रख दिया।

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वैसे नमक तेज खाने वालों के तो मजे हो गए, होने भी थे, पर मजेदार बात तो ये है कि जिनको तेज खाना बिल्कुल पसंद नहीं था आज वो भी धीरे-धीरे स्वाद लेकर  बड़े मजे से सब चख रहे है।

 सालों पहले बनी पारिवारिक मूवी या सीरियल्स

मेरे साथ मेरा चार साल का बेटा बैठा था, 15 मिनट हो चुके थे बल्कि ज्यादा ही पर मुझे ऐसी कोई मूवी या सीरीज समझ नहीं आई जो उसको साथ लेकर देख सकूं, हां बच्चों के लिए जो था बस वही लगा सकते थे या फिर कुछ सालो पहले बनी हुई पारिवारिक मूवी या सीरियल्स।

वैसे जो हमारे समाज में वर्षों पहले मर्यादा थी कि स्त्री पुरुष के सामने अपशब्द बोलना तो दूर सुनने का भी परहेज रखती थी, अब तो साथ बैठकर वही सब देखा जा रहा है, जो उपलब्ध भी है और जनता के हिसाब से मनोरंजक भी।

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आने वाली पीढ़ी में इस हानि का आभास होगा तब तक काफी देर हो चुकी होगी - फोटो : istock

खुले विचार

माना समय बदलता है, जनरेशन बदलती पर जो अपशब्दों से भरी चीजें आप अपने रूम में बैठकर देखते थे, आज घर में हॉल के सोफे पर बैठ कर आसानी से देखी जा सकती है, क्योंकि घर के बड़े भी वही सब उसी सोफे पर बैठ कर देख रहे है तो उनको भी वो अब विचलित नहीं कर सकता।

दूसरी जगह पर घर के बड़ों के विचार में रूढ़िवादिता आज भी मिल जाएगी परंतु इस मामले में वो काफी खुले विचारों के हो गए हैं।

यूं तो हमारे हाथ में बहुत हद तक चीजें होती है जैसे कि घर में बढ रहे बच्चों को क्या माहौल देना है उसके लिए एक विकल्प ये भी है कि हम उनके सामने ये सब ना देखें, पर ये सब देख कर जो अप्रत्यक्ष विचार हममें भी कहीं ना कहीं पनपते है उसका क्या हल है क्योंकि वो बहुत हानिकारक है, इसके लिए जितना हो सके ऐसी भाषा से बचिए। ध्यान रहे, हमारे विचारो में यकीनन “शब्दों के संस्कार” खत्म होने जैसा माहौल बन गया है।

व्यक्तिगत स्तर पर रख सकते हैं ध्यान

आप निर्माताओं को नहीं रोक सकते और ना ही एक समुदाय बना कर उनके खिलाफ कोई मुहिम छेड़ सकते हो क्योंकि वो व्यहवारिक नहीं है। वो तो बस जो बिकता है वो बेच रहे हैं पर हां आप निश्चित ही व्यक्तिगत स्तर पर इसका ध्यान रख सकते है कि कब हमें क्या देखना है क्या नहीं देखना है किसके सामने कितना जरूरी है ये सब देखना और आखिरकार इन सबसे हमारे विचार या व्यहवार में क्या फर्क पड़ रहा है।

आज निश्चित ही समाज इससे होने वाली हानि का मुआयना नहीं कर पा रहा है, पर कल जब आने वाली पीढ़ी में इस हानि का आभास होगा तब तक काफी देर हो चुकी होगी, अर्थात् आज ही अपने व्यक्तिगत स्तर पर जाग जाइए।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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