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Holi 2025: खुशहाल होली और हरित होली, आखिर कैसे निभाएं परंपरा निभाएं और बचाएं पर्यावरण

Tue, 11 Mar 2025 12:32 PM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Tue, 11 Mar 2025 12:32 PM IST
सार

होली के दौरान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कई कारक देखे जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से रासायनिक रंगों का प्रयोग, पानी की अत्यधिक बर्बादी और होलिका दहन से उत्पन्न वायु प्रदूषण शामिल हैं।

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Holi 2025 Happy Holi Green Holi follow the tradition and save the environment
होली पर पर्यावरण का ख्याल कैसे रखें? - फोटो : Amar Ujala

विस्तार

होली रंगों और खुशियों का त्योहार है, जहां लोग प्रेम और उत्साह के साथ एक-दूसरे को रंग लगाते हैं। यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और होलिका दहन की परंपरा प्रह्लाद की भक्ति और हिरण्यकश्यप के अहंकार के अंत की कथा से जुड़ी हुई है। यह त्योहार समाज में भाईचारे और एकता को बढ़ावा देता है, जहां जाति, धर्म और वर्ग भेद मिटाकर सभी लोग मिलकर इसे मनाते हैं।

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किंतु बदलते समय के साथ होली मनाने का तरीका भी बदल गया है। पहले जहां यह पर्व प्राकृतिक रंगों और सामाजिक समरसता के साथ मनाया जाता था, वहीं आज इसमें रासायनिक रंग, पानी की बर्बादी, प्लास्टिक कचरा और हुड़दंग जैसी समस्याएं भी शामिल हो गई हैं।
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वर्तमान में मनाई जा रही होली का पर्यावरण पर गहरा प्रभाव पड़ता है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों की हानि होती है और कई स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं। ऐसे में आवश्यक है कि हम अपनी परंपराओं का सम्मान करते हुए, पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी निभाएं और होली को स्वच्छ, सुरक्षित और पर्यावरण के अनुकूल बनाएं।
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होली का पर्यावरण पर प्रभाव

होली के दौरान पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाले कई कारक देखे जाते हैं, जिनमें मुख्य रूप से रासायनिक रंगों का प्रयोग, पानी की अत्यधिक बर्बादी और होलिका दहन से उत्पन्न वायु प्रदूषण शामिल हैं। पहले होली में प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता था, जो फूलों, चंदन, हल्दी और अन्य हर्बल चीजों से बनाए जाते थे। लेकिन आज बाजार में मिलने वाले अधिकतर रंग सिंथेटिक होते हैं, जिनमें लेड, पारा, क्रोमियम और अन्य भारी धातुएं होती हैं।

ये रंग न केवल त्वचा और आंखों के लिए हानिकारक होते हैं, बल्कि जल स्रोतों को भी प्रदूषित करते हैं। होली के बाद जब ये रंग पानी में बहाए जाते हैं, तो ये नदियों, तालाबों और झीलों में घुलकर जलीय जीवों के लिए खतरा पैदा करते हैं।

होलिका दहन भी पर्यावरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है। परंपरागत रूप से यह बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है, लेकिन वर्तमान में इसे गलत तरीके से अपनाया जाने लगा है। 

बड़ी संख्या में लकड़ी जलाने से न केवल वनों की कटाई को बढ़ावा मिलता है, बल्कि इससे उत्पन्न धुआं वायु प्रदूषण को भी बढ़ाता है। कुछ स्थानों पर लोग प्लास्टिक, कचरा और अन्य हानिकारक पदार्थ जलाते हैं, जिससे कार्बन मोनोऑक्साइड, सल्फर डाइऑक्साइड और अन्य जहरीली गैसें निकलती हैं। इससे न केवल पर्यावरण दूषित होता है, बल्कि सांस की बीमारियां भी बढ़ती हैं।

शरारत के लिए पानी की बर्बादी 

इसके अलावा, होली खेलने में पानी की अत्यधिक खपत होती है। विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में पानी के गुब्बारों और रंगों से भीगे कपड़ों को धोने के कारण हजारों लीटर पानी बर्बाद होता है। कई शहर और गांव पहले से ही जल संकट का सामना कर रहे हैं, ऐसे में होली के दौरान पानी का असावधानीपूर्वक उपयोग पर्यावरण पर नकारात्मक प्रभाव डालता है। हमें यह समझना होगा कि पानी एक अनमोल संसाधन है और इसकी बर्बादी को रोकना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।

हुड़दंग और सामाजिक चुनौतियां

होली को खुशी और मेल-जोल का पर्व माना जाता है, लेकिन कई बार यह अनुशासनहीनता और हुड़दंग का रूप भी ले लेता है। कई जगहों पर होली के नाम पर शराबखोरी, अभद्रता और जबरदस्ती रंग लगाने जैसी घटनाएं देखने को मिलती हैं।

