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अमृत महोत्सव विशेष: भारत में स्वास्थ्य सेवा सुधार के 75 साल, 'विश्व स्वास्थ्य-गुरु' बनने का लक्ष्य कितना दूर?

Abhilash Srivastava अभिलाष श्रीवास्तव
Updated Mon, 15 Aug 2022 01:06 PM IST
सार

आजादी के बाद शिशु मृत्युदर में महत्वपूर्ण कमी और जीवन प्रत्याशा में सुधार को लेकर किए गए प्रयास के सुखद परिणाम देखे जा रहे हैं। 75 साल में हमने स्वास्थ्य क्षेत्र में क्या हासिल किया, क्या शेष रह गया, इसपर विचार करने के साथ हमें आजादी की स्वर्ण शताब्दी तक दुनिया में स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत के वर्चस्व का लक्ष्य लेकर काम करने की आवश्यकता है।

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How the healthcare system in India has improved post independence, azadi ka amrit mahotsav special story
आजादी के 75 साल में हमने स्वास्थ्य क्षेत्र में महत्वपूर्ण सुधार किए। - फोटो : Amarujala Graphic

विस्तार

देश इस साल 2022 में आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है। 15 अगस्त 1947 का सूरज देश के लिए नई आशाओं और उम्मीद के प्रकाश के साथ उदित हुआ था। अब भारत अपने लिए निर्णय लेने को स्वतंत्र था। प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के नेतृत्व में देश ने सर्वांगीण विकास के पथ पर कई सारी उम्मीदों और योजनाओं के साथ कदम रखा था। सन 1947 के बाद से अब तक हमने विभिन्न क्षेत्रों में दुनिया में नाम कमाया। आजादी के 75 साल में कुछ क्षेत्रों में हम विश्व में अग्रणी रहे, कुछ में इसी लक्ष्य के साथ निरंतर प्रयासरत हैं। भारत विश्वगुरु के सपने और सर्वश्रेष्ठ नेतृत्वकर्ता के लक्ष्य के साथ विकास के पथ पर अग्रसरित है।

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आजादी के 75 साल पूरे होने के इस वर्ष को देश 'अमृत महोत्सव' के रूप में मना रहा है। आजादी के अमृत महोत्सव का मतलब नए विचारों, नए संकल्पों और आत्मनिर्भरता का अमृत है। ‘आजादी का अमृत महोत्सव’ प्रगतिशील भारत की आजादी के 75 साल और इसकी संस्कृति और उपलब्धियों के गौरवशाली इतिहास को मनाने के लिए भारत सरकार की एक पहल है। आइए इस खास अवसर पर हम भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र की प्रगति पर नजर डालते हैं। इन 75 वर्षों में क्या हम स्वास्थ्य क्षेत्र के लिए निर्धारित और आवश्यक लक्ष्य तक पहुंच पाए हैं, कितना पाया-कितना शेष और आने वाले वर्षों में किस प्रकार के प्रयास और सुधार की आवश्यकता है जिसके आधार पर भारत स्वास्थ्य के क्षेत्र में विश्व के लिए मिसाल बन सके?
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स्वास्थ्य क्षेत्र में हमने कितनी प्रगति की इसकी तुलना 1947 और 2022 में करना उचित नहीं है, इसीलिए हम क्रमवार इसपर चर्चा करेंगे। साल 1951 की जनगणना के अनुसार, भारत की जनसंख्या महज 36.1 करोड़ थी, जबकि अब 138 करोड़ से अधिक है, ऐसे में दोनों की तुलना वाजिब भी नहीं है। जब देश आजाद हुआ उस समय साक्षरता दर 18.33% थी। स्वास्थ्य को लेकर कई प्रकार की चुनौतियां थी, उसके सापेक्ष संसाधन न के बराबर, देश अभी तो आजाद हुआ था, इस दौरान कुल जीवन प्रत्याशा 32 वर्ष ही थी।
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शिशु मृत्यु दर 145.6/1000 के करीब थी जो लंबे समय तक देश के लिए बड़ी चुनौती बनी रही। सबसे महत्वपूर्ण, पूरे देश में 50,000 से भी कम डॉक्टर्स और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों की संख्या 725 के करीब थे। सरकार के सामने इस अति आवश्यक क्षेत्र में बड़ी चुनौतियां थीं, जिसपर समय के साथ काम शुरू हुआ। 

