फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Blog ›   Human condolences and big discussion on Social media about Aurangabad train accident 16 migrant workers run over.

आदमी को भी खाती हैं रोटियां

Sat, 09 May 2020 11:30 PM IST
Rajesh Badal राजेश बादल
Updated Sat, 09 May 2020 11:30 PM IST
विज्ञापन
Human condolences and big discussion on Social media about Aurangabad train accident 16 migrant workers run over.
जिस रोटी के लिए इंसान घर छोड़ देता है। उसी रोटी की खातिर अब वापस लौट रहा है। - फोटो : PTI

उफ! भयावह दौर है। यह कौन सा हिन्दुस्तान बना रहे हैं हम? जिस रोटी के लिए इंसान घर छोड़ देता है। हजारों किलोमीटर जड़ों से कटकर दूर जाता है। उसी रोटी की खातिर अब वापस लौट रहा है। अब उस बड़े नगर में उसे रोटी नहीं मिलती। जड़ों में रोटी खोजने के लिए फिर सैकड़ों मील पैदल निकल पड़ा है। जहाज का पंछी लौट रहा है जहाज पर। चंद रोटियां कांख में दबाए। साथ में चटनी और प्याज की गांठ। रास्ते के लिए। रास्ते बंद हैं। गरीब के पास कोई ऑन लाइन परमिट नहीं है। 

विज्ञापन


सड़क पर पुलिस का पहरा है। डंडा मारती है। कहती है, मरना तो है। चाहे यहां मरो या फिर अपने गांव जाकर मरो। क्यों बदन को तकलीफ देते हो? गरीब क्या करे ? दोनों जगह मरना है तो गांव में क्यों न मरे? पुरखों के बगल में लेटकर हमेशा के लिए सो जाए। फिर कैसे जाए? रेल की पटरियों पर पहरा नहीं है। किसी ने नहीं कहा कि अपनी सड़क पर चलना गैर कानूनी है। किसी ने नहीं कहा कि पटरियों के किनारे चलना गैर कानूनी है। 
विज्ञापन


सरकार ने जरूर एलान किया है। आदमियों के लिए रेल बंद है, बसें बंद हैं, जहाज बंद हैं, ऑटो, टेम्पो, टैक्सी- सब बंद हैं। वह आदमी था, माल नहीं। क्या पता था कि रेल माल के लिए खुली है, जिंदा लाशों के लिए नहीं। अपने ही आजाद मुल्क में जा रहे थे, अपने ही घर। बिना कोई अपराध किए बचते-छिपते चोरों की तरह। 
विज्ञापन
विज्ञापन


कल से ही जेठ का महीना लगा है। तपिश तीखी है। दिन भर चलते चूर हो गए। निढाल हो गए। लेट गए पटरियों पर सर रखकर। मालगाड़ी आई। कुचलकर चली गई। कांख में दबीं रोटियां बिखर गईं। बिखर गए मांस के लोथड़े। पुरखों के पास जाने का अधूरा अरमान लिए, रोटी की खातिर रोटी छोड़कर चले गए वे। नजीर अकबराबादी डेढ़-दो सौ साल पहले यूं ही नहीं हकीकत बयान कर गए थे- 

रोटी न पेट में हो तो फिर कुछ जतन न हो/ मेले की सैर ख्वाहिशे बागो चमन न हो/
भूखे गरीब दिल की खुदा से लगन न हो/ सच है कहा किसी ने कि भूखे भजन न हो/ 
अल्लाह की भी याद दिलाती हैं रोटियां। 

वे पढ़े लिखे नहीं थे। हमारे अपने दादा और परदादा की तरह। लेकिन कुछ हमारे जैसे तथाकथित पढ़े लिखे कहते हैं- पटरियों पर लेटने गए ही क्यों? रेल के नीचे लेटोगे तो बख्शीश में मौत ही मिलेगी। बेवकूफ थे, मूर्ख थे, गंवार थे। निर्ममता की हद है। निष्ठुरता की हद है। संवेदनहीनता की हद है। क्रूरता की हद है। 

