Howdy Modi Event: इस बड़ी वजह से अमेरिका में हाउडी मोदी रैली में शामिल होंगे ट्रंप
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इंडियन अमेरिकन द्वारा आयोजित कार्यक्रम हाउडी मोदी की इस समय जोरदार चर्चा है। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ह्यूस्टन में आयोजित होने वाल रैली ‘हाउडी मोदी’ मे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भी शामिल होंगे। ह्यूस्टन शहर में जोरदार बारिश के बावजूद इंडियन अमेरिकन में इस रैली को लेकर जोरदार उत्साह है। कई अमेरिकन लीडर्स के शामिल होने की खबर के बाद कार्यक्रम का महत्व बढ़ गया है।
इस महत्व के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण अगले साल अमेरिका में राष्ट्रपति का होने वाला चुनाव है। हालांकि भाजपा और मोदी की खास प्रशंसक अमेरिकी कांग्रेस सदस्य तुलसी गैबार्ड इस कार्यक्रम में शायद ही शामिल हों। उन्हें आमंत्रित किया गया था, लेकिन उन्होंने रैली में शामिल होने पर सहमति नहीं दी।
ट्रंप की मौजूदगी के कारण रैली खास हुई
नरेंद्र मोदी के लिए आयोजित होने वाले इंडियन अमेरिकन की रैली ‘हाउडी मोदी’ में ट्रंप शामिल होंगे। इसे भारत में एक अलग नजरिए से देखा रहा है। इसे अमेरिका की घरेलू राजनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। इंडियन अमेरिकन की अच्छी संख्या और मोदी की लोकप्रियता से ट्रंप की रैली में शामिल होने के फैसले को जोड़ा जा रहा है।
दरअसल, अगले साल अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव हैं। ट्रंप फिर से राष्ट्रपति पद के दावेदार बन गए हैं। भारतीय नजरिया कहता है कि इंडियन अमेरिकन वोटरों को अपनी तरफ आकर्षित करने के लिए ट्रंप मोदी की रैली में पहुंच रहे हैं।
निश्चित तौर पर इंडियन अमेरिकन अमेरिका में बहुत महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इस नजरिए का सूक्ष्म विश्लेषण जरूरी है। इंडियन अमेरिकन अमेरिकी चुनावों को कितना प्रभावित करते हैं इसे भी देखना जरूरी होगा। अफ्रीकी अमेरिकन, क्यूबन अमेरिकन, मुस्लिम अमेरिकन, मेक्सिकन अमेरिकन आदि आबादी के मुकाबले इंडियन अमेरिकन अमेरिकी राजनीति में कितनी भूमिका निभाते है यह भी देखना होगा।
संख्या अच्छी पर चुनाव परिणाम बदलने की क्षमता नहीं
हालांकि इसमें कोई शक नहीं है कि इस समय अमेरिका में इंडियन अमेरिकन आबादी प्रभावशाली है। लेकिन इंडियन अमेरिकी आबादी क्यूबन अमेरिकी या अन्य दूसरों की तरह अमेरिकी राजनीति में निर्णायक नहीं है, क्योंकि इंडियन अमेरिकन पूरे अमेरिका में बिखरे हुए हैं, जबकि क्यूबन अमरिकन इंडियन अमेरिकन से संख्या में कम हैं, लेकिन फ्लोरिडा जैसे राज्यों में क्यूबन अमेरिकन चुनाव परिणामों को बदलने की क्षमता रखते हैं, क्योंकि वहां उनकी आबादी 11 लाख के करीब है।
इंडियन अमेरिकी किसी भी राज्य में इतनी संख्या में नहीं है कि अमेरिकी में होने वाले चुनाव के परिणाम एक विशेष इलाके में बदल दें। 2010 की अमेरिकी जनसंख्या रिपोर्ट के मुताबिक इंडियन अमेरिकन सबसे ज्यादा कैलिफोर्निया में 5.28 लाख के करीब हैं। इसके बाद न्यूयॉर्क में 3.13 लाख, न्यू जर्सी में 2.92 लाख, टेक्सास में 2.45 लाख हैं।
इंडियन अमेरिकन अमेरिका की कुल जनसंख्या के लगभग 1 प्रतिशत है। 2010 की जनसंख्या रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिका में इंडियन अमेरिकन 28.43 लाख है। लेकिन इस समय अमेरिका में इंडियन अमेरिकन की अनुमानित आबादी लगभग 40 लाख है।
इंडियन अमेरिकन में भी धर्म, प्रांत के आधार पर विभाजन
हालांकि इंडियन अमेरिकन पिछले दो दशक में कैपिटल हिल से लेकर अमेरिकी कांग्रेस और राज्यों की असेंबली में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाई है, लेकिन एक सच्चाई यह है कि इंडियन अमेरिकन अभी भी विज्ञान, चिकित्सा, शिक्षा और व्यापार में ही अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में व्यस्त हैं, वहीं इंडियन अमेरिकन आबादी में धार्मिक विभाजन भी है।
दूसरी तरफ अमेरिकी राजनीति में चुनावी फंड के काफी ज्यादा महत्व के कारण इंडियन अमेरिकन अमेरिकन पॉलिटिक्स से ज्यादा अपने कामकाज पर ध्यान देते हैं। ज़ॉन हॉपकिन्स यूनिवर्सिटी के देवेश कपूर के अनुसार लगभग 10 लाख इंडियन अमेरिकन वोटर ही चुनावों में सक्रिय होते हैं।
दरअसल, इंडियन अमेरिकन वोटर अमेरिका में भी अपनी धार्मिक, जातीय और भाषाई पहचान को खत्म नहीं कर पाए हैं। लगभग 40 लाख इंडियन अमेरिकन आबादी में 51 प्रतिशत हिंदू, 18 प्रतिशत ईसाई, 10 प्रतिशत, मुस्लिम और 5 प्रतिशत सिक्ख हैं। 10 प्रतिशत इंडियन अमेरिकन अपनी धार्मिक पहचान नहीं बताते हैं। अमेरिका में इंडियन अमेरिकन लोगों का जातीय और धार्मिक पहचान बरकरार है।
ट्रंप रिपब्लिकन, ज्यादातर इंडियन अमेरिकन डेमोक्रेट
डोनाल्ड ट्रंप बेशक ह्यूस्टन की हाउडी मोदी में पहुंच रहे हैं। लेकिन ट्रंप इस सच्चाई को जानते हैं कि 75 से 80 प्रतिशत इंडियन अमेरिकन डेमोक्रेटिक पार्टी को समर्थन देते हैं। अमेरिकी राजनीति में सक्रिय इंडियन अमेरिकन बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन के फंड इकठा करने वाले टीम के महत्वपूर्ण सदस्य रहे।
2016 के राष्ट्रपति चुनाव परिणाम के आंकड़ों के अनुसार लगभग 75 प्रतिशत इंडियन अमेरिकन डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन के साथ थे। उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप का जोरदार विरोध किया था। राष्ट्रपति बनने के बाद डोनाल्ड ट्रंप की इमिग्रेशन पॉलिसी से सबसे ज्यादा नाराज इंडियन अमेरिकन है।
भारतीय कूटनीति को सलाह देने वाला एक वर्ग साफ तौर पर यह भी कह रहा है कि भारतीय कूटनीति को अमेरिकी घरेलू पॉलिटिक्स में कोई भूमिका नहीं दिखानी चाहिए। क्योंकि इससे भारतीय हितों को नुकसान होगा।