पिछले 75 वर्षों में हमारे स्वास्थ्य के क्षेत्र में प्रगति पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों (प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं और सामुदायिक स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं) के बुनियादी ढांचे में सुधार हुआ है। 1951 के बाद से डॉक्टरों की संख्या में नौ गुना वृद्धि हुई है। पर अब भी बहुत कुछ शेष है।

1950-60 का दौर और स्वास्थ्य संकट

साल 1950-60 का दशक अमेरिका जैसे कई देशों के लिए काफी चुनौतीपूर्ण रहा, 1957 में एशियन फ्लू का प्रकोप था। फ्लू के इस संक्रमण को इसलिए भी काफी विपदाकारक माना जा रहा था क्योंकि इससे पहले 1918 में फैले विश्वव्यापी फ्लू के कारण, प्रथम विश्व युद्ध (1914-18) से भी अधिक संख्या में लोगों की मौत हो चुकी थी। मई 1957 में भारत में भी इसका असर देखा गया। मई 1957 से लेकर फरवरी 1958 के बीच यह देश के लिए मुसीबतों के पहाड़ के रूप में टूटा, इस दौरान 44.51 लाख लोग संक्रमित हुए जिसमें से करीब 1100 की मौत हो गई।

भारत के लिए स्वास्थ्य से संबंधित चुनौतियां लगातार बढ़ती रहीं। चेचक, प्लेग, हेपेटाइटिस और पोलियो ने देश की संभलती स्वास्थ्य व्यवस्था के सामने समय-समय पर नई चुनौतियां पेश की। 1990 के दशक तक भारत में पोलियो की समस्या गंभीर बनी रही, हालांकि इस दिशा में तेजी से काम करते हुए जन-जन तक इस लड़ाई में शामिल होने की अपील की गई। जनवरी 2011 से भारत में पोलियो का केस दर्ज नहीं हुआ है।
 
साल 1980-85 के दौर (छठी पंचवर्षीय योजना) तक भारत के लिए जनसंख्या एक बड़ी समस्या के तौर पर उभरना शुरू हो चुकी थी। इसी को ध्यान में रखते हुए इस पंचवर्षीय योजना में जनसंख्या रोकथाम के क्रम में परिवार नियोजन योजनाओं पर जोर दिया गया । नौवी पंचवर्षीय योजना (1997-2002) तक साफ पीने का पानी और प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल, नई चुनौती बनकर उभर रहे थे जिनमें सुधार के लिए योजनाएं बनाई गईं। 

इस वर्ष देश आजादी के 75 साल पूरे कर रहा है, ऐसे में अब तक के सफर पर नजर डालें तो पता चलता है कि देश ने आजादी के बाद सीमित संसाधनों में भी चुनौतियों का सामना किया, समय के साथ इसमें सुधार हुआ और अब प्रगति ऐसी, जिसमें जारी वैश्विक कोरोना महामारी से बचाव के लिए दुनियाभर के कई देशों को भारत ने वैक्सीन की सप्लाई की। पोलियो पर विजय से यह साबित हो गया कि भारत की इच्छाशक्ति बड़ी से बड़ी चुनौतियों को भी छोटा करने की शक्ति रखती है।

75 साल में देश ने वैसे तो स्वास्थ्य क्षेत्र में काफी तरक्की की है, लेकिन अब भी जमीनी स्तर पर कई बड़ी चुनौतियां हैं जिनपर गंभीरता से प्रयास करने की आवश्यकता है।  

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स्वास्थ्य क्षेत्र में भारत ने की प्रगति - फोटो : pixabay