ये पढ़ी लिखी मशीनें- रोबोट हैं। इन्हें इंसान नहीं कहते। इंसानियत न बचे तो उन्हें क्या कहेंगे? जानवर या बेजान दो पांव वाला यंत्र। यह यंत्र कहता है- जानबूझकर मौत के मुंह में गए। अब दस-दस लाख भी तो मिल रहे हैं। इन जाहिलों और पढ़े लिखे अनपढ़ों को कौन बताए कि वे दस लाख रूपए के लिए नहीं, रोज की दस रोटियों के लिए कुर्बान हो गए। 

दस लाख तुम्हें प्यारे होंगे- मूर्खो! उन्हें तो अपनी माटी प्यारी थी। तुम्हें दस लाख चाहिए तो एक बार मर कर दिखाओ। बीवी को दस लाख मिल जाएंगे। जिंदगी चैन से कट जाएगी। दस लाख के लिए ही तो तुम शहर में पढ़- ख कर लाट साहब बनने आए हो।तुम्हारी जरूरत रोटियां नहीं हैं। न तुम रोटियां बेलते हो न रोटियां खाते हो। तुम जैसों के लिए ही तो धूमिल ने तमाचा जड़ा था-

एक आदमी रोटी बेलता है, एक आदमी रोटी खाता है, एक तीसरा आदमी भी है, जो न रोटी बेलता है, न रोटी खाता है, वह सिर्फ रोटी से खेलता है, मैं पूछता हूं- यह तीसरा आदमी कौन है? मेरे देश की संसद मौन है।

Human condolences and big discussion on Social media about Aurangabad train accident 16 migrant workers run over.
रेल की पटरियों से भूख नहीं कटती, देह कटती है। - फोटो : ANI
वे मर गए और तुम उन्हें कानून बता रहे हो। उन्होंने जलते पेट की खातिर जान दी है और तुम उनका माखौल उड़ा रहे हो। बुद्धिजीवियों! उन्हें तुम्हारे आंसू नहीं चाहिए। उन्हें तुम्हारी संवेदनाएं भी नहीं चाहिए। लेकिन उन्हें तुम्हारा उपहास भी नहीं चाहिए। उनकी खिल्ली उड़ाने का उनका अपमान करने का, उनको लांछित करने का तुम्हें हक नहीं है।

छद्म अक्लमंदो! अपने अहसास को मारकर जी रहे हो। कुदरत ने इसलिए तो जिंदगी की नेमत नहीं बख्शी। उन्हें तो हमारे लिए बनाए गए संविधान के तहत मिला जीने का अधिकार चाहिए। करोड़ों लोग अपनी रोजी रोटी खो बैठे हैं और आप कायदे कानून बघार रहे हो। आपके बंजर होते अहसास को चेतावनी अब रेल की पटरियों से कटे शरीर दे रहे है। अदम ने तो पैंतालीस साल पहले इस संकट को सूंघ लिया था, जब इंसानियत हिन्दुस्तान और इंडिया में बंटने लगी थी-

 रंग रोगन से पुता, पहलू में लेकिन दिल नहीं, आज का इंसान भी कागज का पैकर हो गया/ माफ करिए, सच कहूं तो आज हिन्दुस्तान में, कोख ही जरखेज है, अहसास बंजर हो गया 

सब्र की सीमा होती है। व्यवस्था के संचालकों के लिए छिपा हुआ संकेत है। रेल की पटरियों से भूख नहीं कटती। देह कटती है। हर भूखा पटरी पर देह छोड़ने के लिए नहीं आता। कटी देह से निकले रक्त की एक-एक बूंद से एक भूखी देह पैदा होती है। करोड़ों लोगों की बेरोजगारी और भुखमरी से पीड़ित मानवता का शाप मत लीजिए।

हाय री किस्मत कि खाली पेट बच्चा सो गया/ मां के कदमों से लिपट के बारहा मनुहार पे/ क्या गलत है कल को उसकी चेतना बागी बने/ पल रहा है बचपना जो भूख के अंगार पे।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed