हैदराबाद एनकाउंटरः गैर न्यायिक प्रक्रिया को जन समर्थन क्यों? पक्ष और विपक्ष में क्यों बंटे हैं लोग?
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हैदराबाद में तथाकथित मुठभेड़ के बाद मारे गए चारों आरोपियों के बाद पूरे देश में उल्लास की एक लहर दौड़ गई और सामान्य नागरिक से लेकर सांसदों और बुद्धिजीवियों ने इस कांड की तारीफ की। 28 नवम्बर को पशु चिकित्सक के साथ दरिंदगी करने और उसे जिंदा जलाने के की वीभत्स घटना के बाद देश की कानून और व्यवस्था पर सवाल किए जा रहे थे।
ये पूछा जा रहा था कि आज की परिस्थितियों में महिलाएं कितनी सुरक्षित हैं। भावनाओं का एक ज्वार उमड़ा था जिसमें समाज के अनेक प्रतिष्ठित लोगों भी ने अपने गुस्से का इज़हार करते हुए चारों आरोपियों को सरे-आम फांसी की मांग की थी। इस मुठभेड़ के बाद उन सबकी आकांक्षाएं तो पूरी हो गई है।
संसद में सरे-आम फांसी की मांग करने वाली सांसद जया बच्चन ने कहा- ‘बहुत देर कर दी, देर आए पर दुरुस्त आए।’ भाजपा के सांसद राज्यवर्धन राठौड ने ट्वीट करके हैदराबाद पुलिस को बधाई दी । उनका कहना है कि सभी जानते है कि बुराई पर अच्छाई की जीत होगी।
बसपा प्रमुख मायावती ने भी इस एनकाउंटर पर सकारात्मक प्रतिक्रिया दी और इसे जायज ठहराया । एक फिल्मकार अशोक पंडित ने तो कहा कि किसी तरह के सवाल नहीं उठाने चाहिए। हैदराबाद पुलिस को इस काम के लिए एवॉर्ड दिया जाना चाहिए। यहां तक कि योग गुरु बाबा रामदेव ने इस पुलिस कार्यवाही का समर्थन किया और इसे साहसपूर्ण काम बताया।
इधर, महिला पहलवान गीता फोगोट ने भी लिखा-‘हैवानों का एनकांउटर।’ पशु-चिकित्सक पीडिता के परिवार वालों को तो ये कार्यवाही पसंद आनी ही थी। अर्थात् समाज के सभी पक्षों ने इसे समर्थन दिया और हैदराबाद पुलिस के इस काम के लिए बधाई दी गई। लेकिन किसी ने इसे आत्मरक्षा की कार्यवाही नहीं बताया।
दूसरी तरफ कुछ लोग इसे दुर्भाग्यपूर्ण मान रहे हैं। अभी-अभी जमानत पर रिहा हुए पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने इस एनकाउंटर की विस्तृत जांच की मांग की और भाजपा सांसद मेनका गांधी ने इसे भयानक बतलाया और कानून को हाथ में लेने के लिए इस कांड की आलोचना की। अपना दल सांसद अनुप्रिया पटेल ने न्यायपालिका के रास्ते फांसी दिए जाने को ही जायज ठहराया। कांग्रेस सांसद शशि थरूर को भी न्यायिक व्यवस्था से परे इस तरह के एनकाउंटर पर ऐतराज था।
आखिर क्यों मिल रहा है समर्थन?
अब सवाल ये है कि इस प्रकार की गैर न्यायिक प्रक्रिया को इतना जन समर्थन क्यों मिल रहा है। इस तुरत-फुरत के न्याय की आशा हमारे समाज को क्यों कर है। वास्तव में इसके पीछे समाज का गुस्सा है जो पिछले दिनों हुई बलात्कार और हत्याओं के उपरांत आरोपियों को समुचित सजा नहीं मिलने के कारण उत्पन्न हुआ है।
सात साल पहले देश की राजधानी मे हुए जघन्य बलात्कार के आरोपी हमारी लचर कानून व्यवस्था का सहारा लेकर आज तक फांसी की सजा से बच रहे हैं। उनमें से एक बलात्कारी किशोर होने के कारण कानून का सहारा लेकर सिर्फ तीन साल की सजा काट कर जेल से बाहर आ गया है।
कहा जाता है कि इस किशोर ने पीडि़ता के साथ सबसे ज्यादा दरिंदगी की थी। सवाल यह भी है कि क्या उसका उस काली रात को किया गया व्यवहार किसी किशोर के द्वारा किया गया व्यवहार था। अगर नहीं तो उसे और कडी सजा क्यों नहीं मिलनी चाहिए थी।
एक और आरोपी की दया याचिका राष्ट्रपति महोदय के पास विचाराधीन है। उन आरोपियों ने उस रात पीडि़ता के साथ कोई हमदर्दी दिखलाई थी? उन्होंने तो यौन तृष्णा के घृणित पशु के समान आचरण किया था। फिर उनकी फांसी की सज़ा मे देरी क्यों हो रही है?