पारंपरिक चिकित्सा पर ध्यान न देना निराशाजनक

भले ही मौजूदा समय में योग-आयुर्वेद को मेडिकल साइंस ने भी कारगर मानते हुए इससे होने वाले लाभ को समर्थन दिया हो, पर वास्तविकता यह है कि भारत ने अपनी इस चिकित्सा विरासत को वर्षों तक नजरअंदाज किया। महर्षि चरक की इस अलौकिक चिकित्सा विधा पर आजादी के बाद से बहुत ध्यान नहीं दिया गया। इसके पीछे कई कारण हो सकते हैं, पर दुर्भाग्यवश साल 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार आने से पहले के शासन में आयुर्वेद और योग की प्रचंड विरासत को बहुत हल्के में लिया जाता रहा।

प्रसिद्ध रूमेटोलॉजिस्ट डॉ अरविंद चोपड़ा एक लेख में लिखते हैं-
 

आयुर्वेद में नवीनतम बदलाव की आवश्यकताओं को लगभग 150 साल पहले ही पहचान लिया गया था। इसमें समय-समय पर हल्के-फुल्के प्रयास हुए लेकिन शायद इसके विकास को बनाए रखने के लिए ये पर्याप्त नहीं थे।


साल 2014 में नरेंद्र मोदी की सरकार बनने के बाद न सिर्फ योग को अंतरराष्ट्रीय  पहचान मिली, 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के तौर पर मनाने की शुरुआत हुई साथ ही कोरोना महामारी के दौरान विश्व के प्रसिद्ध वैज्ञानिकों ने भी माना कि आयुर्वेद और योग का सहारा लेकर इस तरह की गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं के जोखिम को कम किया जा सकता है। 

स्वास्थ्य सुधार का लक्ष्य और हासिल

आजादी के बाद हमारे लिए कई स्तर पर स्वास्थ्यगत चुनौतियां थीं और इन चुनौतियों से यथाशीघ्र निपटते हुए हमें जन-जन तक बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करने पर ध्यान देना था। इसके लिए सन 1946 में भोरे समिति की स्थापना की गई थी। यह भारत की स्वास्थ्य स्थिति का आकलन करने और उसके आधार पर सेवाएं प्रदान करने के लिए जोसेफ विलियम भोरे के नेतृत्व में बनाई गई थी।
 

इस समिति ने प्रति 40,000 की आबादी के लिए एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने का सुझाव प्रस्तुत किया। प्रत्येक पीएचसी में 2 डॉक्टर, एक नर्स, चार सार्वजनिक स्वास्थ्य नर्स, चार दाइयों, दो स्वच्छता निरीक्षक, दो स्वास्थ्य सहायक, एक फार्मासिस्ट और पंद्रह अन्य चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को शामिल करने का सुझाव था। इससे जन-जन तक स्वास्थ्य सेवाओं को उपलब्ध कराने में आसानी मिल सकती थी। समिति के प्रस्तावों को 1952 में भारत सरकार ने स्वीकार भी किया, हालांकि उस समय समिति की अधिकांश सिफारिशों को लागू नहीं किया गया था।


इंस्टिट्यूट ऑफ़ ह्यूमन बिहेवियर एंड अलाइड साइंसेज में मनोचिकित्सा के प्रोफेसर डॉ ओमप्रकाश कहते हैं, 75 वर्षों की स्वास्थ्य के क्षेत्र में हमारी यात्रा पर नजर डालें तो निश्चित ही हमने बड़ी उपलब्धियां हासिल की हैं, पर कुछ बड़ी कमियां रह गई हैं जो अब भी बनी हुई हैं।

