विश्व साहित्य का आकाश: विक्टर फ्रैंकल की लोगोथेरेपी
डॉ. विक्टर फ्रैंकल अपनी किताब ‘मैन्स सर्च फॉर मीनिंग’ में कहते हैं, होलोकास्ट से बचे हुए अधिकतर लोग अपने अनुभव पर बात करना पसंद नहीं करते थे, क्योंकि जो अंदर थे उन्हें किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं थी और जो अंदर नहीं थे वे अंदर वालों के अंदर और बाहर आने के अनुभव को समझेंगे नहीं।
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होलोकास्ट का सदमा इतना गहरा एवं आकार में इतना भयंकर और बड़ा था कि लोग इससे बचने पर स्तंभित थे। कुछ को इतने बड़े हादसे, नरसंहार पर विश्वास नहीं हो रहा था। डॉ. विक्टर फ्रैंकल अपनी किताब ‘मैन्स सर्च फॉर मीनिंग’ में कहते हैं, होलोकास्ट से बचे हुए अधिकतर लोग अपने अनुभव पर बात करना पसंद नहीं करते थे, क्योंकि जो अंदर थे उन्हें किसी व्याख्या की आवश्यकता नहीं थी और जो अंदर नहीं थे वे अंदर वालों के अंदर और बाहर आने के अनुभव को समझेंगे नहीं।
गुंटर ग्रास के देश के लोगों ने घोषणा कर दी कि अब कुछ नहीं लिखा जाएगा। उन लोगों के सामने थियोडोर एडोर्नो का निषेध था, उसने कहा था, ‘ऑश्वित्ज के बाद कविता लिखना बर्बर है।’ पर होलोकास्ट के बचे लोगों में से कुछ ने लेखन किया जाहिर है, यातना शिविरों के अपने अनुभवों को साझा किया, कुछ ने संस्मरण लिखे, कुछ ने उपन्यास तो कुछ ने कहानी लिखी। कुछ ने इन अनुभवों को फिल्म में ढ़ाला।
इमरे कर्टिज ने लिखा, आत्मदया अथवा सहानुभूति अर्जित करने के लिए नहीं, मगर मोचन केलिए, मुक्ति के लिए लिखा। अगर कोई उनसे पूछे, क्या है जो उन्हें जीवित रखे हुए था तो वे बेहिचक कहते: ‘प्रेम’! कुछ इसी से मिलती-जुलती बात होलोकास्ट से बचे हुए प्राइमो लिवाई एवं विक्टर ई फ्रैंकल कहते हैं। प्रेम ने इन लोगों को इन अमानवीय, क्रूर एवं कठिनतम परिस्थितियों में भी जीवित रखा, उन्हें उनके अस्तित्व को बचाए रखने में सहायता की। पत्नी के चेहरे की याद ने, बच्चों की स्मृति ने इन लोगों को बचाए रखा।
'प्रेम चरम है'
फ्रैंकल को पहली बार उन कवियों और चिंतकों की बुद्धिमानी का ज्ञान हुआ जो कहते हैं कि प्रेम चरम है। उन्हें काव्य एवं विचारों-विश्वासों का रहस्य मिला जिन्होंने कहा है, मनुष्य की मुक्ति प्रेम के द्वारा है और मनुष्य की मुक्ति प्रेम में है। जब और कुछ नहीं है तब भी प्रिय को याद करके आनंद के क्षण मिल सकते हैं। प्रेम भौतिक शरीर के पार जाता है, आध्यात्मिक अस्तित्व में, अंतस में जाता है।
वे कहते हैं यदि तब उन्हें ज्ञात होता कि उनकी पत्नी मारी जा चुकी है (पहले उन्हें पता नहीं था), तब भी वे उससे बातें करते। उन्हें कवि की पंक्ति स्मरण होती, ‘अपने हृदय पर मुझे मुहर की तरह लगा लो, प्रेम मृत्यु जितना ही मजबूत है।’ न केवल मनुष्यों, वरन पशु-पक्षियों, प्रकृति से प्रेम भी व्यक्ति विशेष को शक्ति प्रदान करता है।
विक्टर फ्रैंकल के होलोकास्ट से बचे रहने का एक प्रमुख कारण था उनका पढ़ा-लिखा एवं प्रशिक्षित होना। वे दार्शनिक, प्रशिक्षित मनोचिकित्सक एवं मस्तिष्क के कुशल सर्जक थे। उन्होंने न केवल स्वयं को बचाए रखा बल्कि दूसरों को बचाने में सहायता की। कई लोगों को हताशा-निराशा के गर्त से उबारा। उन्होंने दो अवसर पर लोगों को आत्महत्या करने से बचाने की कोशिश की। वे लोगों केलिए काउंसिलिंग किया करते।
