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पश्चिम बंगाल चुनाव परिणाम विश्लेषण: हारकर भी जीत गई बीजेपी, असली परीक्षा तो ममता बनर्जी की है..!

Wed, 05 May 2021 01:17 PM IST
Deepak Singhal दीपक सिंघल
Updated Wed, 05 May 2021 01:17 PM IST
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how bjp is in profit in west bengal elections know political analysis and BJP's Prospects
क्या भाजपा की मेहनत बंगाल में रंग लाई है? - फोटो : PTI

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की प्रबल जीत के आसार प्रबल होते ही उनके पार्टी नेताओं, समर्थकों के "खेला' हो गया का प्रलाप करना, उन्हें फाइटर, तृणमल की जीत की राइटर आदि प्रमाणपत्र जारी करना तो जायज था, लेेेेेकिन समस्त गणित को भी एक साथ रखकर कोई यह नहीं बता पा रहा कि भाजपा पश्चिम बंगाल में हारी कैसे है?

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अर्थशास्त्र का सिद्धांत है कि हारता वो है जिसके पास पहले से कुछ ज्यादा होता है। यानी तीन रुपए थे, एक रुपया चला गया, या ऐसा ही कुछ और। अब यहां तो रुपया क्या आने-दो आने भी नहीं गए, बल्कि 74 रुपए और आ गए हैं। यही नहीं, सामने जमा राजा भी धूल धूसरित हो गया। और यह सब हुआ केवल पिछले पांच वर्षों में। कुछ और जोड़ें तो आपकी मर्जी, लेकिन यह भी ना भूलें कि भाजपा के पास भाषा की मुश्किल थी, कार्यकर्ताओं की कमतरता थी तो लगातार हिंसा का प्रकोप भी झेलना पड़ा था।
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क्या आपको मालूम है कि ममता बनर्जी को वाम सरकार उखाड़ने में कितने वर्ष लगे थे, 13 वर्ष! जबकि वे तो स्थानीय थीं और 1976 से राजनीति में उतरने से पहले छात्र संगठनों में सक्रिय भी रही थीं, कांग्रेस संग गठबंधन भी था?
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जी हां, 1998 में कांग्रेस से नाता तोड़ कर उन्होंने तृणमूल कांग्रेस की स्थापना की और 2011 में सत्ता हासिल की। बावजूद इसके कि उनके साथ कांग्रेस के अनेक दिग्गज नेता व मजबूत काडर भी चला आया था, जो राज्य में वाम शासन से उकता चुका था, या यूं कहें कि कांग्रेस के राज्य में वाम की बी टीम बनते-बनते तंग आ चुका था।

यह भी याद कर लें कि 2001 में तृणमूल ने कांग्रेस से ही हाथ मिलाया और विधानसभा चुनाव में 60 सीटों पर जीतीं। वहीं, यह गठबंधन 2006 के विधानसभा चुनाव में सिर्फ 30 सीटों पर हाथ साफ कर सका। यह भी कि वर्ष 2004 के लोकसभा चुनावों में तृणमूल कांग्रेस को राज्य की 42 में महज एक ही सीट मिली थी, वह भी सीट ममता की ही थी।

इस मुकाबले भाजपा हारी है की जीती, तय आपको करना है। यह भी तय कीजिए कि क्या ममता की जीत संभव थी, यदि वे जय श्री राम के नारों पर मुकदमे दर्ज करवाती रहतीं, मां दुर्गा के पंडाल ना लगवाकर छवि ना सुधारतीं और रैलियों में चंडी पाठ ना करतीं? यह भी कि भाजपा को किसी भी कीमत पर रोकने के लिए कांग्रेस, वाम, ओवैसी और पीरजादा छद्म रूप से हथियार ना डालते तो?

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बंगाल में भाजपा विपक्ष में होगी, जाहिर है ममता सरकार के लिए चुनौतियां कम नहीं होंगी। - फोटो : PTI

खेला' तो हुआ। यह नहीं कि ममता जीत गईं, यह भी नहीं कि उन्हें समुदाय विशेष के कांधों से एक बार फिर कुर्सी मिली है, वरन् यह कि वाम और कांग्रेस दोनों जीरो हो गए। अमूमन जहां अपने दुश्मन का उम्मीदवार ताकतवर हो, वहां मोदी-शाह को हराने के लिए अपने कदम पीछे खींचना विरोधियों की रणनीति में छुटपुट रूप से शामिल रहा है, लेकिन पूरे राज्य से गायब हो जाना, यह एक नई तरह की राजनीति का बीजारोपण है। देखा जाए तो आने वालेे समय मुश्किलें तो ममता बनर्जी की शुरू होने जा रही है क्योंकि उसके सामने विपक्ष के रूप में कांग्रेस और वाम नहीं बल्कि भाजपा है।

राज्य की सत्ता ना सही लेकिन राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बन जाना और विधानसभा में ममता की नाक के नीचे उसे लगातार चुनौती देने का सिलसिला जब शुरू होगा तो अंदाजा लगाइए ममता बनर्जी के लिए काम करना और मनमानी करना आसान नही होगा।

दरअसल, हर बार सरकार की ओर से निर्णय लेने के लिए विपक्ष का अप्रत्यक्ष भय ममता सरकार पर मंडराता रहेगा। यही नहीं भाजपा पांच साल में अंदर ही अंदर विपक्ष के तौर पर कार्य करते हुए जनता के बीच अपनी खास जगह बनाने में सफल होगी ही। दावे के साथ इसलिए यह बात की जा सकती है क्योंकि केवल चुनाव भर लड़ते हुए जब 70 से ज्यादा सीटें हासिल की है तो ममता सरकार के खिलाफ मुख्य विपक्षी पार्टी की भूमिका में भगवा दल और आक्रामक हो जाएगा। आने वाले समय मेें भाजपा की यह कथित हार भविष्य में उसकी ऐतिहासिक विजयश्री की नींव बनेगी।     

जाहिर है भाजपा हारकर भी जीत गई है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।
 

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