''हमने बड़े-बड़े स्वास्थ्य संस्थान तो बनाए, जोकि बहुत आवश्यक और तारीफ के काबिल काम है, पर इसी के विपरीत हमने प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं, वहां के डॉक्टर्स के विकास के लिए वह नहीं किया जिसकी आवश्यकता थी। लिहाजा स्वास्थ्य सेवाओं का सारा दबाव आज एम्स, पीजीआई जैसे बड़े संस्थानों पर है। जबकि कायदे से होना ये चाहिए था कि देश के स्पेशलिस्ट सेंटर्स में गंभीर समस्याओं का इलाज होता और सामान्य समस्याएं प्राथमिक रूप से ठीक की जातीं।''
 

अगर 75 साल का एक हेल्थ सिस्टम रिव्यू किया जाए तो पता चलता है कि हमने चाहे-अनचाहे बड़े संस्थानों पर अतिरिक्त दबाव बढ़ा दिया है। एक और गंभीर विषय यह भी है कि हम बार-बार कहते हैं कि देश में स्वास्थ्य विशेषज्ञों की कमी है पर क्या हमने इसके कारणों पर विचार किया? भारत में प्रैक्टिस करने के बाद डॉक्टर्स विदेश चले जाते हैं, इसके लिए प्रमुख कारण है कि हमने इनको वैल्यू ही नहीं किया, यह कई स्तरों का हो सकता है। इसी तरह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के विशेषज्ञ को सरकारें इंसेंटिव नहीं देती हैं, लिहाजा साल-दर साल शुरुआती चिकित्सा सेवाओं की स्थिति बिगड़ती जा रही है। 


आने वाले वर्षों में एक लक्ष्य के तौर पर हमें स्वास्थ्य मशीनरी पर विशेष काम करने की जरूरत है जिससे छोटी समस्याओं के लिए एम्स जैसे बड़े संस्थानों पर अतिरिक्त दबाव न बनने पाए। स्वास्थ्य सेवाओं को क्रमवर बनाकर हम अस्पतालों और विशेषज्ञों पर बढ़ रहे अनावश्यक दबाव को कम कर सकते हैं। दूसरा- सरकारों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में सुविधाएं और लोगों में इसके प्रति विश्वसनीयता को बढ़ावा देना होगा जिससे जन-जन तक व्यवस्थित रूप से सेवाएं पहुंच सकें।

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प्राथमिक स्तर पर स्वास्थ्य सुधार के लिए प्रयास जरूरी - फोटो : istock

ग्रामीण क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता

आजादी के बाद शिशु मृत्युदर में महत्वपूर्ण कमी और जीवन प्रत्याशा में सुधार को लेकर देश में किए गए प्रयास के सुखद परिणाम देखे जा रहे हैं। सरकार ने देश में स्वास्थ्य सुविधाओं में सुधार के लिए कई नीतियां और योजनाएं शुरू की हैं। 2018 में, केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (ABPM-JAY) शुरू की गई थी, जो दुनिया की सबसे बड़ी सरकार द्वारा वित्त पोषित स्वास्थ्य आश्वासन/ बीमा योजना है। इस योजना से हर साल अनुमानित 6 करोड़ लोगों को सीधा लाभ मिल रहा है।

इसके अलावा प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना जैसी कई अन्य योजनाएं भी हैं, जिससे देश में चिकित्सा की गुणवत्ता में सुधार हुआ है। मोबाइल और इंटरनेट की बढ़ती पहुंच ने ऑनलाइन फ़ार्मेसीज़ और ऑनलाइन डॉक्टर परामर्श से लोगों को जोड़कर आसानी से इलाज प्राप्त करना आसान कर दिया है। 

स्वास्थ्य के संबंध में और सुधार कैसे किए जा सकते हैं, इस बारे में डायबिटर्स मंच पर भारत के प्रतिनिधि और वरिष्ठ मधुमेह रोग विशेषज्ञ डॉ वसीम गौहरी कहते हैं-

इसमें कोई संदेह नहीं है कि हमारे सभी नागरिकों को गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने में हर संभव प्रयास किए हैं। अब जब हम आजादी के 100 साल की ओर बढ़ रहे हैं, कुछ लक्ष्यों पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। ऐसे प्रयास किए जाने की आवश्यकता है जिससे लोगों में (विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में) स्वास्थ्य और स्वास्थ्य के महत्व को लेकर जागरूकता बढ़ाई जा सके। कुछ चुनौतियों पर सरकार को गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है। 
 