यातना शिविर से बचने के बाद उन्होंने फ्रायड के स्तर की एक अन्य और सकारात्मक मन:चिकित्सा की प्रणाली ‘लोगोथेरेपी’ विकसित की। जैसे फ्रायड ‘विल टू प्लेजर’ की बात करते हैं, एल्फ्रेड एडलर ‘विल टू पावर’ का सिद्धांत देते हैं, वैसे ही विक्टर फ्रैंकल की लोगोथेरेपी ‘विल टू मीनिंग’ के सिद्धांत पर आधारित है।
‘लोगोथेरेपी’ का सार है, ‘विल टू मीनिंग’। जिंदगी से तुम क्या चाहते हो, इस पर जोर न दे कर यह सिद्धांत एक भिन्न नजरिया पेश करता है, ‘जिंदगी तुमसे क्या चाहती है।’ फ्रैंकल कहते हैं कि जिंदगी तुमसे जो चाहती है, वह और कोई पूरा नहीं कर सकता है, तुम और मात्र तुम कर सकते हो। कम-से-कम एक व्यक्ति इस दुनिया में ऐसा है, जिसको तुम्हारी आवश्यकता है।
दुनिया के लिए भले ही तुम एक आदमी हो, पर इस आदमी के लिए तुम दुनिया हो। अत: प्रत्येक व्यक्ति को जिंदगी का अर्थ जानने की इच्छा रखनी चाहिए।
विक्टर फ्रैंकल ने 39 किताबें लिखीं, आत्मकथात्मक ‘मैन्स सर्च फॉर मीनिंग’ उनकी बेस्ट सेलर किताब है। यह संस्मरण दो भाग में बंटा हुआ है, पहला हिस्सा उनके यातना शिविरों के अनुभव को दिखाता है। दूसरा भाग उनके संघर्ष को सबके लिए महत्वपूर्ण बनाता है। पहले भाग में वे अपने एवं यातना शिविर में रह रहे अन्य लोगों के भावात्मक, आध्यात्मिक अनुभवों को बताते हैं। वे सारी बातें बहुत नम्रता के साथ चित्रित करते हैं।
पेज 36 में वे लिखते हैं, आत्महत्या का विचार प्राय: प्रत्येक के मन में आता, भले ही क्षणांश मात्र हेतु। स्थिति की हताशाजनक स्थिति, मौत के सिर पर निरंतर झूलते रहने, दूसरों की मौत देख कर यह विचार उत्पन्न होता।
पहला हिस्सा जितना लोमहर्षक है, दूसरा हिस्सा उतना ही पूरी मानवता केलिए लाभकारी है। इस भाग में वे सफलतापूर्वक दिखाते हैं कि उन्होंने अपने एवं दूसरों के यातना शिविरों के अनुभव से क्या सीखा, प्रत्येक आदमी उनके इस अनुभव से प्राप्त निचोड़ से अपना जीवन संवार सकता है। हम कष्ट एवं पीड़ा को रोक नहीं सकते हैं, लेकिन इसका सामना करने का रास्ता चुन सकते हैं, इसमें भी अर्थवत्ता खोज सकते हैं, और इस तरह अपने उद्देश्य को लेकर आगे जा सकते हैं।
बहुत सारे लोग न तो उनके यातना शिविरों के जीवन से खुद को जोड़ पाते हैं और न ही बाद वाले हिस्से को प्रारंभ में समझ पाते हैं। लेकिन जब पाठक इन बातों को दोबारा पढ़ता है, उस पर चिंतन-मनन करता है तब उसे इस अनमोल तोहफे का पता चलता है। तोहफा जो विक्टर फ्रैंकल दुनिया को दे गए हैं। वे धर्म का निचोड़, ‘अपने जीवन का अर्थ खोजो’ अपने इस ‘लोगोथेरेपी’ सिद्धांत में प्रस्तुत करते हैं।
जब व्यक्ति अपने जीवन का अर्थ खोजने निकलता है, तो यह उसे एक उद्देश्य देता है, एक उद्देश्य जो आदमी को मजबूती प्रदान करता है। ऐसी मजबूती जिसके बल पर वह किसी भी क्रूरता, अत्याचार, छोटी-बड़ी किसी भी कठिनाई का सामना कर सकता है। यह आपके अस्तित्व को बचाता है, आपको जीने का मकसद प्रदान करता है। यह खोज आपको आध्यात्मिक ऊंचाई तक ले जाती है।
उनके सिद्धांत के अनुसार मनुष्य उपभोग (प्लेजर) से नहीं जीवन के अर्थवत्ता की खोज से आगे बढ़ता है। यह खोज आदमी को जीवित रहने, आगे बढ़ने को प्रेरित करती है।
170 पन्नों की किताब में पेज 86 में विक्टर फ्रैंकल कहते हैं, आदमी से एक चीज के अलावा सब कुछ छीना जा सकता है, उसकी स्वतंत्रता – परिस्थितियों में अपना रास्ता चुनने की स्वतंत्रता, अपने उसके नजरिया के अलावा सब छीना जा सकता है। इस मनोवैज्ञानिक सूझ भरी किताब ‘मेन्स सर्च फॉर मीनिंग’ को पढ़ कर देखें, इससे गुजरने के बाद आप वही नहीं रह जाएंगे।
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