विशेष रूप से महिलाओं के लिए यह त्योहार असहज हो सकता है, क्योंकि कई बार लोग जबरन रंग लगाने और छेड़छाड़ जैसी घटनाओं को "होली का मजाक" कहकर टालने की कोशिश करते हैं। यह न केवल सामाजिक मर्यादाओं का उल्लंघन है, बल्कि त्योहार की पवित्रता को भी दूषित करता है।

इसके अलावा, कुछ लोग होली के दौरान तेज आवाज में डीजे और पटाखों का उपयोग करते हैं, जिससे ध्वनि प्रदूषण बढ़ता है। यह विशेष रूप से वृद्ध लोगों, बीमार व्यक्तियों और छोटे बच्चों के लिए परेशानी का कारण बनता है।

त्योहार का आनंद उठाना सभी का अधिकार है, लेकिन यह दूसरों की असुविधा का कारण नहीं बनना चाहिए। इसलिए होली को संयम और मर्यादा के साथ मनाना आवश्यक है, ताकि यह वास्तव में भाईचारे और आनंद का प्रतीक बना रहे।

पर्यावरण-अनुकूल होली के उपाय

होली को पर्यावरण-संवेदनशील बनाना मुश्किल नहीं है, बस इसके लिए थोड़ी जागरूकता और सामूहिक प्रयासों की आवश्यकता है। सबसे पहले, हमें रासायनिक रंगों के स्थान पर प्राकृतिक रंगों का उपयोग करना चाहिए। फूलों से बने रंग, हल्दी, चंदन और मेंहदी जैसे विकल्प न केवल पर्यावरण के लिए सुरक्षित हैं, बल्कि त्वचा और स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक हैं। इसके अलावा, यदि बाजार में हर्बल रंग उपलब्ध नहीं हैं, तो घर पर ही आटा, बेसन या मैदा से सूखा गुलाल तैयार किया जा सकता है।

"सूखी होली" मनाने पर जोर दिया जाना चाहिए

पानी की बचत के लिए "सूखी होली" मनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। रंगों से खेलने का आनंद सूखे गुलाल से भी लिया जा सकता है, जिससे पानी की बर्बादी को रोका जा सकता है। यदि पानी का उपयोग करना ही है, तो इसे सीमित मात्रा में और सोच-समझकर किया जाए। पानी के गुब्बारों और पिचकारियों के अनावश्यक उपयोग से बचना चाहिए, क्योंकि इससे पानी की खपत बढ़ती है और कई बार चोट लगने की घटनाएं भी होती हैं।

लकड़ी की बचत हो तो अच्छा है

होलिका दहन को अधिक पर्यावरण-अनुकूल बनाने के लिए पारंपरिक लकड़ी के बजाय गोबर के उपले और कृषि अपशिष्ट का उपयोग किया जा सकता है। इससे लकड़ी की कटाई कम होगी और वायु प्रदूषण भी नियंत्रित रहेगा। कुछ स्थानों पर "सामूहिक होलिका दहन" की परंपरा शुरू की जा रही है, जिसमें एक ही स्थान पर सभी लोग मिलकर होली जलाते हैं, जिससे लकड़ी की बर्बादी कम होती है। इस तरह की पहल को अधिक बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

साथ ही, होली के दौरान स्वच्छता बनाए रखना भी बहुत जरूरी है। त्योहार के बाद प्लास्टिक की पन्नियों, रंगों और अन्य कचरे को इधर-उधर न फेंकें। सफाई का विशेष ध्यान रखें और सार्वजनिक स्थानों को स्वच्छ बनाए रखें। यदि हम अपने आस-पास के लोगों को भी सफाई के महत्व के बारे में जागरूक करें, तो यह त्योहार और भी अधिक सकारात्मक और अर्थपूर्ण बन सकता है।

रंग ऐसे खेलें जो दिलों को जोड़ें

इस बार होली मनाते समय संकल्प लें कि हम प्राकृतिक रंगों का उपयोग करेंगे, पानी की बचत करेंगे, सफाई का ध्यान रखेंगे और त्योहार को सम्मानजनक तरीके से मनाएंगे। आखिरकार, होली का असली मकसद खुशियां फैलाना और रिश्तों को मजबूत बनाना है, न कि प्रकृति को नुकसान पहुंचाना। जब हम पर्यावरण और समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाते हुए होली मनाएंगे, तब यह वास्तव में रंगों का त्योहार बनेगा। "रंग ऐसे खेलें जो दिलों को जोड़ें, न कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाएं!"



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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