शारीरिक स्वास्थ्य पर ध्यान केंद्रित करने की दिशा में हमें किसी भी स्तर पर मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज नहीं करना है। बड़े अस्पतालों में लंबे समय तक प्रतीक्षा के कारण अक्सर असमय मृत्यु हो जाती है, प्राथमिक स्तर पर इलाज की गुणवत्ता में सुधार कर बड़े अस्पतालों पर दबाव को कम किया जा सकता है। शहरी और ग्रामीण भारत के बीच स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में भारी अंतर है। सरकारी अस्पतालों में इलाज की गुणवत्ता और यहां के डॉक्टर्स को प्रोत्साहित करने पर काम किया जाना चाहिए।


सबसे खास बात स्वास्थ्य सेवाओं के लिए जीडीपी आवंटन में इजाफा (2021 में 2.1%) बहुत आवश्यक है, जिससे इंफ्रास्ट्रक्चर और सेवाओं को बढ़ाया जा सके। 

स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश पर देना होगा जोर

किसी भी देश के सर्वांगीण विकास को सुनिश्चित करने के लिए जनसंख्या-अर्थव्यवस्था के सामंजस्य को बनाए रखना और बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना मूलभूत आवश्यकताओं में से एक है। स्वास्थ्य देखभाल क्षेत्र को सिर्फ एक इकाई के रूप में नहीं देखा जा सकता है, क्योंकि यह आर्थिक, शैक्षिक और औद्योगिक क्षेत्र के विकास की धुरी है। स्वास्थ्य की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए साल 1970 के दशक में  विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ)  ने 'हेल्थ फॉर ऑल' गोल सेट किया, जिसका लक्ष्य दुनिया भर के लोगों की सेहत को बेहतर बनाना था। 

स्वतंत्रता के समय हमारा स्वास्थ्य बुनियादी ढांचा काफी कमजोर था जिसमें सीमित संख्या में सरकारी मेडिकल कॉलेज और अस्पताल थे। वैद्यों, हकीमों, कुछ अर्ध-प्रशिक्षित कंपाउंडरों और सीमित संख्या में प्रशिक्षित डॉक्टरों द्वारा स्वास्थ्य देखभाल की अधिकांश ज़रूरतों को पूरा किया जाता था। जब हमारे नेताओं ने संविधान का मसौदा तैयार किया, तो इसमें स्पष्ट रूप से स्वास्थ्य के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में मान्यता नहीं दी गई, हालांकि, न्यायिक व्याख्या के माध्यम से, इसे जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का हिस्सा मान लिया गया था। 

डॉ. समीर प्रभाकर, (सीनियर कंसल्टेंट, प्लास्टिक सर्जरी विभाग) कहते हैं, आजादी के बाद सरकार स्वास्थ्य क्षेत्र के महत्व को जानती थी और इसलिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल और मेडिकल कॉलेज बनाकर एक सुव्यवस्थित स्वास्थ्य देखभाल नेटवर्क विकसित किया गया। विजन और प्लानिंग अच्छी थी लेकिन क्रियान्वयन और मंशा में कमी लगातार बनी रही।

इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि स्वास्थ्य क्षेत्र को हमेशा ऐसे  रूप में देखा गया जिसके लिए धन और जनशक्ति की आवश्यकता होती है, न कि एक ऐसे निवेश के रूप में जो लंबे समय में पूरे समुदाय और देश को लाभ दे सकती है। समय के साथ सरकार ने रियायती दरों पर जमीन उपलब्ध कराकर कई बड़े अस्पताल स्थापित करने में मदद की ताकि निजी अस्पताल में आम जनता को सुपर स्पेशियलिटी देखभाल प्रदान की जा सके पर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की स्थिति में बहुत खास सुधार नहीं हुआ। 
 