भारत को इंडियन अमेरिकन के साथ संबंधों को निर्धारित करते हुए एक सीमा रेखा निर्धारित करनी चाहिए जो भारत के विकास, भारत अमेरिका दिपक्षीय व्यापार और भारत के अंतराष्ट्रीय हितों तक सीमित हो। क्योंकि अगर अमेरिकी डेमोक्रेट ग्रुप को यह अहसास हो गया कि ट्रंप इंडियन अमेरिकन वोटों को लेकर मोदी के मंच का इस्तेमाल कर रहे हैं तो वे भविष्य में भारत के खिलाफ मोर्चा खोलेंगे।
दरअसल, अमेरिका की आंतरिक राजनीति में मुस्लिम अमेरिकन, अफ्रीकी अमेरिकन समेत कई और ग्रुप सक्रिय हैं। अमेरिका में पाकिस्तानी अमेरिकन ग्रुप भी है। इस समय कश्मीर को लेकर पाकिस्तान मुस्लिम अमेरिकन और पाकिस्तानी अमेरिकन ग्रुपों को अमेरिकी प्रशासन में लॉबिंग के लिए सक्रीय किया है। यही नहीं हाउडी मोदी कार्यक्रम को विफल बनाने के लिए पाकिस्तानी स्टैबलिशमेंट ने पिछले दिनों खूब सक्रियता दिखाई। लेकिन उनकी योजना विफल रही।
शेल ऑयल लॉबी और डिफेंस लॉबी की सक्रियता
हाउडी मोदी कार्यक्रम में डोनाल्ड ट्रंप के आगमन का एक और कारण अमेरिकी जियोपॉलिटिकल हित और आर्थिक हित भी बताए जा रहे हैं। अमेरिका में रिपबल्किन ग्रुप को अमेरिकी रक्षा और तेल उद्योग का जबरदस्त समर्थन रहा है।
ट्रंप अमेरिकी रक्षा उद्योग और तेल उद्योग के हितों को साधने के लिए भी हाउडी मोदी कार्यक्रम में आ रहे हैं। इस समय अमेरिका का शेल ऑयल इंडस्ट्री रिकॉर्ड तेल उत्पादन कर रहा है। इस समय प्रतिदिन अमेरिका 90 लाख बैरल पेट्रोलियम का उत्पादन कर रहा है।
अमेरिका इस शेल ऑयल को भारतीय बाजार में बेचना चाहता है। भारत दुनिया का एक बड़ा तेल खपत वाला देश है। इस साल भारत तेल उत्पादक देशों से 1.6 अरब बैरल तेल आयात करेगा। चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा बड़ा तेल आय़ातक देश है।
उधर अमेरिका शेल ऑयल इंडस्ट्री अंतराष्ट्रीय बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए ईऱान और वेनजुएला के तेल को अंतराष्ट्रीय बाजार में पहुंचने से रोक रही है। अमेरिकी तेल इंडस्ट्री भारत और चीन के बाजारों पर नजर रखे हुए है।
ट्रंप की अहम इच्छा है कि भारत से अच्छे व्यापारिक संबंध के बीच भारत अमेरिका से अच्छी मात्रा में शेल ऑय़ल खरीदे। यही नहीं भारत दुनिया का बड़ा हथियार खरीदार देशों में शुमार है। अमेरिकी डिफेंस इंडस्ट्री भारत में प्रभावी रूसी डिफेंस इंडस्ट्री को बाहर अपनी हिस्सेदारी को बढ़ाना चाहती है। अमेरिका के यही आर्थिक हित ट्रंप को इंडियन अमेरिकन रैली में आने को मजबूर कर रही है।
हालांकि ट्रंप अगर भारत से कुछ आर्थिक लाभ लेना चाहते है तो उन्हें भारत को कुछ देना होगा। उम्मीद की जा रही है कि दोनों मुल्कों के बीच व्यापार के क्षेत्र में चल रहे विवादों को मोदी के दौरे के दौरान ट्रंप करेंगे। अमेरिका दवारा भारत को व्यापार के क्षेत्र में दी जाने तरजीही व्यापार व्यवस्था (जीएसपी) की सुविधा को दुबारा बहाल किया जा सकता है।
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