उन्नाव से क्या सीखा समाज ने?
उन्नाव में हुए बलात्कार कांड के बाद आरोपी अपनी राजनीतिक पहुंच के कारण जिस प्रकार कानून से दूर भागते रहे, वो पुलिस का अक्षम्य अपराध है। आरोपी की गिरफ्तारी जब तक नहीं हो पाई जब तक उच्चतम न्यायालय ने हस्तक्षेप नहीं किया। और इसके बाद भी साक्ष्य मिटाने की नियत से पीड़िता और उसके परिजनों को दुर्घटना मे मारने का प्रयास किया गया।
उन्नाव की ही एक और ताजा घटना में बलात्कार पीडिता को जमानत पर आए बलात्कारियों और उसके परिवार जनों ने जीवित आग के हवाले कर दिया , यह सब जन मानस को दहलाने के लिए काफी है।
आए दिन समाचार पत्रों में छोटी-छोटी बच्चियों के साथ हैवानियत की खबरें आती रहती हैं। ये सभी खबरें जन मानस में आक्रोश पैदा कर रही है और यही आक्रोश इस एनकाउंटर की प्रशंसा करने के लिए प्रेरित करता है।
लचर कानून और व्यवस्था इस आक्रोश को और हवा दे रही है। निर्भया कांड के बाद जल्दी ही फास्ट कोर्ट की स्थापना की गई थी लेकिन कानून के पंडितों ने इस प्रक्रिया में इतने सुराख खोज डाले कि सात साल बीत जाने के बाद भी उन आरोपियों को सजा-ए- मौत नहीं मिल पाई, इसीलिए तुरंत एनकाउंटर में इन आरोपी-पशुओं को सजा मिल जाना समाज के बडे तबके को पसंद आ गया।
क्या कोई ये बता सकता है कि कितने एनकाउंटर के बाद बलात्कार की घटनाएं समाप्त हो जायेगी ? शायद कोई नही।
इस वाह-वाही के बीच हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पशु- चिकित्सक की असामयिक मौत और पाशविक बलात्कार के लिए कौन जिम्मेवार हैं? हैदराबाद जैसे शहर में एक अकेली लडकी को चार दानव उठा कर बलात्कार और हत्या कर देतें है और कोई व्यक्ति न उनको देखता है और न आवाज़ सुनता है। क्या इन सबके पीछे हमारी-सब चलता है वाली भावना नहीं है जिसमें हम अपराध होते हुए देखकर भी , अनदेखा करते है। क्या हैदराबाद पुलिस इस कांड में देरी के लिए जिम्मेदार नहीं है ?
एक पुलिस स्टेशन से दूसरे पुलिस स्टेशन तक परिजनों को दौड़ाने वाले भी यही पुलिसकर्मी थे। इस तुरत- फुरत के न्याय से हमारी न्याय प्रणाली पर उठाए गए सवाल खत्म नहीं हो जाते। न ही ये आशा करनी चाहिए कि इस एनकाउंटर से अपराधियों के दिल मे ऐसा डर बैठ जाएगा कि वे बलात्कार और हत्या जैसे अपराधों से तौबा कर लेंगे।
दरअसल, हमारी पहली आवश्यकता अपनी कानून और व्यवस्था को दुरुस्त करने की है, जिनका भय अपराधियों में हो। कानून से बच निकलने के रास्तों और छिद्रों को बंद करनें की है जिनका उपयोग करके अपराधी सजा से बचते है और सात- सात साल तक अपनी सज़ा को टाल सकतें है।
तुरत- फुरत न्याय के एनकाउंटर तो स्वयम् में एक अपराध है जिसकी न्यायिक जांच जरूरी है, वरना अनेक निर्दोषी भी इसके शिकार हो सकते है। हैदराबाद के इस पूरे कांड में हैदराबाद की पुलिस कही से भी न्याय के पक्ष में खडी दिखलाई नही देती है।
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