विश्व स्वास्थ्य संगठन की स्वास्थ्य की परिभाषा "पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण'' पर जोर देती है, लेकिन हमारा समाज ज्यादातर समय इस समग्र दृष्टिकोण के प्रतिकूल ही पाया गया है। हम पाश्चात्य संस्कृति का आंख मूंदकर पालन कर रहे हैं पर व्यक्ति के सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य की मूलभूत आवश्यकताओं को दरकिनार किया जाता रहा है। कोविड महामारी के उद्भव के साथ, इसने हमारी स्वास्थ्य प्रणाली के खोखलेपन को उजागर कर दिया।


अब समय आ गया है कि हमें इस बात को महसूस करना चाहिए और एक स्वस्थ और समृद्ध राष्ट्र बनाने के लिए अपनी ऊर्जा और धन को स्वास्थ्य क्षेत्र में बहुत आवश्यक रूप से चाहिए। स्वास्थ्य क्षेत्र को कभी भी प्रत्यक्ष राजस्व उत्पन्न करने वाले क्षेत्र के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे सरकार द्वारा निवेश के रूप में माना जाना चाहिए जो देश के लिए दीर्घकालिक और निरंतर आर्थिक और सामाजिक विकास प्रदान करेगा।

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बेहतर स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की दिशा में प्रयास जरूरी - फोटो : iStock

नई आशा-नई उम्मीद के साथ आगे बढ़ने की जरूरत

75 साल में हमने स्वास्थ्य क्षेत्र में क्या हासिल किया, क्या शेष रह गया, इसपर विचार के साथ हमें आजादी की स्वर्ण शताब्दी तक दुनिया में स्वास्थ्य के क्षेत्र में भारत के वर्चस्व का लक्ष्य लेकर काम करने की आवश्यकता है।

दिल्ली में इंटरनल मेडिसिन विभाग के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ श्रेय कहते हैं-
 

अब तक हमने दुनिया को दिखाया कि स्वास्थ्य समस्याओं, महामारी पर विजय प्राप्त करने के क्षेत्र में हम काफी परिपक्व हैं। भारतीय हेल्थ केयर सिस्टम द्वारा उठाए गए योजनाबद्ध कदम का ही परिणाम है कि भारत से कुष्ठ रोग, पोलियो, चेचक जैसी कई बीमारियां या तो खत्म हो गई हैं या फिर इस दिशा में निर्धारित लक्ष्य के हम बहुत करीब हैं। हमें इस जज्बे को और प्रबलता के साथ कायम रखने की जरूरत है। 


हमने चिकित्सा और दवाओं से संबंधित शोध में जबरदस्त काम किया है। अब हम कई सारी दवाओं और उपकरणों के दुनिया में सबसे बड़े निर्माता हैं। मौजूदा और उभरती प्रौद्योगिकियां भविष्य में स्वास्थ्य सेवा उद्योग पर सकारात्मक प्रभाव देने के लिए तैयार हैं। आजादी के बाद हमारी स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली अद्भुत रूप से विकसित हुई है लेकिन अभी भी बहुत सारे सुधार किए जाने बाकी हैं, जन-जन तक आसानी से स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध हो सकें इसके लिए जमीनी स्तर पर विशेषरूप से ग्रामीण भारत में काम करने की जरूरत है। 

हम इसी आशा और लक्ष्य के साथ आगे बढ़ रहे हैं कि आज के 25 साल बाद जब भारत आजादी की स्वर्ण शताब्दी मना रहा होगा, तब भारत स्वास्थ्य क्षेत्र में अग्रणी रहते हुए पूरी दुनिया के लिए अपने स्वभाव के अनुरूप सेवार्थ खड़ा मिलेगा, भारत तब विश्व स्वास्थ्य-गुरु की भूमिका में होगा।

जय हिंद-जय भारत



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। लेखक को ट्विटर (@mediabhii) पर फॉलो कर सकते हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
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